—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
राइफलमैन कुलदीप सिंह भंडारी
01-06-1961 – 24-05-1988
वीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – साध्वी जुपला देवी
यूनिट – 11 गढ़वाल राइफल्स
ऑपरेशन पवन
राइफलमैन कुलदीप सिंह का जन्म 1 जून 1961 को, श्री महेन्द्र सिंह भंडारी एवं श्रीमती पिंगला देवी के परिवार में हुआ था। वह उत्तरप्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) के टिहरी गढ़वाल जिले के थौलधार ब्लॉक के अलेरू गांव के निवासी थे। वर्ष 1981 में वह भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे।
प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 5 गढ़वाल राइफल्स बटालियन में नियुक्त किया गया। कुछ वर्ष पश्चात उन्हें 11 गढ़वाल राइफल्स बटालियन में स्थानांतरित कर दिया गया था। वर्ष 1988 में उनकी बटालियन को ऑपरेशन पवन के अंतर्गत श्रीलंका भेजा गया था।
24 मई 1988 को, 11 गढ़वाल राइफल्स बटालियन की एक कंपनी को, श्रीलंका में अलमपिल के दक्षिण में जंगलों में उस क्षेत्र का अन्वेषण करने और स्वच्छ करने का कार्य सौंपा गया था, जहां विगत दिनों एक विशाल उग्रवादी शरणागार (HIDEOUT) को खोजा गया था। राइफलमैन कुलदीप सिंह इस कंपनी में 1 नंबर लाइट मशीन गनर थे। आगे बढ़ते समय उनका सेक्शन आगे से और दांई ओर से प्रचंड गोली वर्षा में घिर गया। भयानक गोली वर्षा की आरंभिक बौछार में, 2 नंबर लाइट मशीन गनर घातक रूप से घायल हो गया था।
अपने घायल साथी की अनुपस्थिति में, रायफलमैन कुलदीप सिंह पर्याप्त समय तक उग्रवादियों से संघर्ष करते रहे। अपने अन्य साथियों को घायल और इधर उधर पड़े देखकर उन्होंने स्थिति की गंभीरता को अनुभूत किया और उग्रवादियों की प्रचंड गोलीवर्षा होते हुए भी, उन्होंने अपने घायल सहकर्मी को पीठ पर उठा लिया और एक अन्य सहयोगी को अपने प्लाटून मुख्यालय तक पहुंचने में सहायता की।
वह लौट कर पुनः अपनी स्थिति पर आए और पाया कि उनके दांई ओर उग्रवादियों की गोली वर्षा अधिक तीव्र हो गई थी। उन्होंने त्वरित स्थिति परिवर्तित की और उग्रवादियों की स्थिति को व्यस्त करना आरंभ कर दिया। राइफलमैन भंडारी ने प्रचंडतापूर्वक उग्रवादियों से संघर्ष किया और उग्रवादियों द्वारा उन्हें सरलता से लक्ष्य बनाया जा सकता था। अंततः वह उग्रवादियों के फायर का लक्ष्य बन गए। एक गोली उनके सिर को चीर गई। राइफलमैन कुलदीप सिंह अंतिम श्वास तक अपनी स्थिति पर दृढ़तापूर्वक डटे रहे।
राइफलमैन कुलदीप सिंह ने उग्रवादियों के विरुद्ध कार्रवाई में विशिष्ट साहस और वीरता का परिचय दिया। 26 जनवरी 1990 को, महामहिम राष्ट्रपति द्वारा उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
18 अप्रैल 2010 को, उनके पैतृक गांव अलेरू के निकट चंबा-धरासू मार्ग पर किल्लीखाल में बने स्मारक पर उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया। प्रति वर्ष 18 अप्रैल को उनकी बटालियन पुष्पचक्र चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि देती है। इसी दिन उनकी स्मृति में वहां मेला भी आयोजित किया जाता है।
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