veerangana – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Thu, 23 Oct 2025 10:55:08 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 veerangana – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 रानी चेनम्मा जयंती 2025: कर्नाटक की वीरांगना की अमर वीरता की कहानी https://shauryasaga.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%80-rani-chennamma-jayanti/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%80-rani-chennamma-jayanti/?noamp=mobile#respond Thu, 23 Oct 2025 10:55:08 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5751 रानी चेनम्मा जयंती 2025

आज ही के दिन, 23 अक्टूबर 1778 को कर्नाटक के बेलगावी जिले के छोटे से गांव ककाती में एक ऐसी वीरांगना का जन्म हुआ, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ हथियार उठा लिए। जी हां, हम बात कर रहे हैं रानी चेनम्मा की, जिन्हें ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई’ भी कहा जाता है। उनकी जन्म जयंती पर पूरे देश में, खासकर कर्नाटक में, उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। रानी चेनम्मा का साहस और वीरता न सिर्फ कित्तूर की रियासत को बचाने की कोशिश थी, बल्कि पूरे भारत की स्वतंत्रता की पहली चिंगारी भी।

रानी चेनम्मा का प्रारंभिक जीवन

रानी चेनम्मा
रानी चेनम्मा

रानी चेनम्मा का जन्म 1778 में ककाती गांव में एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे घुड़सवारी, तलवारबाजी और शस्त्र प्रशिक्षण में माहिर हो गईं। उनकी शादी कित्तूर रियासत के राजा मल्लासारजा से हुई, जो देसाई वंश के थे। शादी के बाद वे कित्तूर की रानी बन गईं। कित्तूर आज भी कर्नाटक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अपनी समृद्ध संस्कृति और इतिहास के लिए जाना जाता है।

रानी चेनम्मा को एक पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन दुख की बात यह है कि 1824 में उनका इकलौता बेटा चल बसा। एक मां के रूप में यह दर्द सहना आसान नहीं था, लेकिन रानी ने हार नहीं मानी। उन्होंने शिवलिंगप्पा नामक एक अन्य बालक को गोद लिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह फैसला कित्तूर की परंपराओं के अनुरूप था, लेकिन यहीं से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का हस्तक्षेप शुरू हो गया।

ब्रिटिश ‘हड़प नीति’ का शिकार: कित्तूर पर संकट का बादल

रानी चेनम्मा
रानी चेनम्मा

19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के कई शासक ब्रिटिशों की चालाकी को समझ नहीं पा रहे थे। लेकिन रानी चेनम्मा ने साफ देख लिया था कि कंपनी की नजर कित्तूर के खजाने पर है। ब्रिटिशों ने अपनी कुख्यात डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (हड़प नीति) के तहत गोद लिए गए शिवलिंगप्पा को वारिस मानने से इनकार कर दिया। हालांकि यह नीति औपचारिक रूप से बाद में लागू हुई, लेकिन 1824 में ही कंपनी ने कित्तूर पर कब्जे की कोशिश शुरू कर दी।

रानी ने ब्रिटिश बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन को पत्र लिखकर अपील की कि हड़प नीति न लागू की जाए। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी गुहार को ठुकरा दिया। नतीजा? कित्तूर का खजाना, जो करीब 15 लाख रुपये का था, लूटने की साजिश रच ली गई। शिवलिंगप्पा को निर्वासित करने का आदेश भी जारी हो गया। रानी चेनम्मा ने साफ कह दिया – “हम झुकेंगे नहीं!”

कित्तूर युद्ध: रानी चेनम्मा की बहादुरी की पहली झलक

रानी चेनम्मा
रानी चेनम्मा

अक्टूबर 1824 में ब्रिटिशों ने 20,000 सिपाहियों और 400 तोपों के साथ कित्तूर पर हमला बोल दिया। संख्या में भारी पड़ने के बावजूद रानी चेनम्मा ने अपनी छोटी लेकिन निडर सेना के साथ डटकर मुकाबला किया। पहली लड़ाई में ही ब्रिटिशों को करारी हार मिली।

– कलेक्टर सेंट जॉन ठाकरे की मौत: रानी के वफादार सहयोगी अमातूर बेलप्पा ने ठाकरे को मार गिराया।
– दो ब्रिटिश अधिकारी बंधक ,सर वॉल्टर एलियट और स्टीवेंसन को कैद कर लिया गया।
– ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान: कई सैनिक मारे गए, और कित्तूर की सेना ने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

अंग्रेजों ने संधि का वादा किया कि अब युद्ध नहीं होगा। रानी ने विश्वास जताया और बंधकों को रिहा कर दिया। लेकिन धोखेबाज ब्रिटिशों ने फिर से हमला कर दिया! इस बार चैपलिन के नेतृत्व में और मजबूत सेना आई। सर थॉमस मुनरो का भतीजा और सोलापुर का सब-कलेक्टर मुनरो भी मारा गया।

रानी चेनम्मा ने अपने साहसी साथियों संगोल्ली रयन्ना और गुरुसिदप्पा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ीं। लेकिन संख्या के आधिक्य के कारण अंत में हार हुई। रानी को बेलहोंगल किले में कैद कर लिया गया, जहां 21 फरवरी 1829 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

रानी चेनम्मा की विरासत: स्वतंत्रता संग्राम की पहली शहीद

रानी चेनम्मा
रानी चेनम्मा

हालांकि आखिरी जंग में हार मिली, लेकिन रानी चेनम्मा की वीरता आज भी प्रेरणा स्रोत है। वे भारत की पहली शासिका थीं जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया। उनकी कहानी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से मिलती-जुलती है, इसलिए उन्हें ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई‘ कहा जाता है।

कित्तूर का पतन चाटुकारों की दोस्ती और शिवलिंग रुद्रसर्ज की गलत सलाह से शुरू हुआ था, लेकिन रानी ने इसे रोकने की पूरी कोशिश की। आज कर्नाटक सरकार उनकी समाधि की देखभाल करती है, जो एक शांतिपूर्ण पार्क में स्थित है। हर साल 22 से 24 अक्टूबर तक कित्तूर उत्सव मनाया जाता है, जहां उनकी पहली जीत का जश्न होता है। यह उत्सव न सिर्फ इतिहास को जीवंत करता है, बल्कि युवाओं को देशभक्ति की सीख भी देता है।

रानी चेनम्मा को कोटि-कोटि नमन

रानी चेनम्मा जयंती पर हम उनकी बहादुरी को सलाम करते हैं। वे साबित करती हैं कि साहस की कोई सीमा नहीं होती। अगर आप कर्नाटक घूमने जा रहे हैं, तो कित्तूर जरूर जाएं – वहां की हवा में आज भी वीरता की खुशबू है। रानी चेनम्मा जयंती 2025 हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान कितना महत्वपूर्ण था।

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Pritilata Waddedar प्रीतिलता वद्देदार: स्वतंत्रता संग्राम की एक अनमोल वीरांगना https://shauryasaga.com/pritilata-waddedar-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d/ https://shauryasaga.com/pritilata-waddedar-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d/?noamp=mobile#respond Mon, 29 Sep 2025 09:27:30 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5642 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत नायकों और नायिकाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन कुछ ऐसी शख्सियतें हैं जिनका योगदान समय के साथ कम चर्चा में रहा। ऐसी ही एक वीरांगना थीं प्रीतिलता वद्देदार, जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया। उनकी कहानी साहस, समर्पण और देशभक्ति का एक अनुपम उदाहरण है।

प्रारंभिक जीवन और देशभक्ति की प्रेरणा

5 मई 1911 को चटगांव (अब बांग्लादेश) में जन्मीं प्रीतिलता एक मेधावी छात्रा और निर्भीक लेखिका थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय में हुई, जहां से ही उनमें देशप्रेम की भावना जागृत हुई। बचपन से ही वे रानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथाओं से प्रभावित थीं और यह सवाल उनके मन में बार-बार उठता था कि “अंग्रेज हमारे शासक क्यों हैं?”

ढाका के ईडन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान प्रीतिलता का संपर्क ऐसी महिलाओं से हुआ जो अर्ध-क्रांतिकारी समूहों का नेतृत्व कर रही थीं। यहीं उनकी मुलाकात लीला नाग से हुई, जिन्होंने दीपाली संघ की स्थापना की थी। यह संगठन महिलाओं को युद्ध प्रशिक्षण और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए प्रेरित करता था। इस मुलाकात ने प्रीतिलता की ब्रिटिश-विरोधी भावना को और सुदृढ़ किया।

उच्च शिक्षा और क्रांतिकारी आंदोलन में प्रवेश

उच्च शिक्षा के लिए प्रीतिलता कोलकाता आईं और बेथ्यून कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल की। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी डिग्री को रोक दिया, जो उनके दृढ़ संकल्प को और मजबूत करने का कारण बना।

कोलकाता में उनकी मुलाकात क्रांतिकारी नेता सूर्य सेन (जिन्हें सहयोगी ‘मास्टर दा’ कहते थे) से हुई। सूर्य सेन के विचारों से प्रभावित होकर प्रीतिलता उनके भूमिगत क्रांतिकारी समूह इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगांव शाखा) में शामिल हो गईं। शुरुआत में समूह के कुछ सदस्यों को उनके शामिल होने पर संदेह था, लेकिन प्रीतिलता ने अपनी कार्यक्षमता और देशभक्ति से सबका विश्वास जीत लिया।

एक उल्लेखनीय घटना में, जब सूर्य सेन अज्ञातवास में थे और उनके सहयोगी रामकृष्ण विश्वास को अलीपुर जेल में फांसी की सजा सुनाई गई थी, प्रीतिलता ने उनसे जेल में लगभग 40 बार मुलाकात की। उनकी निडरता और चतुराई ऐसी थी कि ब्रिटिश अधिकारियों को उन पर संदेह भी नहीं हुआ।

चटगांव शस्त्रागार कांड

अप्रैल 1930 में सूर्य सेन के नेतृत्व में प्रीतिलता और 65 अन्य क्रांतिकारियों ने चटगांव में ब्रिटिश शस्त्रागार पर हमले की योजना बनाई। इस हमले का उद्देश्य शस्त्रागार पर कब्जा करना और टेलीग्राफ-टेलीफोन लाइनों को नष्ट करना था। यद्यपि शस्त्रागार पर कब्जा नहीं हो सका, लेकिन संचार लाइनों को नष्ट करने में वे सफल रहे। इस हमले में कई युवा क्रांतिकारी शामिल थे, जिनमें 14 वर्षीय सुबोध रॉय सबसे कम उम्र के थे।

हमले के बाद कई क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए, लेकिन प्रीतिलता और कुछ अन्य भागने और पुनर्गठन में सफल रहे। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण कदम थी, जिसने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।

पहाड़तली यूरोपीय क्लब पर हमला

चटगांव के पहाड़तली यूरोपीय क्लब पर लगी एक तख्ती, जिस पर लिखा था “Dogs and Indians Not Allowed”, क्रांतिकारियों के लिए अपमान का प्रतीक थी। इस नस्लवादी और भेदभावपूर्ण नीति के खिलाफ प्रीतिलता ने 24 सितंबर 1932 को इस क्लब पर हमले का नेतृत्व किया।

सूर्य सेन ने इस महत्वपूर्ण मिशन के लिए प्रीतिलता को चुना। पूरी तैयारी के साथ, हथियारों और पोटेशियम साइनाइड (आत्मरक्षा के लिए) से लैस होकर प्रीतिलता ने हमला किया। खिड़की पर बम लगाया गया, और क्लब में गोलीबारी शुरू हो गई। इस हमले में एक यूरोपीय महिला की मृत्यु हुई और 13 अन्य लोग घायल हुए। जवाबी गोलीबारी में प्रीतिलता घायल हो गईं। ब्रिटिश सैनिकों के हाथों पकड़े जाने से बचने के लिए उन्होंने पोटेशियम साइनाइड खा लिया और वीरगति को प्राप्त हुईं। उस समय उनकी आयु मात्र 21 वर्ष थी।

प्रीतिलता का पत्र और विरासत

प्रीतिलता के बलिदान के बाद उनके पास से मिले पत्रों में से एक में लिखा था:
“चटगांव शस्त्रागार कांड के बाद जो मार्ग अपनाया जाएगा, वह भावी विद्रोह का प्राथमिक रूप होगा। यह संघर्ष भारत को पूरी स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहेगा।”

यह पत्र उनकी दृढ़ता और स्वतंत्रता के प्रति उनके अटूट समर्पण को दर्शाता है। मई 2018 में उनकी स्नातक डिग्री की एक प्रति बीरकन्या प्रीतिलता ट्रस्ट को प्रदान की गई, जो उनके पैतृक गांव ढलघाट, पाटिया, चटगांव में स्थित है।

स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ

प्रीतिलता का बलिदान हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि उन क्रांतिकारियों के बलिदान से भी मिली, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी। उनकी कहानी हमें प्रेरित करती है कि देश के लिए समर्पण और साहस की कोई सीमा नहीं होती।

प्रीतिलता वद्देदार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन गुमनाम नायिकाओं में से एक हैं, जिनका योगदान हमें गर्व से भर देता है। उनकी वीरता, बुद्धिमत्ता और बलिदान की भावना आज भी हमें प्रेरित करती है। उनके जैसे नायकों की कहानियां हमें यह सिखाती हैं कि स्वतंत्रता की कीमत कितनी भारी होती है और इसे संजोकर रखना हमारा कर्तव्य है।

प्रीतिलता वद्देदार को कोटिशः नमन!
भारत माता की जय!

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