veer chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Fri, 21 Nov 2025 08:03:59 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 veer chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी (वीर चक्र): नूरानांग के अमर शहीद https://shauryasaga.com/lance-naik-trilok-singh-negi-veer-chakra/ https://shauryasaga.com/lance-naik-trilok-singh-negi-veer-chakra/?noamp=mobile#respond Fri, 21 Nov 2025 08:00:50 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5952

Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी (वीर चक्र): नूरानांग के अमर शहीद

Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी, वीर चक्र (मरणोपरांत), भारतीय सेना की 4वीं बटालियन, गढ़वाल राइफल्स (4 Garhwal Rifles) के एक ऐसे वीर सपूत थे, जिनकी कहानी भारतीय सैन्य इतिहास में अदम्य साहस और निःस्वार्थ बलिदान का एक स्वर्णिम अध्याय है। उनका शौर्य विशेष रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, नूरानांग की दुर्गम पहाड़ियों पर पहुंचा, जहां उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

Lance Naik Trilok Singh Negi
Lance Naik Trilok Singh Negi

प्रारंभिक जीवन और सैन्य प्रेरणा

Lance Naik Trilok Singh Negi त्रिलोक सिंह नेगी का जन्म 3 दिसंबर, 1940 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के छोटे से और शांत गाँव थैर में हुआ था। वह एक साधारण लेकिन देशभक्त परिवार से थे। उनके पिता, श्री चितर सिंह, और माता, श्रीमती बिकला देवी, ने उन्हें गढ़वाली संस्कृति के मजबूत मूल्यों—साहस, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा—के साथ पाला। एक पहाड़ी क्षेत्र का निवासी होने के नाते, उनका स्वभाव बचपन से ही कठोर, लचीला और चुनौतियों का सामना करने को तत्पर था।

पहाड़ों के अधिकांश युवाओं की तरह, Lance Naik Trilok Singh Negi त्रिलोक सिंह के मन में भी सेना की वर्दी और देश सेवा का गहरा आकर्षण था। अपने 18वें जन्मदिन के ठीक दिन, 3 दिसंबर, 1958 को, वह भारतीय सेना में शामिल हो गए। उन्हें गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की 4वीं बटालियन में नियुक्त किया गया। गढ़वाल राइफल्स, अपनी युद्ध परंपराओं और ‘बढ़ता जा’ (आगे बढ़ो) के नारे के लिए जानी जाती है, जिसने युवा त्रिलोक सिंह के सैन्य जुनून को और भी मजबूत किया। अपनी प्रारंभिक सेवा के दौरान, उन्होंने अनुशासन, तीव्र निशानेबाजी और उत्कृष्ट शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए तेजी से लांसनायक का पद प्राप्त किया।

1962 का निर्णायक युद्ध और नूरानांग की पोस्ट

जब अक्टूबर 1962 में भारत-चीन युद्ध छिड़ा, तो Lance Naik Trilok Singh Negi की बटालियन को अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन नेफा) के संवेदनशील क्षेत्र में तैनात किया गया था। युद्ध की सबसे क्रूर और निर्णायक लड़ाई में से एक, नूरानांग की लड़ाई, 17 नवंबर, 1962 को लड़ी गई। नूरानांग पुल के पास स्थित यह भारतीय पोस्ट अत्यंत रणनीतिक महत्व रखती थी।

इस दिन, चीनी सेना ने भारतीय ठिकानों पर तीसरी बार भीषण और संगठित हमला किया। हमलावर सेना एक मीडियम मशीन गन (MMG) को भारतीय पोस्ट के बहुत करीब लाने में सफल रही। इस एमएमजी की सटीक और तीव्र गोलीबारी ने भारतीय सैनिकों को प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने से रोक दिया और पोस्ट को बचाने का कार्य लगभग असंभव बना दिया। पोस्ट के कमांडर और सैनिकों के लिए यह स्थिति जीवन-मरण का प्रश्न बन गई थी।

वीरता: एमएमजी को नष्ट करने का अभियान

इस संकटपूर्ण क्षण में, Lance Naik Trilok Singh Negi ने एक ऐसा निर्णय लिया जो उन्हें भारतीय सेना के इतिहास में अमर कर गया। उन्होंने अपने साथियों, राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं और राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, के साथ मिलकर दुश्मन की उस खतरनाक एमएमजी पोस्ट को निष्क्रिय करने का संकल्प लिया। यह आत्मघाती मिशन था, जिसमें सफलता की संभावना बहुत कम थी।

तीनों वीरों ने दुश्मन की भयंकर गोलीबारी के बीच रेंगना शुरू किया। लांसनायक नेगी, जो स्टेन गन से लैस थे, ने सबसे आगे रहते हुए दुश्मन पर दबाव वाली और सटीक कवरिंग फायर प्रदान करना शुरू किया। उनकी यह गोलीबारी इतनी प्रभावी थी कि उनके साथियों को एमएमजी ठिकाने के करीब पहुंचने का मौका मिला। गुसाईं और रावत ने तब हथगोले फेंककर उस ठिकाने को ध्वस्त कर दिया, और वहां तैनात चीनी गार्डों को काबू करके उस महत्वपूर्ण एमएमजी पर कब्ज़ा कर लिया। यह भारतीय सेना के लिए एक तात्कालिक और बड़ी सफलता थी।

सर्वोच्च बलिदान (The Supreme Sacrifice)

Lance Naik Trilok Singh Negi
Lance Naik Trilok Singh Negi

एमएमजी पर कब्ज़ा करने के बाद, जब राइफलमैन गुसाईं और रावत पकड़ी गई मशीन गन को लेकर वापस सुरक्षित क्षेत्र की ओर आ रहे थे, तब Lance Naik Trilok Singh Negi ने अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपना स्थान नहीं छोड़ा। वह लगातार दुश्मन पर कवरिंग फायर देते रहे।

इसी दौरान, दुश्मन की ऑटोमैटिक गोलीबारी के एक बर्स्ट से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। मृत्यु करीब होने के बावजूद, उन्होंने दर्द को दरकिनार करते हुए, अपनी अंतिम साँस तक फायर करना जारी रखा, ताकि उनके साथी सफलतापूर्वक पीछे हट सकें। उन्होंने अपने कर्तव्य को अपने जीवन से ऊपर रखा और 17 नवंबर, 1962 को रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अद्वितीय बलिदान ने न केवल उनके साथियों की जान बचाई, बल्कि नूरानांग पोस्ट को कुछ समय के लिए बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ (Vir Chakra)

Veer Chakra वीर चक्र
Veer Chakra वीर चक्र

Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, अदम्य साहस और कर्तव्य के प्रति सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ (Vir Chakra) से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी आज भी गढ़वाल राइफल्स और भारतीय सेना की हर इकाई में प्रेरणा का स्रोत है।

नवंबर 2025 में, उनके बलिदान के 63 साल बाद, गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट ने नूरानांग दिवस पर उनके पैतृक गाँव में उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ प्रदान किया और उनकी स्मृति में निर्मित ‘शौर्य द्वार’ का अनावरण किया। Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी का नाम हमेशा उन महान सैनिकों में गिना जाएगा जिन्होंने अपनी मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी।

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शहीद मोहम्मद इम्तियाज: ऑपरेशन सिंदूर में एक वीर की शहादत https://shauryasaga.com/shaheed-mohammad-imtiyaz-operation-sindoor-bihar/ https://shauryasaga.com/shaheed-mohammad-imtiyaz-operation-sindoor-bihar/?noamp=mobile#respond Thu, 11 Sep 2025 08:07:53 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5488 मोहम्मद इम्तियाज mohammad imtiyaz

बिहार के सरन जिले के छोटे से गांव नारायणपुर में 12 मई 2025 का दिन गम और गर्व  लेकर आया। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज , जो इस गांव के सपूत थे, की पार्थिव देह जब उनके पैतृक गांव पहुंची, तो हजारों लोगों की आंखें नम थीं, और दिलों में उनके प्रति सम्मान की लौ जल रही थी। जम्मू-कश्मीर के आरएस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान की ओर से की गई गोलीबारी में शहीद हुए इम्तियाज ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की। उनकी यह शहादत न केवल उनके परिवार और गांव के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐसी कहानी है, जो साहस, बलिदान और देशभक्ति की मिसाल बन गई।

मोहम्मद इम्तियाज mohammad imtiyaz

56 वर्षीय मोहम्मद इम्तियाज का जन्म सरन जिले के गड़खा थाना क्षेत्र के नारायणपुर गांव में हुआ था। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले इम्तियाज का जीवन देशसेवा के प्रति समर्पण का जीता-जागता उदाहरण था। बचपन से ही उनके मन में देश की रक्षा करने का जज्बा था। गांव के लोग बताते हैं कि इम्तियाज न केवल एक मेहनती और अनुशासित व्यक्ति थे, बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी थे, जिन्होंने गांव के कई युवाओं को सेना और अर्धसैनिक बलों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।

mohammad-imtiyaz का छोटा भाई, मोहम्मद असलम, जो स्वयं बीएसएफ में सब-इंस्पेक्टर है, उनके साथ कई बार सीमा पर तैनात रहा। दोनों भाइयों ने बांग्लादेश और मेघालय जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में एक साथ सेवा की। इम्तियाज की मेहनत और लगन ने उन्हें बीएसएफ में एक सम्मानित स्थान दिलाया। उनकी वर्दी उनके लिए सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि उनके कर्तव्य और देश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक थी।

नारायणपुर में उनका घर, जिसे उन्होंने और उनके भाई असलम ने मिलकर बनाया और ‘सीमा प्रहरी निवास’ का नाम दिया, आज भी उनकी देशभक्ति की कहानी कहता है। हर साल ईद और अन्य त्योहारों पर इम्तियाज अपने गांव लौटते थे। मार्च 2025 में अपनी आखिरी छुट्टी के दौरान, जब वे ईद मनाने घर आए थे, तब भी उन्होंने गांव के बच्चों और युवाओं के साथ समय बिताया, उन्हें पढ़ाई और देशसेवा के लिए प्रेरित किया। उस समय किसी को नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात होगी।

ऑपरेशन सिंदूर

ऑपरेशन सिंदूर भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखने और घुसपैठ को रोकने के लिए शुरू किया गया एक महत्वपूर्ण अभियान था। जम्मू-कश्मीर का आरएस पुरा सेक्टर, जहां मोहम्मद इम्तियाज तैनात थे, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यह इलाका अक्सर सीमा पार से गोलीबारी और तनाव का गवाह बनता है। इम्तियाज और उनकी बीएसएफ की टुकड़ी इस क्षेत्र में न केवल सीमा की सुरक्षा कर रही थी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी एक ढाल की तरह थी।

10 मई 2025 की देर शाम, पाकिस्तान की ओर से अचानक भारी गोलीबारी शुरू हुई। यह हमला इतना तीव्र था कि बीएसएफ की चौकियों पर तैनात जवानों को तुरंत मोर्चा संभालना पड़ा। मोहम्मद इम्तियाज, जो अपनी चौकी पर पूरी मुस्तैदी के साथ डटे थे, ने इस हमले का डटकर मुकाबला किया। लेकिन इस गोलीबारी में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी हालत नाजुक थी, और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। mohammad-imtiyaz ने अपनी अंतिम सांस तक अपने कर्तव्य का पालन किया और देश के लिए शहादत दी।

शहादत की खबर: गांव में मातम, देश में गर्व

जब मोहम्मद इम्तियाज की शहादत की खबर नारायणपुर पहुंची, तो पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। उनके परिवार, जिसमें उनकी पत्नी, दो बेटे, और बेटियां शामिल हैं, के लिए यह एक असहनीय क्षति थी। उनके भाई असलम, जो स्वयं बीएसएफ में हैं, ने इस दुख को सहन करने की हिम्मत दिखाई। उन्होंने कहा, “मेरे भाई ने देश के लिए अपनी जान दी। हमें दुख है, लेकिन गर्व भी है कि उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।”

12 मई 2025 को जब इम्तियाज की पार्थिव देह उनके गांव लाई गई, तो हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़े। गांव के बुजुर्गों ने उनकी सादगी और देशभक्ति की मिसाल दी, जबकि युवाओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। स्थानीय प्रशासन और बीएसएफ के अधिकारियों ने भी उनके बलिदान को सलाम किया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल हर व्यक्ति की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में यह गर्व भी था कि उनका सपूत देश के लिए शहीद हुआ।

एक शहीद की अमर कहानी

मोहम्मद इम्तियाज की शहादत केवल उनके परिवार या नारायणपुर गांव की कहानी नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है, जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देता है। उनकी वीरता हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी और सुरक्षा उन अनगिनत सैनिकों के बलिदान का परिणाम है, जो दिन-रात सीमाओं पर हमारी हिफाजत के लिए खड़े रहते हैं।

इम्तियाज की जिंदगी और उनकी शहादत नारायणपुर के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। उनका ‘सीमा प्रहरी निवास’ अब केवल एक घर नहीं, बल्कि देशभक्ति और बलिदान का प्रतीक है। उनकी स्मृति में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे। हमें उनके जैसे वीरों के सपनों को साकार करने के लिए अपने देश की सेवा और सम्मान में योगदान देना होगा।

देश के लिए एक संदेश

मोहम्मद इम्तियाज की शहादत हमें यह सिखाती है कि देश की रक्षा केवल सैनिकों का कर्तव्य नहीं है। हम सभी को अपने स्तर पर देश के लिए कुछ न कुछ करना होगा। चाहे वह समाज में एकता को बढ़ावा देना हो, युवाओं को प्रेरित करना हो, या देश की प्रगति में योगदान देना हो। इम्तियाज जैसे शहीदों की कहानियां हमें यह सिखाती हैं कि देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में होनी चाहिए।

शहीद मोहम्मद इम्तियाज अमर रहें! उनकी शहादत हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

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वीर चक्र सूबेदार भीम सिंह बोहरा https://shauryasaga.com/vir-chakra-subedar-bhim-singh-bohra/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-subedar-bhim-singh-bohra/?noamp=mobile#respond Thu, 29 Aug 2024 13:23:31 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5223 Veer Chakra Subedar Bhim Singh Bohra
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सूबेदार भीम सिंह बोहरा
IO-18775
वीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती सुभद्रा देवी
यूनिट – 3/9 गोरखा राइफल्स
भारत-पाक युद्ध 1947-48
सूबेदार भीम सिंह बोहरा का जन्म कहराम बोहरा के घर में हुआ था। वह देहरादून के निवासी थे और भारतीय सेना की 9 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 3 बटालियन में सेवारत थे। वर्ष 1948 में वह जम्मू-कश्मीर के कबायली युद्ध में तैनात थे।
 
28/29 अगस्त 1948 की रात्रि, जम्मू कश्मीर के पुंछ क्षेत्र में एक पहाड़ी विशेषता पर किए गए आक्रमण में सूबेदार भीम सिंह बोहरा अग्रणी कंपनी के प्रभारी थे। हमारी अग्रिम पंक्ति शत्रु की प्रचंड फायरिंग में थी, तो भी सूबेदार भीम सिंह ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की पूर्णतः उपेक्षा करते हुए, आक्रमण का नेतृत्व किया और अपनी खुकरी चमकाते हुए वह शत्रुओं पर टूट पड़े।
 
शत्रु द्वारा दृढ़ता से अधिकृत स्थिति के उच्चतम बिंदु पर जब तक अधिकार नहीं कर लिया गया, तब तक वह शत्रु का पीछा करते रहे। तत्पश्चात शत्रु की तीव्र गोला वृष्टि के होते हुए भी अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हुए वह एक-एक चौकी तक गए। उसी समय उन्हें प्रत्यक्ष रूप से शत्रु मोर्टार का गोला लगा और वह वीरगति को प्राप्त हो गए‌।
 
सूबेदार भीम सिंह अपनी कंपनी के लिए वीरता का महान उदाहरण थे एवं इस पूरे ऑपरेशन में उनका साहस, नेतृत्व एवं वीरता उत्कृष्ट थी। उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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