shouryasaga – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Wed, 03 Dec 2025 10:33:14 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 shouryasaga – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता :कारगिल युद्ध के नायक ,महावीर चक्र  https://shauryasaga.com/major-vivek-gupta-kargil-hero-mahavir-chakra/ https://shauryasaga.com/major-vivek-gupta-kargil-hero-mahavir-chakra/?noamp=mobile#respond Wed, 03 Dec 2025 10:33:14 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6009

टोलोलिंग चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराने वाला सूरमा

Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता (2 जनवरी 1970 – 13 जून 1999) भारतीय सेना के एक अत्यंत वीर अधिकारी थे, जिन्हें 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) में उनके अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन सैन्य सम्मान महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया गया था। वह 2 राजपूताना राइफल्स (2 Raj Rif) बटालियन का हिस्सा थे।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

Major Vivek Gupta MVC
Major Vivek Gupta MVC
  • जन्म और परिवार: मेजर विवेक गुप्ता का जन्म 2 जनवरी 1970 को देहरादून, उत्तराखंड में हुआ था। उनके पिता भी सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल बीआरएस गुप्ता थे।

  • शिक्षा और कमीशन: उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। 13 जून 1992 को, उन्हें अपने शौर्य के लिए प्रसिद्ध इन्फैंट्री रेजिमेंट राजपूताना राइफल्स में कमीशन मिला।

  • विवाह और सेवा: 1997 में, उन्होंने सेना अधिकारी कैप्टन राजश्री बिष्ट से विवाह किया। उन्हें उनकी असाधारण क्षमताओं के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) कमेंडेशन कार्ड से भी नवाजा गया था और वह महू के इन्फैंट्री स्कूल में एक हथियार प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किए गए थे।

कारगिल युद्ध में वीरता (जून 1999)

operatin vijay
operatin vijay

जब भारतीय सेना के पास घुसपैठ की सीमा के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, तब 2 राजपूताना राइफल्स को युद्ध में उतारा गया। Major Vivek Gupta मेजर विवेक गुप्ता और उनकी चार्ली कंपनी को द्रास सेक्टर में टोलोलिंग चोटी (Point 4590) पर स्थित शत्रु चौकियों पर फिर से कब्जा करने का महत्वपूर्ण और खतरनाक मिशन सौंपा गया।

यह मिशन बहुत कठिन था क्योंकि दुश्मन एक ऊँचे और सुरक्षित स्थान पर डटा हुआ था, जिससे वे नीचे की ओर चढ़ने वाले भारतीय सैनिकों पर आसानी से हमला कर सकते थे।

टोलोलिंग पर निर्णायक हमला

tololing
tololing

13 जून 1999 को, जब 2 राजपूताना राइफल्स ने टोलोलिंग टॉप पर बटालियन हमला शुरू किया, मेजर विवेक गुप्ता अग्रणी चार्ली कंपनी की कमान संभाल रहे थे।

  1. भारी गोलीबारी का सामना: भारी तोपखाने और स्वचालित हथियारों की गोलीबारी के बावजूद, मेजर गुप्ता के नेतृत्व में कंपनी दुश्मन के करीब पहुँचने में सफल रही।

  2. तीव्र जवाबी हमला: जैसे ही कंपनी खुले में आई, उन पर कई दिशाओं से तीव्र गोलीबारी हुई, जिससे कंपनी के तीन जवान घायल हो गए और हमला अस्थायी रूप से रुक गया।

  3. साहसी नेतृत्व: Major Vivek Gupta को पता था कि खुले में रुकना अधिक नुकसानदायक होगा। उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की और दुश्मन की चौकी पर रॉकेट लॉन्चर से फायर किया।

  4. आमने-सामने की भीषण लड़ाई: इससे पहले कि स्तब्ध दुश्मन संभल पाता, Major Vivek Gupta ने दुश्मन की चौकी की ओर दौड़ लगा दी। इस दौरान, उन्हें दो गोलियाँ लगीं, लेकिन उन्होंने आगे बढ़ना जारी रखा। चौकी पर पहुँचकर, उन्होंने अपनी चोटों के बावजूद दुश्मन के साथ भयंकर आमने-सामने की लड़ाई की और तीन शत्रु सैनिकों को मार गिराया।

  5. चोटी पर कब्जा: अपने अधिकारी के वीरतापूर्ण कार्य से प्रेरणा लेकर, कंपनी के बाकी सैनिकों ने दुश्मन की चौकी पर हमला कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया

सर्वोच्च बलिदान: हालांकि, इस भीषण मुकाबले के दौरान, मेजर विवेक गुप्ता को दुश्मन की एक और गोली लगी और वह अंततः अपनी चोटों के कारण शहीद हो गए। यह ठीक उसी दिन हुआ जब उन्होंने आठ साल पहले राजपूताना राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया था।

Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता का यह असाधारण पराक्रम और प्रेरणादायक नेतृत्व ही टोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का मुख्य कारण बना।

महावीर चक्र से सम्मान

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

राष्ट्र के प्रति उनके सर्वोच्च बलिदान और विशिष्ट वीरता के लिए, उन्हें 15 अगस्त 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Major Vivek Gupta मेजर विवेक गुप्ता की कहानी भारतीय सेना के ‘सर्वप्रथम कर्तव्य’ की भावना का प्रतीक है और वह हमेशा देश की युवा पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

Major Vivek Gupta MVC
Major Vivek Gupta MVC

also read:-Inspector Dilip Kumar Das इंस्पेक्टर दिलीप कुमार दास ‘कीर्ति चक्र’

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Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक: एक साधारण गांव से असाधारण बलिदान की कहानी https://shauryasaga.com/ek-sadharan-gaao-se-sowar-pangala-kartheek/ https://shauryasaga.com/ek-sadharan-gaao-se-sowar-pangala-kartheek/?noamp=mobile#respond Mon, 08 Sep 2025 11:53:10 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5466 भारत की अडिग भावना में उन सामान्य लोगों की कहानियां छिपी हैं जो असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचते हैं, अपने देश के लिए अटूट प्रेम से प्रेरित होकर। ऐसी ही एक कहानी है Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक की, जो आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाले साहसी सैनिक बने। मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्होंने कर्तव्य की राह में सर्वोच्च बलिदान दिया, और साहस व निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बन गए। आइए, आज हम उनके जीवन और विरासत पर नजर डालते हैं, और उस व्यक्ति की कहानी को विस्तार से जानते हैं जिसका समर्पण हमें प्रेरित करता है।

एक छोटे से गांव में शुरुआत

Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक का जन्म और पालन-पोषण आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के बंगारुपालेम मंडल में स्थित एक छोटे से गांव, एगुवा रागिमनुपेंटा में हुआ था। यहां का जीवन सादा था, ग्रामीण भारत की लय में बंधा हुआ—खेतों में कठिन परिश्रम, परिवार के मजबूत रिश्ते और समुदाय की गहरी भावना। वह श्री वरदराजुलु और श्रीमती सेल्वी के छोटे बेटे थे, जिन्होंने अपने बच्चों में मेहनत और गर्व के मूल्य स्थापित किए। कार्तिक अपने बड़े भाई राजेश के साथ बड़े हुए, सपनों और चुनौतियों को साझा करते हुए।

Sowar Pangala Kartheek बचपन से ही  भारतीय सशस्त्र बलों की कहानियों से प्रभावित थे। सैनिकों की वीरता, उनके लौह अनुशासन और राष्ट्र के लिए निस्वार्थ सेवा की कहानियां उनके नन्हे दिल में एक चिंगारी जगा गईं। चाहे टीवी पर परेड देखना हो या स्थानीय सैनिकों की कहानियां सुनना, वह सपने देखते थे कि एक दिन वह भी वर्दी पहनेंगे। यह कोई क्षणिक उत्साह नहीं था; यह एक जुनून था जो उनके साथ बड़ा हुआ, उनकी हर पसंद को आकार देता रहा और देश की सेवा करने की उनकी इच्छा को मजबूत करता रहा।

सपने को हकीकत में बदलने की अथक कोशिश

सपनों को हकीकत में बदलना आसान नहीं होता, खासकर जब आप सीमित संसाधनों वाले छोटे से गांव से हों। लेकिन Sowar Pangala Kartheek मेहनत से अनजान नहीं थे। उन्होंने पूरी लगन से पढ़ाई की, अपने शरीर को कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार किया और मानसिक रूप से आने वाली चुनौतियों के लिए खुद को मजबूत किया। उनकी मेहनत 2017 में रंग लाई, जब उनका चयन भारतीय सेना में हुआ—यह उनके परिवार और गांव के लिए गर्व का क्षण था।

नवसैनिक से सैनिक बनने की यात्रा कठिन सैन्य प्रशिक्षण से शुरू हुई, जहां Sowar Pangala Kartheek ने हर अभ्यास और ड्रिल में खुद को झोंक दिया। उन्होंने सैनिक कौशल की बुनियादी बातें सीखीं: हथियारों को सटीकता से संभालना, युद्ध रणनीतियों में महारत हासिल करना और मैदानी कौशल में निपुणता। अपनी मूल रेजिमेंट में तैनात होने के बाद, उन्होंने जल्दी ही बैरक की अनुशासित जिंदगी को अपना लिया। उनके साथी और अधिकारी जल्द ही उनकी निष्ठा को पहचान गए—वह हमेशा कठिन कार्यों के लिए स्वेच्छा से आगे रहते, अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देते और दबाव में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते। कार्तिक की सहनशक्ति और सकारात्मक रवैया ने उन्हें सभी के बीच सम्मान दिलाया, जिससे वह एक सच्चे पेशेवर सैनिक के रूप में उभरे।

जैसे-जैसे उनका करियर आगे बढ़ा, Sowar Pangala Kartheek को एक विशेष कार्य सौंपा गया जो उनकी अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा थी। उन्हें 22 राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) बटालियन में तैनात किया गया, जो जम्मू और कश्मीर के अस्थिर क्षेत्र में संचालित होने वाली एक विशेष उग्रवाद-निरोधी इकाई थी। राष्ट्रीय राइफल्स आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई के गुमनाम नायक हैं, जो खतरनाक अभियानों में विशेषज्ञता रखते हैं ताकि खतरों को खत्म किया जाए और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। कार्तिक के लिए, इसका मतलब था नियमित तैनाती की स्थिरता को छोड़कर नियंत्रण रेखा (एलओसी) के अप्रत्याशित खतरों का सामना करना। अगले कुछ वर्षों में, उन्होंने इस कठिन माहौल में अपने कौशल को और निखारा, एक सक्षम और नन्हा योद्धा बनकर उभरे। 2025 की शुरुआत तक, उनके पास लगभग आठ साल की सेवा थी, जो एक गांव के लड़के से युद्ध-कुशल सैनिक बनने की उनकी यात्रा का प्रमाण थी।

 बरमूला में निर्णायक अभियान: वीरता की एक रात

जनवरी 2025 में 22 आरआर बटालियन के लिए नई चुनौतियां आईं, जो जम्मू और कश्मीर के बरमूला जिले में उग्रवाद-निरोधी अभियानों में गहराई से शामिल थे। नियंत्रण रेखा के करीब यह क्षेत्र लंबे समय से आतंकी घुसपैठ का केंद्र रहा है। हथियारबंद समूह अक्सर सीमा पार करने की कोशिश करते हैं, जिससे सुरक्षा और नागरिकों के जीवन को गंभीर खतरा होता है। बटालियन, काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स (सीआईएफ) किलो और XV कोर—जिसे ‘चिनार कोर’ के नाम से भी जाना जाता है—के तहत संचालित हो रही थी, जिसका मुख्यालय श्रीनगर में है और जो कश्मीर घाटी में सैन्य अभियानों की देखरेख करता है।

25 जनवरी, 2025 को, सैन्य खुफिया विभाग को बरमूला जिले के ज़ालूरा गुज्जरपति क्षेत्र में कट्टर आतंकवादियों की मौजूदगी की विश्वसनीय जानकारी मिली। खुफिया सूत्रों ने संकेत दिया कि आतंकवादी एक बड़े हमले की योजना बना रहे थे और भारी हथियारों से लैस थे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा थे। सूचना का विश्लेषण करने के बाद, वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने 20 जनवरी, 2025 को एक खोज और नष्ट करने का अभियान शुरू करने का निर्णायक फैसला लिया, ताकि आतंकवादी अपनी योजनाओं को अंजाम देने से पहले खत्म हो जाएं। सैनिक पंगाला कार्तिक को इस उच्च जोखिम वाले अभियान के लिए हमलावर टीम में शामिल किया गया। खतरों से पूरी तरह वाकिफ होने के बावजूद, उन्होंने अपने कर्तव्य को अडिग दृढ़ता के साथ स्वीकार किया।

योजना के अनुसार, Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक और उनकी टीम ज़ालूरा गुज्जरपति क्षेत्र में पहुंची और बांदीपोरा सेक्टर के सोपोर क्षेत्र में खोज और घेराबंदी अभियान शुरू किया। अभियान को सावधानीपूर्वक अंजाम दिया गया, जिसमें सैनिकों ने सभी संभावित भागने के रास्तों को रणनीतिक रूप से अवरुद्ध कर दिया। जैसे ही वे आगे बढ़े, सैनिकों का सामना भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों से हुआ, जिन्होंने चुनौती मिलने पर तुरंत अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद एक तीव्र गोलीबारी हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने अंधेरे, उबड़-खाबड़ इलाके में भारी गोलीबारी की।

असाधारण साहस और बलिदान

Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक ने असाधारण साहस का प्रदर्शन करते हुए सबसे आगे रहकर आतंकवादियों से मुकाबला किया। खतरनाक परिस्थितियों और भारी जवाबी गोलीबारी के बावजूद, उन्होंने रणनीतिक रूप से आगे बढ़ते हुए सुनिश्चित किया कि आतंकवादी घेर लिए जाएं और भाग न सकें। हालांकि, इस भयंकर गोलीबारी के दौरान, Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक को कई गोलियां लगीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने आतंकवादियों से मुकाबला जारी रखा, असाधारण वीरता और निस्वार्थ भावना का प्रदर्शन किया। वह अंतिम क्षण तक लड़े, यह सुनिश्चित करते हुए कि अभियान सफलतापूर्वक पूरा हो और आतंकवादी निष्प्रभावी हो जाएं। उनके इस सर्वोच्च बलिदान के परिणामस्वरूप, एक बड़ा आतंकी खतरा टल गया, जिससे अनगिनत जjindagi बच गई। दुर्भाग्यवश, उनकी चोटों की गंभीरता के कारण, Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक अपनी चोटों के कारण शहीद हो गए, और 28 वर्ष की आयु में कर्तव्य की राह में अंतिम बलिदान दिया।

एक गौरवशाली विरासत

Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक अपने पिता श्री वरदराजुलु, माता श्रीमती सेल्वी और बड़े भाई श्री राजेश को पीछे छोड़ गए हैं। उनकी वीरता और बलिदान की कहानी न केवल उनके परिवार और गांव के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। वह एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर एक असाधारण सैनिक बने, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि साहस, समर्पण और निस्वार्थ सेवा किसी भी बाधा को पार कर सकती है। Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक की कहानी एक अनुस्मारक है कि हमारे सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाता। वे हमारे देश की नींव को मजबूत करते हैं, हमें एकजुट करते हैं और हमें यह याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता की कीमत अनमोल है।

आज, जब हम Sowar Pangala Kartheek  सैनिक पंगाला कार्तिक को याद करते हैं, तो आइए हम उनके बलिदान को सम्मान दें, न केवल उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करके, बल्कि उन मूल्यों को जीकर जो उन्होंने अपनाए थे—कर्तव्य, सम्मान और देश के प्रति प्रेम। उनकी स्मृति में, हम यह संकल्प लें कि हम एक ऐसे भारत के लिए काम करेंगे जो उनके सपनों और बलिदान के योग्य हो।

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Sergeant Surendra Kumar Moga https://shauryasaga.com/sergeant-surendra-kumar-moga/ https://shauryasaga.com/sergeant-surendra-kumar-moga/?noamp=mobile#respond Tue, 02 Sep 2025 10:19:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5438 आज, हम सब एक वीर सपूत सर्जेंट सुरेंद्र कुमार मोगा की वीरता की कहानी जानेंगे जिन्होंने देश सेवा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया |

सुरेंद्र का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ देशसेवा की भावना खून में थी। उनके पिता, स्वर्गीय शिशपाल सिंह मोगा, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में अपनी सेवाएँ दे चुके थे। बचपन से ही सुरेंद्र के मन में देश के लिए कुछ करने का जज़्बा था। मेहरादासी जैसे गाँव, जहाँ हर घर से कोई न कोई सैनिक निकलता है, वहाँ की मिट्टी ने सुरेंद्र को वीरता और समर्पण का पाठ पढ़ाया।

राजस्थान के झुंझुनू जिले के मेहरादासी गाँव इस छोटे से गाँव ने अपने एक लाल, सर्जेंट सुरेंद्र कुमार मोगा । 36 साल की उम्र में, भारतीय वायु सेना के इस मेडिकल असिस्टेंट ने 10 मई, 2025 को जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में देश की सेवा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। सुरेंद्र सिर्फ़ एक सैनिक नहीं थे, बल्कि एक बेटा, एक पिता, और एक पति थे, जिनके बलिदान ने पूरे देश को गर्व और दुख से भर दिया।

1 जनवरी, 2010 को सुरेंद्र भारतीय वायु सेना में शामिल हुए और 15 साल तक एक मेडिकल असिस्टेंट के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। उनकी मेहनत, लगन और दूसरों की मदद करने की भावना ने उन्हें सभी का प्रिय बना दिया। चाहे साथी सैनिकों की देखभाल हो या मुश्किल हालात में हिम्मत दिखाना, सुरेंद्र हमेशा आगे रहते थे।

बलिदान

10 मई, 2025 का दिन मेहरादासी और पूरे देश के लिए एक दुखद दिन बन गया। उधमपुर में ड्यूटी के दौरान सर्जेंट सुरेंद्र कुमार मोगा ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया । उनकी शहादत ने न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे गाँव और देश को झकझोर कर रख दिया। लेकिन इस दुख के साथ-साथ, उनके बलिदान ने हमें गर्व करने का मौका भी दिया। सुरेंद्र ने दिखाया कि सच्चा सैनिक वही है, जो अपने कर्तव्य को हर चीज़ से ऊपर रखता है।

परिवार

सुरेंद्र अपने पीछे अपनी पत्नी, एक छोटी बेटी, और एक बेटा छोड़ गए हैं। उनके परिवार के लिए यह नुकसान असहनीय है, लेकिन वे जानते हैं कि सुरेंद्र ने जो किया, वह देश के लिए था। मेहरादासी गाँव के लोग आज भी उनके घर के सामने इकट्ठा होते हैं, उनकी कहानियाँ सुनाते हैं, और उनके साहस को याद करते हैं। सुरेंद्र के पिता की तरह, अब सुरेंद्र की कहानी भी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी।

सर्जेंट सुरेंद्र कुमार मोगा की कहानी हमें सिखाती है कि देशसेवा सिर्फ़ एक नौकरी नहीं, बल्कि एक जुनून है। उन्होंने अपने जीवन से हमें यह दिखाया कि मुश्किल हालात में भी हिम्मत और इंसानियत को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि हमारी आज़ादी और सुरक्षा के पीछे अनगिनत सैनिकों का बलिदान है।

आज, जब हम अपने घरों में सुरक्षित बैठे हैं, तो हमें सर्जेंट सुरेंद्र जैसे वीरों को याद करना चाहिए। उनके परिवार के प्रति हमारी संवेदनाएँ हैं, और उनके साहस को हमारा सलाम।

जय हिंद!

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हवलदार विनोद सिंह https://shauryasaga.com/havildar-vinod-singh/ https://shauryasaga.com/havildar-vinod-singh/?noamp=mobile#respond Thu, 20 Mar 2025 09:08:29 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5373

बलिदान दिवस – शौर्य को नमन
हवलदार विनोद सिंह
सेवा संख्या: 2883638W
वीरांगना – श्रीमती मुनेश देवी
यूनिट: 13 राजपुताना राइफल्स
आतंकवाद विरोधी अभियान

हवलदार विनोद सिंह उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के जानी-खुर्द खंड के सतवाई गांव के निवासी थे। वे भारतीय सेना की प्रतिष्ठित राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट की 13वीं बटालियन में अपनी सेवाएं दे रहे थे। साल 2007 में वे जम्मू-कश्मीर में तैनात थे, जहां उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया।

20 मार्च 2007 को एक आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान हवलदार विनोद सिंह ने अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और वीरता का परिचय देते हुए देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।

आइए, आज उनके शौर्य को याद करें और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें।

#आतंकवाद_विरोधी_अभियान_2007 #कारगिल #शहीदों_को_नमन #शौर्यनमन
#भारतीय_सशस्त्र_सेना #जय_हिंद #भारतीय_सेना_दिवस #वीर_जवान
#सेना_के_साथ #शहीद_परिवार

शौर्य की कहानियों के लिए:

Martyrdom Day – A Salute to Valor
Havildar Vinod Singh
Service No. 2883638W
Veerangana (Brave Wife) – Smt. Munesh Devi
Unit: 13 Rajputana Rifles
Anti-Terrorism Operation

Havildar Vinod Singh hailed from Satwai village in the Jani-Khurd block of Meerut district, Uttar Pradesh. He served with pride in the 13th Battalion of the Rajputana Rifles, one of the Indian Army’s most esteemed regiments. In 2007, he was deployed in Jammu and Kashmir, a region marked by its challenges and bravery.

On March 20, 2007, during an anti-terrorism operation, Havildar Vinod Singh displayed extraordinary courage, unwavering determination, and gallantry in the face of danger. It was on this day that he laid down his life, offering the ultimate sacrifice for the nation.

Let us remember and honor his bravery today and always.

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सिपाही हरी सिंह – महावीर चक्र https://shauryasaga.com/sipahi-hari-singh-maha-vir-chakra/ https://shauryasaga.com/sipahi-hari-singh-maha-vir-chakra/?noamp=mobile#respond Mon, 17 Mar 2025 10:37:25 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5366 शौर्य दिवस – शौर्य को नमन

सिपाही हरी सिंह – महावीर चक्र

यूनिट: पंजाब रेजिमेंट, 1 पटियाला (RS इंफेंट्री)
युद्ध: भारत-पाक युद्ध 1947-48
रणभूमि: झांगर, जम्मू-कश्मीर
तारीख: 17 मार्च 1948


झांगर का रण – शौर्य की अमर कहानी

17 मार्च 1948 – झांगर की धरती, जहां वीरता की नई परिभाषा लिखी जा रही थी। सिपाही हरी सिंह अग्रिम पंक्ति में थे, उनकी टुकड़ी पीर थिल नक्का की ओर बढ़ रही थी। जैसे ही उन्होंने आगे बढ़ना शुरू किया, शत्रु की ओर से तीव्र गोलीबारी होने लगी। गोलीबारी इतनी घातक थी कि उनकी पूरी सेक्शन ज़मीन पर गिर पड़ी, लेकिन हरी सिंह ने हार नहीं मानी।

एक बंकर से लगातार गोलियां बरस रही थीं। बिना समय गंवाए, उन्होंने अपनी पूरी ताकत से हथगोला फेंका और बंकर की ओर बढ़े। उनकी स्टेनगन से निकली गोलियों ने शत्रु के दोनों रक्षकों को हमेशा के लिए शांत कर दिया। लेकिन युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ था।

दूसरे बंकर से आई सटीक गोलीबारी ने उनके घुटने को घायल कर दिया। दर्द से कराहने के बजाय, उन्होंने अपने जख्मों की परवाह किए बिना, दूसरा हथगोला निकाला और दाग दिया। धमाके के साथ एक शत्रु सैनिक ढेर हो गया और दूसरा डरकर भाग खड़ा हुआ।

जब उनकी टुकड़ी आगे बढ़ी, तभी अचानक दुश्मन के एक अधिकारी के नेतृत्व में एक अन्य दस्ते ने उन पर हमला बोल दिया। हरी सिंह सबसे आगे थे—20 गज की दूरी पर। वे बिना रुके आगे बढ़े और दुश्मन के अधिकारी को भी ढेर कर दिया।

अपने साहस और अद्वितीय वीरता से, उन्होंने चार दुश्मनों को मार गिराया और दो बंकर ध्वस्त कर दिए। वे किसी भी क्षण वीरगति को प्राप्त कर सकते थे, लेकिन उनके कदम कभी नहीं रुके। उनकी इसी असाधारण वीरता के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।


शौर्य को नमन

सिपाही हरी सिंह न केवल अपने साथियों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा हैं। उनका बलिदान, उनकी वीरता, और उनके अद्वितीय शौर्य को युगों-युगों तक याद किया जाएगा। आज जब हम भारतीय सेना के पराक्रम की बात करते हैं, तो सिपाही हरी सिंह जैसे अमर वीरों को याद करना हमारा कर्तव्य बनता है।

“जो देश के लिए मिट जाते हैं, उनका कर्ज़ कभी नहीं उतारा जा सकता!”

जय हिंद!

On this day, March 17, we commemorate Shaurya Diwas—a day to honor the extraordinary courage and sacrifice of our brave soldiers who laid down their lives for the nation. Today, let us remember and salute Sepoy Hari Singh, a recipient of the prestigious Mahavir Chakra for his unparalleled bravery during the India-Pakistan War of 1947-48.

Sepoy Hari Singh, serving with the Punjab Regiment, 1 Patiala (RS Infantry), was part of a historic battle at Jhangar in Jammu & Kashmir. On March 17, 1948, during the assault on Pir Thil Nakka, Hari Singh was a rifleman in the leading company. As the attack unfolded, his section found itself under intense enemy fire, forcing them to take cover on the ground. Amidst the chaos, Hari Singh spotted an enemy bunker. Without hesitation, he hurled a grenade at it, charged forward, and using his Sten gun, eliminated both enemy defenders inside.

But the danger was far from over. As he pressed on, another enemy bunker opened fire on him with deadly accuracy. Undeterred, even as a bullet struck his knee, Hari Singh displayed extraordinary grit. He lobbed a second grenade at the nearest enemy position, killing one soldier and forcing another to flee. Moments later, as the rest of his company caught up, an enemy section led by an officer emerged from a hidden post. Despite being 20 yards ahead of his comrades, Hari Singh fearlessly engaged the enemy, taking down their officer in a fierce confrontation.

Through his individual actions, Sepoy Hari Singh eliminated four enemy soldiers, including an officer, and destroyed two fortified enemy positions. In the face of relentless and precise enemy fire, he showed no regard for his own safety, risking his life at every moment. For his exceptional courage and valor, Sepoy Hari Singh was rightfully awarded the Mahavir Chakra, a testament to his indomitable spirit and dedication to the nation.

Today, as we reflect on his heroic deeds, let us honor not just Hari Singh but all the brave hearts who have fought valiantly to protect our motherland. Their sacrifices remind us of the price of freedom and the strength of our armed forces.

To continue supporting the families of our martyrs and to keep their legacy alive, organizations like Shaurya Naman are doing commendable work. You can learn more about their efforts, contribute to their cause, or join their mission to pay tribute to our heroes through their official platforms:


शौर्य नमन – वीरों का सम्मान

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कारगिल का वो शेर: नायक दीपचंद – गोला-बारूद की भूख और देश की रक्षा का जुनून https://shauryasaga.com/karagil-ka-wo-sher-nayak-deepchand-fauji/ https://shauryasaga.com/karagil-ka-wo-sher-nayak-deepchand-fauji/?noamp=mobile#respond Mon, 03 Mar 2025 13:05:19 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5344

हरियाणा की मिट्टी में जन्मा एक ऐसा योद्धा, जिसने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने दोनों पैर और एक हाथ खो दिए, लेकिन हौसला? वो आज भी आसमान छूता है। हिसार के पाबड़ा गांव के नायक दीपचंद की शौर्यगाथा ऐसी है कि इसे सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और सीना गर्व से चौड़ा। कारगिल विजय दिवस के मौके पर जब देश अपने शहीदों को याद करता है, तब दीपचंद जैसे जिंदा जांबाजों की कहानी हमें बताती है कि वीरता सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हमारे बीच सांस लेती है।

जंग का मैदान और दीपचंद का जज्बा

1999 की सर्दियां, कारगिल की बर्फीली चोटियां, और दुश्मन की गोलियां। भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़ी उस जंग में दीपचंद मिसाइल रेजिमेंट के एक गनर थे। वो बताते हैं, “जब हमें युद्ध के लिए मूव करने का ऑर्डर मिला, हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। पहला गोला मेरी गन चार्ली-2 से निकला और वो सीधे निशाने पर लगा।” उस एक पल में शुरू हुई उनकी बटालियन की वो कहानी, जिसमें 10 हजार राउंड फायर किए गए और 8 बार गन पोजीशन बदली गई। कंधों पर तोप उठाकर चलते थे ये जांबाज, ठंड में कपड़ों की परवाह नहीं, बस एक ही मकसद – दुश्मन को उसकी औकात दिखाना।

दीपचंद की आवाज में आज भी वही जोश झलकता है जब वो कहते हैं, “हम सप्लाई वालों से कहते थे – खाना मिले न मिले, गोला-बारूद ज्यादा चाहिए। दुश्मन ने हमारी जमीन पर कब्जा किया था, उसे खदेड़ना था।” उनकी बटालियन को 12 गैलेंट्री अवॉर्ड्स मिले और कारगिल की जीत का तमगा उनके सीने पर चमकता है।

वो हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया

लेकिन जंग का मैदान सिर्फ जीत की कहानियां नहीं लिखता, वो बलिदान भी मांगता है। ऑपरेशन पराक्रम के दौरान जब दीपचंद और उनके साथी वापसी की तैयारी कर रहे थे, तभी एक तोप का गोला फट गया। वो पल दीपचंद की जिंदगी का सबसे काला पल बन गया। धमाके में उनके दोनों पैर और एक हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए। दो और सैनिक भी घायल हुए। खून इतना बहा कि डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के लिए 17 बोतल खून चढ़ाया। जिंदा रखने की जद्दोजहद में उनकी दोनों टांगें घुटनों तक और एक हाथ काटना पड़ा।

कोई और होता तो शायद टूट जाता, लेकिन दीपचंद हरियाणा के उस मिट्टी से बने थे, जो हार नहीं मानती। आज उनके घुटनों तक नकली पैर हैं, फिर भी वो फौजी सलामी देते हैं – दाहिने बाजू से, सीना तानकर।

“हम सामने नहीं लड़े, पर सपोर्ट से दुश्मन हारा”

दीपचंद कहते हैं, “मैं दुश्मन के आमने-सामने तो कभी नहीं हुआ, लेकिन हमारी आर्टिलरी फायरिंग ने इन्फेंट्री को आगे बढ़ने की ताकत दी।” युद्ध में आर्टिलरी सपोर्ट की अहमियत को वो बखूबी समझते हैं। उनकी गन की गूंज ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे।

आज भी जिंदा है वो फौजी

1989 में सेना में भर्ती हुए दीपचंद कश्मीर के कई जोखिम भरे ऑपरेशन्स का हिस्सा रहे। कारगिल के बाद भी वो सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, अपनी कहानियां सुनाते हैं। जो भी उनसे मिलता है, उनकी जंग की दास्तां सुने बिना रह नहीं पाता। कारगिल विजय दिवस पर उन्हें देशभर में सम्मानित किया जाता है, लेकिन उनकी असली पहचान वो भावुक आंखें हैं, जो जंग के दिनों को याद करते हुए चमक उठती हैं।

शौर्य का सबक

नायक दीपचंद की कहानी सिर्फ एक सैनिक की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो कहता है – शरीर टूट सकता है, पर हौसला नहीं। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर लिखी उनकी गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है कि देश के लिए कुछ भी कुर्बान करने का मतलब क्या होता है। वो कहते हैं, “हमें जीत का सौभाग्य मिला, और यही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मेडल है।”

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ब्रिगेडियर जोगिन्दर सिंह बक्शी (महावीर चक्र) Brigadier Joginder Singh Bakshi (Mahavir Chakra) https://shauryasaga.com/brigadier-joginder-singh-bakshi-mahavir-chakra%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d/ https://shauryasaga.com/brigadier-joginder-singh-bakshi-mahavir-chakra%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d/?noamp=mobile#respond Fri, 28 Feb 2025 13:07:12 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5334

शौर्य को नमन “जो वीरता की मिसाल बन गए, उनके बलिदान को हम कभी नहीं भूलेंगे।”

——-शौर्यनमन——- आई सी 4870 ब्रिगेडियर बक्शी, जोगिन्दर सिंह (महावीर चक्र)

आज हम याद करते हैं ब्रिगेडियर जोगिन्दर सिंह बक्शी (महावीर चक्र) को, जिनका जन्म 10 मार्च 1928 को कौंतिला (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता श्री मान सिंह बक्शी के परिवार से कई सदस्यों ने भारतीय सेना में अपनी सेवा देकर नाम कमाया। ब्रिगेडियर बक्शी को 4 जून 1950 को जाट रेजिमेंट में कमीशन मिला और बाद में वे मेजर जनरल के पद तक पहुंचे।

‘मिज़ो हिल्स’ में उनकी शानदार सेवा के लिए उन्हें विशिष्ट सेवा मैडल से सम्मानित किया गया। लेकिन उनकी असली वीरता की गाथा 1971 के भारत-पाक युद्ध में सामने आई। पूर्वी मोर्चे पर 340 माउंटेन ब्रिगेड ग्रुप के कमांडर के रूप में उन्होंने अदम्य साहस और सैन्य कुशलता दिखाई। 6 दिसंबर 1971 को उन्हें पीरगंज में सड़क अवरोध स्थापित करने का आदेश मिला। इसके लिए नवाबगंज-चाँदीपुर-पीरगंज अक्ष पर आगे बढ़ना था।

ब्रिगेडियर बक्शी ने इस अभियान की योजना इतनी सूझबूझ से बनाई कि 7 से 16 दिसंबर के बीच दुश्मन के मजबूत ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। इस दौरान बोगरा जैसे प्रमुख नगर पर भी कब्जा किया गया। उनकी रणनीति और साहस ने दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। बड़ी संख्या में शत्रु सैनिक बंदी बनाए गए और एक ब्रिगेड कमांडर सहित दुश्मन का भारी साजो-सामान भी हाथ लगा।

इस असाधारण वीरता के लिए ब्रिगेडियर जोगिन्दर सिंह बक्शी को महावीर चक्र से नवाजा गया। उनका जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।

आइए, अपने शहीदों और वीरों को याद करें। शौर्य नमन जैसी संस्थाएं हमारे शहीदों के परिवारों के लिए काम कर रही हैं। आप भी इस नेक काम का हिस्सा बन सकते हैं।

    • संपर्क: +91 91110-10008

#शौर्यनमन #महावीरचक्र #भारतीयसेना #जयहिंद #वीरगाथा #शहीदोंकोनमन #ProudIndian #IndianArmedForces #SaluteToSoldiers #BraveHearts

 

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हवलदार थामस फिलिपोस: एक सच्चे वीर की शौर्य गाथा https://shauryasaga.com/havildar-thomas-philipose-a-saga-of-true-valor/ https://shauryasaga.com/havildar-thomas-philipose-a-saga-of-true-valor/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:37:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5293

——-शौर्यनमन——-
2550166
हवलदार फिलिपोस, थामस
(महावीर चक्र)

8 जुलाई 1941 को केरल के अल्लिप्पी, इडायरनमुला में जन्मे हवलदार थामस फिलिपोस एक ऐसे सैनिक थे, जिन्होंने अपनी वीरता से देश का नाम रोशन किया। उनके पिता श्री फिलिपोस के घर में जन्मे इस साहसी योद्धा ने 8 जुलाई 1961 को 16 मद्रास (द्रावनकोर) में अपनी सेवा शुरू की। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनकी अदम्य साहस और नेतृत्व की कहानी आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

 

1971 का युद्ध और बंसतार नदी का मोर्चा

 

1971 में 16 मद्रास को पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किया गया था। उनका मिशन था बंसतार नदी के उस पार एक पुल-पदाधार स्थापित करना, ताकि भारतीय सेना आगे बढ़ सके। इसके लिए उन्हें 15 दिसंबर तक सराजचाक और लालियाल पर कब्जा करना था। लेकिन यह आसान नहीं था। दुश्मन ने नदी के दोनों ओर गहरी सुरंगें खोद रखी थीं, जो मशीन गन की प्रभावी फायर से सुरक्षित थीं। सुरंगों के बीच पैदल सेना और मशीन गन के “नेस्ट” तैनात थे। बंकरों को संचार खाइयों और वैकल्पिक ठिकानों से जोड़ा गया था, और गांव में तोपखाने की चौकियां हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थीं।

 

ऐसी मजबूत रक्षा पंक्ति को तोड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण था, मगर 16 मद्रास ने इसे अपनी हिम्मत और आत्मविश्वास से स्वीकार किया।

 

संकट में संभाला मोर्चा

 

15 दिसंबर की रात, हवलदार थामस फिलिपोस “सी” कंपनी के साथ लालियाल पर धावा बोलने निकले। दुश्मन ने भारी गोलाबारी और मशीन गन से हमला किया। इस दौरान प्लाटून कमांडर गंभीर रूप से घायल हो गया, और कई सैनिक हताहत हो गए। अब सिर्फ 15 सैनिक बचे थे। ऐसे संकट में हवलदार फिलिपोस ने कमान संभाली। उन्होंने नन्ही टुकड़ी के साथ दुश्मन पर जोरदार हमला बोला और लक्ष्य तक पहुंच गए।

 

लेकिन दुश्मन ने हार नहीं मानी। जवाबी हमले की तैयारी शुरू हुई। तब हवलदार फिलिपोस ने अपने सैनिकों के साथ संगीनें चढ़ाईं और दुश्मन पर टूट पड़े। उनकी प्रचंडता से दुश्मन घबरा गया और पीछे हट गया। इस लड़ाई में हवलदार फिलिपोस को गोली लगी, फिर भी वे डटे रहे। युद्धभूमि से निकलने से पहले उन्हें एक और गहरी चोट लगी, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं डगमगाया।

 

महावीर चक्र से सम्मानित

 

अपने दृढ़ नेतृत्व और असाधारण साहस के लिए हवलदार थामस फिलिपोस को भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया। उनकी यह गाथा हमें याद दिलाती है कि सच्चा साहस संख्याओं से नहीं, संकल्प से नापा जाता है।

 

शौर्य नमन: शहीदों का सम्मान

 

“शौर्य नमन” एक ऐसा संगठन है जो हमारे वीर शहीदों और उनके परिवारों के सम्मान के लिए समर्पित है। हवलदार थामस फिलिपोस जैसे नायकों की कहानियां हमें प्रेरित करती हैं कि हम उनके बलिदान को कभी न भूलें।

 

 

 

 

 

 

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आइए, हम सब मिलकर अपने शहीदों को सलाम करें और उनके परिवारों के साथ खड़े हों।
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बलिदान दिवस -नायक जिदान बागे शौर्य चक्र (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/balidan-diwas-naik-jidan-bage-shaurya-chakra-posthumous/ https://shauryasaga.com/balidan-diwas-naik-jidan-bage-shaurya-chakra-posthumous/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:23:51 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5286

बलिदान दिवस – शौर्य नमन
नायक जिदान बागे
4255634Y | 18-01-1958 – 27-02-1991
शौर्य चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना: श्रीमती सुबाशी बारला
यूनिट: 7 बिहार रेजिमेंट
आतंकवाद विरोधी अभियान (पंजाब)

नायक जिदान बागे का जन्म 18 जनवरी 1958 को बिहार (अब झारखंड) के गुमला जिले के टाटी कुरकुरा गांव में हुआ। बचपन से ही उन्हें अपने भीतर की वीरता और साहस का अहसास था, और वे जानते थे कि इसका सच्चा उपयोग भारतीय सेना में ही हो सकता है। माता-पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद, उनकी हिचक को दरकिनार करते हुए, 29 जुलाई 1977 को वे बिहार रेजिमेंट में रंगरूट बनकर सेना में शामिल हुए। प्रशिक्षण के बाद उन्हें 7 बिहार बटालियन में सिपाही के रूप में नियुक्त किया गया। 25 मार्च 1981 को उनका विवाह हुआ।

अपनी बटालियन के साथ विभिन्न चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेवा देते हुए वे नायक के पद तक पहुँचे। 80 और 90 के दशक में पंजाब आतंकवाद से अशांत था। 1991 में नायक जिदान बागे पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियानों का हिस्सा थे।

27 फरवरी 1991 को गोपनीय सूचना मिली कि लुधियाना जिले के राजेवाल गांव में गेहूं के खेतों में खूंखार आतंकवादी छिपे हैं। नायक जिदान बागे ने तुरंत अपने साथी सैनिकों के साथ मिलकर आतंकियों को घेर लिया और उन्हें आत्मसमर्पण करने की चुनौती दी। जवाब में आतंकियों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। इस अप्रत्याशित हमले में नायक जिदान बागे को संभलने का मौका नहीं मिला और वे कई गोलियों से गंभीर रूप से घायल हो गए।

फिर भी, अपने घावों और खून से लथपथ होने के बावजूद, उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए आतंकियों की ओर बढ़ना जारी रखा और गोलियां चलाते रहे। उनकी इस अद्भुत वीरता से उस मुठभेड़ में 5 आतंकी ढेर हुए। नायक जिदान बागे ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन देश की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

उनके असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प के लिए उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। “Balidan Diwas – Naik Jidan Bage, Shaurya Chakra (Posthumous)”

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हवलदार कुल बहादुर थापा शौर्य चक्र https://shauryasaga.com/shaurya-diwas-a-tribute-to-valor-havaldar-kul-bahadur-thapa-shaurya-chakra/ https://shauryasaga.com/shaurya-diwas-a-tribute-to-valor-havaldar-kul-bahadur-thapa-shaurya-chakra/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:16:38 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5283

आज शौर्य दिवस पर, हम हवलदार कुल बहादुर थापा के अदम्य साहस को नमन करते हैं, जिन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। 9 पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेस) के इस वीर सैनिक ने फरवरी 2018 में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान अपनी बहादुरी से देश का मान बढ़ाया।

जम्मू-कश्मीर के सुंदरबनी सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर तैनात हवलदार थापा ने 27 फरवरी 2018 को चार सशस्त्र दुश्मनों की गतिविधि देखी। बिना片刻 हिचकिचाहट के, उन्होंने अपनी टुकड़ी को आगे बढ़ाया। कठिन पहाड़ी इलाकों और ठंडी नदी को पार करते हुए, उन्होंने एक खड़ी चट्टान पर चढ़कर अपनी टीम को स्थिति में लाया और दुश्मनों से मुकाबला किया।

जब दुश्मनों की ताबड़तोड़ गोलीबारी ने हमारे सैनिकों को दबाव में लिया, तो हवलदार थापा गोलियों की बौछार के बीच रेंगते हुए अपनी स्थिति बदलते रहे। करीब से दो आतंकियों को ढेर कर और दो अन्य को हथगोले से घायल कर, उन्होंने इस मुठभेड़ में असाधारण वीरता और नेतृत्व का परिचय दिया।

इस अभूतपूर्व साहस के लिए, महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हवलदार कुल बहादुर थापा को शौर्य चक्र से नवाजा। उनकी यह गाथा हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।

उनकी वीरता की कहानी यहाँ देखें: YouTube लिंक

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