#shaheed – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Thu, 08 Jan 2026 09:46:21 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 #shaheed – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Rifleman N Khatnei Konyak https://shauryasaga.com/rifleman-n-khatnei-konyak-mon-nagaland/ https://shauryasaga.com/rifleman-n-khatnei-konyak-mon-nagaland/?noamp=mobile#respond Thu, 08 Jan 2026 09:46:21 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6061

Rifleman N Khatnei Konyak मोन के वीर सपूत: राइफलमैन एन. खतनेई कोन्याक की शौर्य गाथा

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों की दुर्गम पहाड़ियों में बहादुरी और बलिदान की कहानियाँ मिट्टी के कण-कण में रची-बसी हैं। इन्हीं नायकों में एक नाम राइफलमैन (जनरल ड्यूटी) एन. खतनेई कोन्याक Rifleman N Khatnei Konyak का है ,

यह केवल एक सैनिक की कहानी नहीं है, बल्कि उस अटूट साहस की मिसाल है जो तब और भी निखर कर आता है जब परिस्थितियाँ सबसे कठिन होती हैं।


जन्म और प्रारंभिक जीवन

Rifleman N Khatnei Konyak
Rifleman N Khatnei Konyak

राइफलमैन एन. खतनेई कोन्याक का जन्म 26 फरवरी 1995 को नागालैंड के मोन (Mon) जिले के एक छोटे से गाँव तन्हाई (Tanhai) में हुआ था। वह एक साधारण लेकिन स्वाभिमानी कोन्याक परिवार से ताल्लुक रखते थे। कोन्याक जनजाति अपनी योद्धा परंपरा और अटूट साहस के लिए जानी जाती है, और खतनेई के रगों में यही वीरता विरासत में मिली थी। इसी गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाते हुए, खतनेई असम राइफल्स (भारत का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल) में शामिल हुए।

कर्तव्य पथ और सैन्य सेवा

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने कड़ी मेहनत की और शारीरिक दक्षता परीक्षा उत्तीर्ण कर असम राइफल्स (Assam Rifles) में शामिल हुए। उनका चयन उनकी मेहनत और अटूट दृढ़ संकल्प का परिणाम था।

असम राइफल्स में शामिल होने के बाद, खतनेई को 46वीं बटालियन में तैनात किया गया। उनकी कर्तव्यनिष्ठा और तत्परता को देखते हुए उन्हें अक्सर महत्वपूर्ण मिशनों का हिस्सा बनाया जाता था। अपनी शहादत के समय, वे कमांडेंट की क्विक रिएक्शन टीम (QRT) के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में कार्यरत थे। यह टीम किसी भी आपातकालीन स्थिति या हमले का तुरंत जवाब देने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित होती है।

13 नवंबर 2021: वह ऐतिहासिक और दुखद दिन

Rifleman N Khatnei Konyak
Rifleman N Khatnei Konyak

13 नवंबर 2021 की सुबह मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में तनावपूर्ण थी। Rifleman N Khatnei Konyak को कमांडेंट की क्विक रिएक्शन टीम (QRT) का हिस्सा बनाया गया था।

उनकी टुकड़ी बेहहेंग (Beheng) कंपनी से सिंघत (Singhat) कंपनी की ओर बढ़ रही थी। सीमावर्ती इलाकों में इस तरह की आवाजाही हमेशा जोखिम भरी होती है, जहाँ कदम-कदम पर सतर्कता जरूरी है।

घात लगाकर किया गया हमला (The Ambush)

सुबह लगभग 11:15 बजे, जब काफिला बेहहेंग कंपनी से करीब 8 किलोमीटर उत्तर में एक सुनसान इलाके से गुजर रहा था, तभी आतंकवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया।

  • भारी गोलीबारी: उग्रवादियों ने पहले IED धमाका किया और फिर ऊँचाइयों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।

  • अदम्य साहस: अपनी सुरक्षा की तनिक भी परवाह किए बिना, राइफलमैन खतनेई कोन्याक ने तुरंत अपनी पोजीशन संभाली। एक QRT सदस्य के रूप में, उनकी जिम्मेदारी जवाबी हमला कर अपने साथियों को सुरक्षित निकालना था।

  • अंतिम सांस तक संघर्ष: भीषण गोलाबारी के बीच, खतनेई को कई गोलियां लगीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, वह तब तक लड़ते रहे जब तक उनकी सांसों ने साथ नहीं छोड़ दिया।

सर्वोच्च बलिदान और सम्मान

इस कायराना हमले में असम राइफल्स के कर्नल विप्लव त्रिपाठी, उनकी पत्नी, उनके मासूम बेटे और Rifleman N Khatnei Konyak सहित चार अन्य वीर जवानों ने शहादत प्राप्त की।

मरणोपरांत ‘सेना मेडल’

सेना मेडल SM
सेना मेडल SM

Rifleman N Khatnei Konyak की वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत ‘सेना मेडल’ (Sena Medal – Gallantry) से सम्मानित किया गया है।

भारत सरकार ने उनके अदम्य साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण को मान्यता देते हुए 75वें स्वतंत्रता दिवस (2022) के अवसर पर इस सम्मान की घोषणा की थी।

  • पुरस्कार: सेना मेडल (वीरता/Gallantry)

  • घोषणा: 2022 (मरणोपरांत)

  • कारण: 13 नवंबर 2021 को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में उग्रवादियों के घात लगाकर किए गए हमले के दौरान अपनी जान की परवाह किए बिना वीरतापूर्वक लड़ना और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देना।

असम राइफल्स के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे योद्धा के रूप में दर्ज है, जिसने भारी गोलाबारी के बीच भी पीछे हटने के बजाय दुश्मन का डटकर मुकाबला किया।

Rifleman N Khatnei Konyak के बलिदान ने पूरे नागालैंड और देश को गमगीन कर दिया, लेकिन उनके गांव में हर सिर गर्व से ऊंचा था। उन्हें पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। वह अपने पीछे वीरता की एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

“शहीद कभी मरते नहीं, वे हमारे इतिहास के पन्नों और दिलों में अमर हो जाते हैं।”


वीर शहीद राइफलमैन एन. खतनेई कोन्याक को शत-शत नमन। Rifleman N Khatnei Konyak

Rifleman N Khatnei Konyak
Rifleman N Khatnei Konyak

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Khudiram Bose The Fearless Pioneer of Indian Revolution: 2025-Birthday Tribute शहीद खुदीराम बोस https://shauryasaga.com/khudiram-bose-birthday-tribute-2025/ https://shauryasaga.com/khudiram-bose-birthday-tribute-2025/?noamp=mobile#respond Wed, 03 Dec 2025 11:23:17 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6016

3 दिसंबर: वह दिन जब भारत की क्रांति को मिला सबसे युवा नायक

Khudiram Bose :- आज, 3 दिसंबर, का दिन भारतीय इतिहास में एक विशेष महत्व रखता है। यह वह दिन है जब भारत माता के सबसे कम उम्र के वीर सपूत खुदीराम बोस का जन्म 1889 में मिदनापुर की धरती पर हुआ था। सिर्फ 18 साल की उम्र में देश के लिए फाँसी के फंदे को चूमने वाले इस क्रांतिकारी की कहानी, हर भारतीय के लिए प्रेरणा का एक कभी न खत्म होने वाला स्रोत है।

खुदीराम बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसा नाम है जो साहस, क्रांति और सर्वोच्च बलिदान का पर्याय है। वह उन सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आवाज़ उठाई और अपनी जवानी देश के नाम कुर्बान कर दी। उनकी शहादत ने पूरे बंगाल और देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी।

Khudiram Bose
Khudiram Bose

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

  • जन्म: 3 दिसंबर 1889 को बंगाल प्रेसीडेंसी के मिदनापुर जिले (वर्तमान पश्चिम बंगाल) के हबीबपुर गाँव में।

  • परिवार: उनके पिता, त्रैलोक्यनाथ बोस, एक तहसीलदार थे, और माता, लक्ष्मीप्रिया देवी थीं। खुदीराम अपने माता-पिता की चौथी संतान थे, लेकिन उनसे पहले जन्मे उनके दो भाई बचपन में ही चल बसे थे। इसी कारण उनका नामकरण ‘खुदीराम’ किया गया, जिसका अर्थ है ‘थोड़ा सा (खुदी) मिला’, इस उम्मीद में कि वे जीवित रहेंगे।

  • बचपन: दुर्भाग्य से, खुदीराम ने बचपन में ही अपने माता-पिता दोनों को खो दिया। उनका पालन-पोषण उनकी बड़ी बहन, अपरूपा देवी और उनके पति ने किया।

क्रांति की ओर पहला कदम

Khudiram Bose खुदीराम बोस का मन बचपन से ही देश की दुर्दशा और ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों से आंदोलित था।

  • शैक्षणिक जीवन: उन्होंने तामलुक के हैमिल्टन हाई स्कूल और फिर मिदनापुर कॉलेजिएट स्कूल में पढ़ाई की। स्कूल के दिनों से ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित होने लगे थे।

  • युगान्तर से जुड़ाव: किशोरावस्था में ही, वे बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन युगान्तर पार्टी से जुड़ गए।

  • आरंभिक गतिविधियाँ: खुदीराम की पहली क्रांतिकारी भागीदारी 1905 में हुई, जब बंगाल का विभाजन हुआ। उन्होंने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

    • 1906 में, जब वे सिर्फ 16 वर्ष के थे, तब उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ क्रांतिकारी साहित्य वितरित करने के लिए दो बार गिरफ्तार किया गया, लेकिन कम उम्र के कारण उन्हें छोड़ दिया गया।

    • वह जल्द ही प्रसिद्ध बंगाली क्रांतिकारी नेता सत्येन बोस के नेतृत्व वाले एक गुप्त समाज के सक्रिय सदस्य बन गए।

मुजफ्फरपुर षड्यंत्र (1908)

Khudiram Bose
Khudiram Bose

Khudiram Bose खुदीराम बोस के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना मुजफ्फरपुर षड्यंत्र थी।

  • लक्ष्य: कलकत्ता (कोलकाता) के मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को मारना। किंग्सफोर्ड एक अत्यंत क्रूर और अत्याचारी ब्रिटिश अधिकारी था, जिसने देशभक्तों और स्वतंत्रता सेनानियों को कठोर दंड दिए थे।

  • योजना: किंग्सफोर्ड का तबादला मुजफ्फरपुर (बिहार) हो गया था। युगान्तर समूह ने किंग्सफोर्ड की हत्या की जिम्मेदारी खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी को सौंपी।

  • हमला: 30 अप्रैल 1908 को, खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझकर उस पर बम फेंक दिया।

  • दुर्भाग्य: दुर्भाग्य से, उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं था, बल्कि दो ब्रिटिश महिलाएं (बैरान कैनेडी की पत्नी और बेटी) थीं, जिनकी बम विस्फोट में मृत्यु हो गई।

गिरफ्तारी और शहादत

  • प्रफुल्ल चाकी का बलिदान: हमले के बाद, दोनों साथी अलग-अलग दिशाओं में भाग निकले। प्रफुल्ल चाकी ने ब्रिटिश पुलिस के हाथों पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या करके देश के लिए अपना बलिदान दिया।

  • खुदीराम की गिरफ्तारी: खुदीराम बोस पैदल चलते हुए लगभग 25 किलोमीटर दूर वैनी रेलवे स्टेशन (अब खुदीराम बोस पूसा रेलवे स्टेशन) पहुँचे। यहाँ पुलिस ने उन्हें पहचान लिया और गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के समय उनके पास पिस्तौल, 30 रुपये नकद और एक रेल का नक्शा था।

  • फाँसी: मुजफ्फरपुर की अदालत में खुदीराम बोस पर मुकदमा चला। उन्होंने बिना किसी डर के अपने अपराध को स्वीकार किया।

    • 11 अगस्त 1908 को, मात्र 18 वर्ष, 7 महीने और 11 दिन की आयु में, खुदीराम बोस को फाँसी दे दी गई।

विरासत और प्रभाव

Shaheed Khudiram Bose
Birthday Tribute: Amar Shaheed Khudiram Bose

Khudiram Bose खुदीराम बोस की शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक मोड़ साबित हुई।

  • क्रांति की आग: उनकी फाँसी की खबर ने पूरे बंगाल और देश को हिला दिया। खुदीराम बोस रातोंरात एक लोक नायक और शहीद बन गए।

  • गीत और लोक कथाएँ: खुदीराम की शहादत पर कई गीत रचे गए और उनकी वीरता की कहानियाँ पूरे देश में सुनाई गईं, जिसने अनगिनत युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। आज भी, बंगाली लोकगीतों में उनका उल्लेख होता है।

  • प्रेरणा: उनकी निडरता और मातृभूमि के लिए उनके बलिदान ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य युवा क्रांतिकारियों को प्रेरणा दी कि वे अंग्रेजों के खिलाफ सीधे संघर्ष में उतरें।

Khudiram Bose खुदीराम बोस भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में अमर हैं—वह एक ऐसे किशोर थे जिन्होंने मौत से पहले मुस्कान चुनी और भारत माँ की आजादी के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।


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शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्मा Martyred Inspector Ashish Sharma https://shauryasaga.com/shaheed-inspector-ashish-sharma/ https://shauryasaga.com/shaheed-inspector-ashish-sharma/?noamp=mobile#respond Thu, 20 Nov 2025 11:06:00 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5960 शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्मा को बालाघाट में भावुक विदाई: पुलिसकर्मी से लेकर एसपी तक फूट-फूटकर रोए

नरसिंहपुर/बालाघाट/राजनांदगांव, 20 नवंबर 2025: मध्य प्रदेश पुलिस की स्पेशल एंटी-नक्सल हॉक फोर्स के बहादुर इंस्पेक्टर आशीष शर्मा, जो छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए, उनके पार्थिव शरीर को गुरुवार को बालाघाट पुलिस लाइन लाया गया। यहां श्रद्धांजलि सभा में शहीद का चेहरा देखते ही पूरा पुलिस महकमा भावुक हो गया। हॉक फोर्स के जवान अपने कप्तान बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। सहकर्मियों को इस हालत में देखकर एसपी साहब खुद भी फफक पड़े। यह दृश्य किसी की भी आंखें नम कर देने वाला था।

मुठभेड़ का पूरा घटनाक्रम 19 नवंबर 2025 को सुबह करीब 7-8 बजे छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के बोरतालाब थाना क्षेत्र के कौहापानी-कंघुर्रा जंगलों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र पुलिस की संयुक्त टीम नक्सल विरोधी अभियान चला रही थी। इंटेलिजेंस इनपुट मिला था कि तीन राज्यों की सीमा पर नक्सलियों का एक बड़ा ग्रुप छिपा हुआ है। टीम का नेतृत्व कर रहे इंस्पेक्टर आशीष शर्मा आगे बढ़े ही थे कि घात लगाए नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने कई नक्सलियों को मार गिराया (कुछ रिपोर्ट्स में 7 नक्सलियों के मारे जाने की बात), लेकिन आशीष शर्मा को सीने, पेट और पैर में متعدد गोलियां लगीं। उन्हें तुरंत डोंगरगढ़ अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उन्होंने वीरगति प्राप्त की। हेलीकॉप्टर से बेहतर इलाज के लिए ले जाने की तैयारी हो रही थी, लेकिन तब तक वे शहीद हो चुके थे।

शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्मा Martyred Inspector Ashish Sharma
शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्माMartyred Inspector Ashish Sharma

कौन थे शहीद आशीष शर्मा? Martyred Inspector Ashish Sharma

  • उम्र: महज 29-30 साल (कुछ रिपोर्ट्स में 40 का उल्लेख, लेकिन ज्यादातर में युवा बताया गया)
  • मूल निवासी: नरसिंहपुर जिले की गाडरवाड़ा तहसील के बोहानी गांव
  • पदस्थापना: बालाघाट हॉक फोर्स (किरनापुर क्षेत्र की कीन्ही चौकी प्रभारी)
  • उपलब्धियां: हॉक फोर्स के ‘आइडियल कमांडो’ कहे जाते थे। दो बार भारत सरकार से गैलेंट्री अवॉर्ड (वीरता पदक) मिल चुका था। फरवरी 2025 में बालाघाट के रौंदा जंगलों में हुई मुठभेड़ में तीन महिला नक्सलियों को मार गिराने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके लिए आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला और सब-इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर बने। पहले इंटेलिजेंस में आरक्षक रह चुके थे।
  • निजी जीवन: जनवरी 2026 में शादी होने वाली थी। परिवार में माता-पिता और छोटा भाई अंकित शर्मा हैं।

बालाघाट में भावुक श्रद्धांजलि शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा पुलिस लाइन पहुंचा तो छोटा भाई अंकित साष्टांग दंडवत होकर गिर पड़ा और दहाड़ें मारकर रोने लगा। हॉक फोर्स के जवानों ने अपने ‘आइडियल’ को अंतिम सलामी दी, लेकिन कोई खुद को रोक नहीं पाया। एसपी से लेकर सिपाही तक सबकी आंखें नम थीं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद बालाघाट पहुंचे और श्रद्धांजलि अर्पित की।

सीएम मोहन यादव का बयान सीएम ने X पर लिखा: “हॉक फोर्स के निरीक्षक आशीष शर्मा नक्सलियों से मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए। मैं उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। नक्सल उन्मूलन के राष्ट्रीय अभियान में उनका सर्वोच्च बलिदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।” सीएम ने घोषणा की कि शहीद के परिवार को सभी सुविधाएं दी जाएंगी, छोटे भाई को सरकारी नौकरी मिलेगी और सम्मान निधि प्रदान की जाएगी।

शहीद आशीष शर्मा की बहादुरी के किस्से पुलिस ट्रेनिंग में नए जवानों को सुनाए जाते थे। उनका बलिदान नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत करेगा। पूरा प्रदेश उनके परिवार के साथ है।

Martyred Inspector Ashish Sharma

ओम शांति! शहीद आशीष शर्मा अमर रहें!

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Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक: एक साधारण गांव से असाधारण बलिदान की कहानी https://shauryasaga.com/ek-sadharan-gaao-se-sowar-pangala-kartheek/ https://shauryasaga.com/ek-sadharan-gaao-se-sowar-pangala-kartheek/?noamp=mobile#respond Mon, 08 Sep 2025 11:53:10 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5466 भारत की अडिग भावना में उन सामान्य लोगों की कहानियां छिपी हैं जो असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचते हैं, अपने देश के लिए अटूट प्रेम से प्रेरित होकर। ऐसी ही एक कहानी है Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक की, जो आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाले साहसी सैनिक बने। मात्र 28 वर्ष की आयु में, उन्होंने कर्तव्य की राह में सर्वोच्च बलिदान दिया, और साहस व निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बन गए। आइए, आज हम उनके जीवन और विरासत पर नजर डालते हैं, और उस व्यक्ति की कहानी को विस्तार से जानते हैं जिसका समर्पण हमें प्रेरित करता है।

एक छोटे से गांव में शुरुआत

Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक का जन्म और पालन-पोषण आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के बंगारुपालेम मंडल में स्थित एक छोटे से गांव, एगुवा रागिमनुपेंटा में हुआ था। यहां का जीवन सादा था, ग्रामीण भारत की लय में बंधा हुआ—खेतों में कठिन परिश्रम, परिवार के मजबूत रिश्ते और समुदाय की गहरी भावना। वह श्री वरदराजुलु और श्रीमती सेल्वी के छोटे बेटे थे, जिन्होंने अपने बच्चों में मेहनत और गर्व के मूल्य स्थापित किए। कार्तिक अपने बड़े भाई राजेश के साथ बड़े हुए, सपनों और चुनौतियों को साझा करते हुए।

Sowar Pangala Kartheek बचपन से ही  भारतीय सशस्त्र बलों की कहानियों से प्रभावित थे। सैनिकों की वीरता, उनके लौह अनुशासन और राष्ट्र के लिए निस्वार्थ सेवा की कहानियां उनके नन्हे दिल में एक चिंगारी जगा गईं। चाहे टीवी पर परेड देखना हो या स्थानीय सैनिकों की कहानियां सुनना, वह सपने देखते थे कि एक दिन वह भी वर्दी पहनेंगे। यह कोई क्षणिक उत्साह नहीं था; यह एक जुनून था जो उनके साथ बड़ा हुआ, उनकी हर पसंद को आकार देता रहा और देश की सेवा करने की उनकी इच्छा को मजबूत करता रहा।

सपने को हकीकत में बदलने की अथक कोशिश

सपनों को हकीकत में बदलना आसान नहीं होता, खासकर जब आप सीमित संसाधनों वाले छोटे से गांव से हों। लेकिन Sowar Pangala Kartheek मेहनत से अनजान नहीं थे। उन्होंने पूरी लगन से पढ़ाई की, अपने शरीर को कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार किया और मानसिक रूप से आने वाली चुनौतियों के लिए खुद को मजबूत किया। उनकी मेहनत 2017 में रंग लाई, जब उनका चयन भारतीय सेना में हुआ—यह उनके परिवार और गांव के लिए गर्व का क्षण था।

नवसैनिक से सैनिक बनने की यात्रा कठिन सैन्य प्रशिक्षण से शुरू हुई, जहां Sowar Pangala Kartheek ने हर अभ्यास और ड्रिल में खुद को झोंक दिया। उन्होंने सैनिक कौशल की बुनियादी बातें सीखीं: हथियारों को सटीकता से संभालना, युद्ध रणनीतियों में महारत हासिल करना और मैदानी कौशल में निपुणता। अपनी मूल रेजिमेंट में तैनात होने के बाद, उन्होंने जल्दी ही बैरक की अनुशासित जिंदगी को अपना लिया। उनके साथी और अधिकारी जल्द ही उनकी निष्ठा को पहचान गए—वह हमेशा कठिन कार्यों के लिए स्वेच्छा से आगे रहते, अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देते और दबाव में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते। कार्तिक की सहनशक्ति और सकारात्मक रवैया ने उन्हें सभी के बीच सम्मान दिलाया, जिससे वह एक सच्चे पेशेवर सैनिक के रूप में उभरे।

जैसे-जैसे उनका करियर आगे बढ़ा, Sowar Pangala Kartheek को एक विशेष कार्य सौंपा गया जो उनकी अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा थी। उन्हें 22 राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) बटालियन में तैनात किया गया, जो जम्मू और कश्मीर के अस्थिर क्षेत्र में संचालित होने वाली एक विशेष उग्रवाद-निरोधी इकाई थी। राष्ट्रीय राइफल्स आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई के गुमनाम नायक हैं, जो खतरनाक अभियानों में विशेषज्ञता रखते हैं ताकि खतरों को खत्म किया जाए और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। कार्तिक के लिए, इसका मतलब था नियमित तैनाती की स्थिरता को छोड़कर नियंत्रण रेखा (एलओसी) के अप्रत्याशित खतरों का सामना करना। अगले कुछ वर्षों में, उन्होंने इस कठिन माहौल में अपने कौशल को और निखारा, एक सक्षम और नन्हा योद्धा बनकर उभरे। 2025 की शुरुआत तक, उनके पास लगभग आठ साल की सेवा थी, जो एक गांव के लड़के से युद्ध-कुशल सैनिक बनने की उनकी यात्रा का प्रमाण थी।

 बरमूला में निर्णायक अभियान: वीरता की एक रात

जनवरी 2025 में 22 आरआर बटालियन के लिए नई चुनौतियां आईं, जो जम्मू और कश्मीर के बरमूला जिले में उग्रवाद-निरोधी अभियानों में गहराई से शामिल थे। नियंत्रण रेखा के करीब यह क्षेत्र लंबे समय से आतंकी घुसपैठ का केंद्र रहा है। हथियारबंद समूह अक्सर सीमा पार करने की कोशिश करते हैं, जिससे सुरक्षा और नागरिकों के जीवन को गंभीर खतरा होता है। बटालियन, काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स (सीआईएफ) किलो और XV कोर—जिसे ‘चिनार कोर’ के नाम से भी जाना जाता है—के तहत संचालित हो रही थी, जिसका मुख्यालय श्रीनगर में है और जो कश्मीर घाटी में सैन्य अभियानों की देखरेख करता है।

25 जनवरी, 2025 को, सैन्य खुफिया विभाग को बरमूला जिले के ज़ालूरा गुज्जरपति क्षेत्र में कट्टर आतंकवादियों की मौजूदगी की विश्वसनीय जानकारी मिली। खुफिया सूत्रों ने संकेत दिया कि आतंकवादी एक बड़े हमले की योजना बना रहे थे और भारी हथियारों से लैस थे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा थे। सूचना का विश्लेषण करने के बाद, वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने 20 जनवरी, 2025 को एक खोज और नष्ट करने का अभियान शुरू करने का निर्णायक फैसला लिया, ताकि आतंकवादी अपनी योजनाओं को अंजाम देने से पहले खत्म हो जाएं। सैनिक पंगाला कार्तिक को इस उच्च जोखिम वाले अभियान के लिए हमलावर टीम में शामिल किया गया। खतरों से पूरी तरह वाकिफ होने के बावजूद, उन्होंने अपने कर्तव्य को अडिग दृढ़ता के साथ स्वीकार किया।

योजना के अनुसार, Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक और उनकी टीम ज़ालूरा गुज्जरपति क्षेत्र में पहुंची और बांदीपोरा सेक्टर के सोपोर क्षेत्र में खोज और घेराबंदी अभियान शुरू किया। अभियान को सावधानीपूर्वक अंजाम दिया गया, जिसमें सैनिकों ने सभी संभावित भागने के रास्तों को रणनीतिक रूप से अवरुद्ध कर दिया। जैसे ही वे आगे बढ़े, सैनिकों का सामना भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों से हुआ, जिन्होंने चुनौती मिलने पर तुरंत अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद एक तीव्र गोलीबारी हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने अंधेरे, उबड़-खाबड़ इलाके में भारी गोलीबारी की।

असाधारण साहस और बलिदान

Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक ने असाधारण साहस का प्रदर्शन करते हुए सबसे आगे रहकर आतंकवादियों से मुकाबला किया। खतरनाक परिस्थितियों और भारी जवाबी गोलीबारी के बावजूद, उन्होंने रणनीतिक रूप से आगे बढ़ते हुए सुनिश्चित किया कि आतंकवादी घेर लिए जाएं और भाग न सकें। हालांकि, इस भयंकर गोलीबारी के दौरान, Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक को कई गोलियां लगीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने आतंकवादियों से मुकाबला जारी रखा, असाधारण वीरता और निस्वार्थ भावना का प्रदर्शन किया। वह अंतिम क्षण तक लड़े, यह सुनिश्चित करते हुए कि अभियान सफलतापूर्वक पूरा हो और आतंकवादी निष्प्रभावी हो जाएं। उनके इस सर्वोच्च बलिदान के परिणामस्वरूप, एक बड़ा आतंकी खतरा टल गया, जिससे अनगिनत जjindagi बच गई। दुर्भाग्यवश, उनकी चोटों की गंभीरता के कारण, Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक अपनी चोटों के कारण शहीद हो गए, और 28 वर्ष की आयु में कर्तव्य की राह में अंतिम बलिदान दिया।

एक गौरवशाली विरासत

Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक अपने पिता श्री वरदराजुलु, माता श्रीमती सेल्वी और बड़े भाई श्री राजेश को पीछे छोड़ गए हैं। उनकी वीरता और बलिदान की कहानी न केवल उनके परिवार और गांव के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। वह एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर एक असाधारण सैनिक बने, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि साहस, समर्पण और निस्वार्थ सेवा किसी भी बाधा को पार कर सकती है। Sowar Pangala Kartheek सैनिक पंगाला कार्तिक की कहानी एक अनुस्मारक है कि हमारे सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाता। वे हमारे देश की नींव को मजबूत करते हैं, हमें एकजुट करते हैं और हमें यह याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता की कीमत अनमोल है।

आज, जब हम Sowar Pangala Kartheek  सैनिक पंगाला कार्तिक को याद करते हैं, तो आइए हम उनके बलिदान को सम्मान दें, न केवल उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करके, बल्कि उन मूल्यों को जीकर जो उन्होंने अपनाए थे—कर्तव्य, सम्मान और देश के प्रति प्रेम। उनकी स्मृति में, हम यह संकल्प लें कि हम एक ऐसे भारत के लिए काम करेंगे जो उनके सपनों और बलिदान के योग्य हो।

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कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी : एक अमर गाथा / Captain Karamjit Singh Bakshi https://shauryasaga.com/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a5%80/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a5%80/?noamp=mobile#respond Sat, 06 Sep 2025 12:44:40 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5462 Captain Karamjit Singh Bakshi

झारखंड के हज़ारीबाग के शांत और हरे-भरे झूलू पार्क क्षेत्र में 1998 में जन्मे कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी / captain karamjit singh bakshi एक साधारण लेकिन मूल्यों से परिपूर्ण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता श्री अजिंदर सिंह बक्शी और माता श्रीमती नीलू बक्शी ने उन्हें अनुशासन, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे गुणों से सजाया। अपनी बहन जैस्मिन के साथ उनका गहरा भावनात्मक जुड़ाव था, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। बचपन से ही करमजीत में देशभक्ति और साहस की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। उनकी आँखों में भारतीय सेना की वर्दी पहनकर मातृभूमि की सेवा करने का सपना बचपन से ही पल रहा था।

गुवाहाटी में अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान करमजीत ने न केवल पढ़ाई में उत्कृष्टता हासिल की, बल्कि खेल और अन्य गतिविधियों में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। भारतीय सशस्त्र बलों की कहानियाँ और सैनिकों की वीरता से प्रेरित होकर उन्होंने सेना में शामिल होने का दृढ़ संकल्प लिया। उनकी मेहनत और लगन ने उन्हें 2019 में भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त करने का गौरव दिलाया। वे 9 पंजाब बटालियन, पंजाब रेजीमेंट का हिस्सा बने, जो भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सम्मानित रेजीमेंट्स में से एक है।

एक साहसी अधिकारी

सेना में शामिल होने के बाद कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी / captain karamjit singh bakshi ने अपने नेतृत्व, साहस और अनुशासन से सभी का दिल जीत लिया। वे अपने साथियों के लिए एक मित्र, अधीनस्थों के लिए प्रेरणा और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए गर्व का प्रतीक थे। उनका हर कदम ‘देश पहले’ की भावना से प्रेरित था। चाहे कठिन परिस्थितियों में प्रशिक्षण हो या सीमा पर तैनाती, करमजीत ने हमेशा अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरे समर्पण के साथ किया। उनकी मुस्कान और सकारात्मक रवैया हर मुश्किल परिस्थिति में उनके साथियों का हौसला बढ़ाता था।

captain karamjit singh bakshi / कैप्टन करमजीत न केवल एक सैनिक थे, बल्कि एक संवेदनशील इंसान भी थे। वे अपने साथियों की छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखते और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहते। उनकी विनम्रता और साहस का यह अद्भुत संयोजन उन्हें एक आदर्श सैन्य अधिकारी बनाता था।

आक्नूर सेक्टर की घटना (11 फरवरी 2025)

11 फरवरी 2025 का दिन भारतीय सेना और देश के लिए एक दुखद दिन था। captain karamjit singh bakshi / कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी उस समय जम्मू-कश्मीर के आक्नूर सेक्टर में अपनी यूनिट, 9 पंजाब बटालियन के साथ तैनात थे। यह क्षेत्र नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास होने के कारण अक्सर घुसपैठ और संघर्षविराम उल्लंघन का गवाह रहता है। खुफिया सूचना के आधार पर उनकी टीम को एक संदिग्ध क्षेत्र में गश्त और टोही के लिए भेजा गया था।

लगभग 3:50 बजे, जब उनकी टीम एलओसी के पास कंटीले तारों के करीब थी, तभी आतंकियों द्वारा लगाए गए एक शक्तिशाली आईईडी में विस्फोट हो गया। इस भीषण धमाके में कैप्टन करमजीत / captain karamjit singh bakshi और उनके दो साथी गंभीर रूप से घायल हो गए। विस्फोट के तुरंत बाद दुश्मन की ओर से गोलीबारी शुरू हो गई। इस विपरीत परिस्थिति में भी कैप्टन करमजीत ने अपने नेतृत्व और साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपनी टीम को जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया और स्थिति को नियंत्रित करने में मदद की। हालांकि, इस दौरान उनकी और नायक मुकेश सिंह मनहास की जान चली गई। उनकी वीरता और बलिदान ने एक बार फिर साबित किया कि भारतीय सेना का हर सैनिक देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार रहता है।

अधूरी रह गई खुशियाँ

captain karamjit singh bakshi कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी  का बलिदान इसलिए और भी मार्मिक था क्योंकि वे अपने जीवन के एक नए और खूबसूरत अध्याय की शुरुआत करने वाले थे। उनकी शादी 5 अप्रैल 2025 को तय थी, और हज़ारीबाग में 29 मार्च से शादी की रस्में शुरू होने वाली थीं। परिवार, मंगेतर और दोस्त इस खुशी के मौके की तैयारियों में जुटे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 27 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले इस वीर सपूत ने न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे देश को गहरे शोक में डुबो दिया।

देश का अमर सपूत

captain karamjit singh bakshi कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी का जीवन और बलिदान भारतीय सेना की गौरवशाली परंपराओं का प्रतीक है। उनकी वीरता, नेतृत्व और देश के प्रति समर्पण की कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। वे अपने पीछे अपने माता-पिता, श्री अजिंदर सिंह बक्शी और श्रीमती नीलू बक्शी, बहन जैस्मिन और अपने मंगेतर को छोड़ गए, लेकिन उनकी शौर्य गाथा हमेशा जीवित रहेगी।

हज़ारीबाग का यह लाल captain karamjit singh bakshi  आज भी हर उस भारतीय के दिल में बस्ता है, जो देश के लिए बलिदान देने वालों का सम्मान करता है। कैप्टन करमजीत सिंह बक्शी की कहानी केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की है, जिसने अपने जीवन को देश के नाम समर्पित कर दिया। उनकी स्मृति में हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने देश के लिए हमेशा एकजुट और समर्पित रहेंगे।

captain karamjit singh bakshi

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बलिदान दिवस -नायक जिदान बागे शौर्य चक्र (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/balidan-diwas-naik-jidan-bage-shaurya-chakra-posthumous/ https://shauryasaga.com/balidan-diwas-naik-jidan-bage-shaurya-chakra-posthumous/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:23:51 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5286

बलिदान दिवस – शौर्य नमन
नायक जिदान बागे
4255634Y | 18-01-1958 – 27-02-1991
शौर्य चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना: श्रीमती सुबाशी बारला
यूनिट: 7 बिहार रेजिमेंट
आतंकवाद विरोधी अभियान (पंजाब)

नायक जिदान बागे का जन्म 18 जनवरी 1958 को बिहार (अब झारखंड) के गुमला जिले के टाटी कुरकुरा गांव में हुआ। बचपन से ही उन्हें अपने भीतर की वीरता और साहस का अहसास था, और वे जानते थे कि इसका सच्चा उपयोग भारतीय सेना में ही हो सकता है। माता-पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद, उनकी हिचक को दरकिनार करते हुए, 29 जुलाई 1977 को वे बिहार रेजिमेंट में रंगरूट बनकर सेना में शामिल हुए। प्रशिक्षण के बाद उन्हें 7 बिहार बटालियन में सिपाही के रूप में नियुक्त किया गया। 25 मार्च 1981 को उनका विवाह हुआ।

अपनी बटालियन के साथ विभिन्न चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेवा देते हुए वे नायक के पद तक पहुँचे। 80 और 90 के दशक में पंजाब आतंकवाद से अशांत था। 1991 में नायक जिदान बागे पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियानों का हिस्सा थे।

27 फरवरी 1991 को गोपनीय सूचना मिली कि लुधियाना जिले के राजेवाल गांव में गेहूं के खेतों में खूंखार आतंकवादी छिपे हैं। नायक जिदान बागे ने तुरंत अपने साथी सैनिकों के साथ मिलकर आतंकियों को घेर लिया और उन्हें आत्मसमर्पण करने की चुनौती दी। जवाब में आतंकियों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। इस अप्रत्याशित हमले में नायक जिदान बागे को संभलने का मौका नहीं मिला और वे कई गोलियों से गंभीर रूप से घायल हो गए।

फिर भी, अपने घावों और खून से लथपथ होने के बावजूद, उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए आतंकियों की ओर बढ़ना जारी रखा और गोलियां चलाते रहे। उनकी इस अद्भुत वीरता से उस मुठभेड़ में 5 आतंकी ढेर हुए। नायक जिदान बागे ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन देश की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

उनके असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प के लिए उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। “Balidan Diwas – Naik Jidan Bage, Shaurya Chakra (Posthumous)”

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हवलदार कुल बहादुर थापा शौर्य चक्र https://shauryasaga.com/shaurya-diwas-a-tribute-to-valor-havaldar-kul-bahadur-thapa-shaurya-chakra/ https://shauryasaga.com/shaurya-diwas-a-tribute-to-valor-havaldar-kul-bahadur-thapa-shaurya-chakra/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:16:38 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5283

आज शौर्य दिवस पर, हम हवलदार कुल बहादुर थापा के अदम्य साहस को नमन करते हैं, जिन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। 9 पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेस) के इस वीर सैनिक ने फरवरी 2018 में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान अपनी बहादुरी से देश का मान बढ़ाया।

जम्मू-कश्मीर के सुंदरबनी सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर तैनात हवलदार थापा ने 27 फरवरी 2018 को चार सशस्त्र दुश्मनों की गतिविधि देखी। बिना片刻 हिचकिचाहट के, उन्होंने अपनी टुकड़ी को आगे बढ़ाया। कठिन पहाड़ी इलाकों और ठंडी नदी को पार करते हुए, उन्होंने एक खड़ी चट्टान पर चढ़कर अपनी टीम को स्थिति में लाया और दुश्मनों से मुकाबला किया।

जब दुश्मनों की ताबड़तोड़ गोलीबारी ने हमारे सैनिकों को दबाव में लिया, तो हवलदार थापा गोलियों की बौछार के बीच रेंगते हुए अपनी स्थिति बदलते रहे। करीब से दो आतंकियों को ढेर कर और दो अन्य को हथगोले से घायल कर, उन्होंने इस मुठभेड़ में असाधारण वीरता और नेतृत्व का परिचय दिया।

इस अभूतपूर्व साहस के लिए, महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हवलदार कुल बहादुर थापा को शौर्य चक्र से नवाजा। उनकी यह गाथा हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।

उनकी वीरता की कहानी यहाँ देखें: YouTube लिंक

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अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (Ashok Chakra Hero- Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra) https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Feb 2024 08:15:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1103

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस Lieutenant Colonel Chitnis

अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (आई सी-3472) का जन्म 20 अगस्त, 1918 को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. रावजी गोपाल चिटनिस था। उन्हें 12 अप्रैल, 1942 को 1/3 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। अपने विशिष्ट सेवाकाल के दौरान उन्होंने कई पदक जीते।

  1. गोरखा राइफल्सजून, 1956 में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस नगा हिल्स में 1/3 गोरखा राइफल्स की कमान संभाले हुए थे। 14 जून को 8 जीपों के रक्षा दल के साथ मोकोकुचंग से जुन्हेबोटो जाते हुए, 21 माइल स्टोन के पास, उनकी प्लाटून पर करीब 100 नगा विद्रोहियों ने धावा बोल दिया। ये नगा विद्रोही लाइट मशीन गन, स्टेन गन और राइफलों से लैस थे। इस हमले में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस और उनके चार सैनिक घायल हो गए और प्लाटून विद्रोहियों के बंकर से 150 मीटर पहले ही रूक गई। अगस्त 20, 1918 जून 14, 1956तब कमांडिंग अफसर ने विद्रोहियों के बंकर पर संगीन से हमले का आदेश दिया। उन्होंने आगे रहते हुए स्वयं हमले का नेतृत्व किया। अपनी स्टेन गन से उन्होंने एक विद्रोही को मार डाला और दूसरे को घायल कर दिया। इसी समय बाजू में स्थित एक लाइट मशीन गन ने उनकी प्लाटून पर घातक गोलीबारी की। पैर में चोट के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस ने लाइट मशीन गन चौकी पर सामने से धावा बोल दिया। इस बार पेट में गोलियां लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और विद्रोही चौकी से 15 मीटर पहले ही गिर पड़े। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अपने सैनिकों को विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। उनके उदाहरण से प्रोत्साहित होकर सैनिक उत्साह के साथ लड़े और उन्होंने विद्रोहियों के ठिकाने को साफ कर दिया। 20 विद्रोही मारे गए और कई घायल हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस ने न केवल अपने सैनिकों की जान बचाई अपितु शत्रु को भारी नुकसान पहुंचाया। वे अन्तिम सांस तक अपने जवानों का नेतृत्व करते रहे और इस प्रकार उन्होंने उत्कृष्ट नेतृत्व और वीरता का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

                                            लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस को मेरा सलाम।

Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra” Gorkha Rifles Sacrifice

Naga Hills 1956

                                                                                  जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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महावीर चक्र (मरणोपरांत) लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/ https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 12:11:30 +0000 https://shauryasaga.com/?p=873 लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई
22-02-1935 – 15-12-1971
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 16 मद्रास रेजिमेंट
बसंतर का युद्ध
ऑपरेशन कैक्टस लिली
भारत-पाक युद्ध 1971
लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई का जन्म ब्रिटिश भारत में, 22 फरवरी 1935 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तराखंड) के देहरादून नगर में श्री देश राज घई एवं श्रीमती दयावंती देवी के परिवार में हुआ था। 4 दिसंबर 1954 को उन्हें भारतीय सेना की मद्रास रेजिमेंट की 16 वीं बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। अपने सेवाकाल में वह अनेक परिचालन क्षेत्रों में तैनात रहे और 1961 में संयुक्त राष्ट्र के संचालन में कांगो में भारतीय दल के भाग के रूप में भी सेवाएं दी थी। वर्ष 1971 तक वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, लेफ्टिनेंट कर्नल घई पश्चिमी मोर्चे पर शकरगढ़ सेक्टर में 16 मद्रास बटालियन की कमान संभाल रहे थे। 14/15 दिसंबर 1971 की रात्रि में बसंतर के युद्ध में, शत्रु का प्रबल प्रतिरोध होते हुए भी उनकी बटालियन बसंतर नदी और भूमिगत खदानों की बाधाओं को लांघ करके BRIDGE HEAD (पुल का छोर) पर अधिकार करने का प्रयास कर रही थी, उसी समय शत्रु ने भयंकर पलटवार किया। लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने अपने सैनिकों को एकजुट किया और शत्रु के अनवरत हो रहे आक्रमणों को विफल किया।
जैसे ही, सूर्योदय हुआ शत्रु ने टैंकों के साथ भीषण आक्रमण किया। तीव्र गोला वृष्टि में भी, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा पर रंच मात्र भी ध्यान नहीं देते हुए, वह निडरता से बटालियन की एक-एक स्थिति पर गए और अपने सैनिकों को प्रोत्साहित और निर्देशित किया। उनके व्यक्तिगत उदाहरण, साहस और नेतृत्व से प्रेरित होकर, बटालियन ने पलटवार किया और शत्रु को भारी क्षति पहुंचाई किंतु शत्रु की गोला वृष्टि में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। अंततः अपने घातक घावों से वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस कार्रवाई में लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने विशिष्ट वीरता, उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय दिया और भारतीय सेना की उत्कृष्ट परंपराओं में अपने कर्तव्य की पालना में सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र सम्मान दिया गया। 🙏💐🙏
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