#mahaveer #chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Thu, 20 Mar 2025 09:39:26 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 #mahaveer #chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 विंग कमांडर हरचरण सिंह मंगत (महावीर चक्र) https://shauryasaga.com/wing-commander-harcharan-singh-mangat-maha-vir-chakra/ https://shauryasaga.com/wing-commander-harcharan-singh-mangat-maha-vir-chakra/?noamp=mobile#respond Thu, 20 Mar 2025 09:28:28 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5382

शौर्य नमन
4666 एफ (पी)
विंग कमांडर हरचरण सिंह मंगत (महावीर चक्र)

विंग कमांडर हरचरण सिंह मंगत का जन्म 6 जून, 1932 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था। उनके पिता श्री राम सिंह मंगत थे। 16 जनवरी, 1954 को उन्हें भारतीय वायु सेना की फ्लाइंग ब्रांच (पायलट) में कमीशन प्राप्त हुआ। बाद में वे एयर कमोडोर के पद तक पहुंचे।

1971 के भारत-पाक युद्ध में विंग कमांडर मंगत ने पश्चिमी मोर्चे पर एक अग्रिम हवाई अड्डे से लड़ाकू बमवर्षक स्क्वाड्रन की कमान संभाली। जब दुश्मन ने अमृतसर, श्रीनगर, अवंतिपुर और पठानकोट के हवाई अड्डों पर बमबारी शुरू की, तो विंग कमांडर मंगत ने दुश्मन के क्षेत्र में घुसकर कई हमलों का नेतृत्व किया। उन्होंने हवाई अड्डों पर तैनात विमानभेदी तोपों को संभावित हमलों के प्रति सचेत किया, जिससे 3 और 4 दिसंबर की रात दुश्मन के विमानों को रोकने में मदद मिली।

4 दिसंबर की सुबह, भारतीय विमानों ने पाकिस्तान के भीतरी ठिकानों पर छापेमारी की। एक हमले का नेतृत्व विंग कमांडर मंगत ने किया। रास्ते में उनके विमान पर दुश्मन की विमानभेदी तोपों ने हमला किया और तीन बार गोली लगी। फिर भी, वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। जब उनकी संरचना का एक विमान क्षतिग्रस्त हो गया, तब वे दुश्मन क्षेत्र में 200 किलोमीटर अंदर थे। तीव्र हमले में उनका विमान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन उन्होंने अपनी टीम को सुरक्षित बेस पर वापस लाया। बाद में पता चला कि उनके विमान का नियंत्रण पृष्ठ लगभग नष्ट हो चुका था।

इस असफलता ने उनके हौसले को कम नहीं किया। उन्होंने दुश्मन के कई ठिकानों पर हमले किए, जिसमें मार्शलिंग यार्ड, माल गाड़ियां, तोपें और टैंक शामिल थे। साथ ही, उन्होंने फोटो टोही उड़ानों से महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई, जिसका उपयोग भारतीय सेना और वायु सेना ने अपनी योजनाओं के लिए किया। उनके अद्भुत साहस और उड़ान कौशल के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

शौर्य नमन
हमारे वीर सैनिकों को सलाम!
#महावीरचक्र #शौर्यगाथा #भारतीयवायुसेना #जयहिंद


Shaurya Naman
4666 F (P)
Wing Commander Harcharan Singh Mangat (Maha Vir Chakra)

Wing Commander Harcharan Singh Mangat was born on June 6, 1932, in Ludhiana, Punjab, to Shri Ram Singh Mangat. He was commissioned into the Flying Branch (Pilot) of the Indian Air Force on January 16, 1954, and later rose to the rank of Air Commodore.

During the 1971 Indo-Pak War, Wing Commander Mangat commanded a fighter-bomber squadron from a forward airfield on the Western Front. When the enemy launched attacks with bombings on airfields at Amritsar, Srinagar, Awantipur, and Pathankot, he led several retaliatory strikes deep into enemy territory. He also alerted anti-aircraft guns at the airfields about potential air raids, a warning that proved crucial in thwarting enemy aircraft on the nights of December 3 and 4.

In the early hours of December 4, Indian aircraft, in pairs, raided deep Pakistani targets. Wing Commander Mangat led one such mission. En route, their formation of four aircraft came under heavy enemy anti-aircraft fire. His own plane was hit three times, yet he pressed on toward the target until one of the aircraft in his formation was damaged. At that point, they were 200 kilometers inside enemy territory. With his plane severely damaged by intense fire, he skillfully ordered a retreat and safely brought his formation back to base. Upon landing, it was discovered that his aircraft was extensively damaged, with most of its control surfaces completely destroyed.

This setback did not deter him. He went on to lead numerous strikes on enemy targets, including marshalling yards, goods trains, gun positions, and tank concentrations. He also conducted several photo-reconnaissance missions deep inside enemy territory, gathering intelligence that aided the Indian Army and Air Force in their operational planning. For his exceptional flying skills and bravery, Wing Commander Mangat was awarded the Maha Vir Chakra.

Shaurya Naman
Salute to our brave soldiers!
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हवलदार थामस फिलिपोस: एक सच्चे वीर की शौर्य गाथा https://shauryasaga.com/havildar-thomas-philipose-a-saga-of-true-valor/ https://shauryasaga.com/havildar-thomas-philipose-a-saga-of-true-valor/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:37:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5293

——-शौर्यनमन——-
2550166
हवलदार फिलिपोस, थामस
(महावीर चक्र)

8 जुलाई 1941 को केरल के अल्लिप्पी, इडायरनमुला में जन्मे हवलदार थामस फिलिपोस एक ऐसे सैनिक थे, जिन्होंने अपनी वीरता से देश का नाम रोशन किया। उनके पिता श्री फिलिपोस के घर में जन्मे इस साहसी योद्धा ने 8 जुलाई 1961 को 16 मद्रास (द्रावनकोर) में अपनी सेवा शुरू की। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनकी अदम्य साहस और नेतृत्व की कहानी आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

 

1971 का युद्ध और बंसतार नदी का मोर्चा

 

1971 में 16 मद्रास को पश्चिमी मोर्चे पर तैनात किया गया था। उनका मिशन था बंसतार नदी के उस पार एक पुल-पदाधार स्थापित करना, ताकि भारतीय सेना आगे बढ़ सके। इसके लिए उन्हें 15 दिसंबर तक सराजचाक और लालियाल पर कब्जा करना था। लेकिन यह आसान नहीं था। दुश्मन ने नदी के दोनों ओर गहरी सुरंगें खोद रखी थीं, जो मशीन गन की प्रभावी फायर से सुरक्षित थीं। सुरंगों के बीच पैदल सेना और मशीन गन के “नेस्ट” तैनात थे। बंकरों को संचार खाइयों और वैकल्पिक ठिकानों से जोड़ा गया था, और गांव में तोपखाने की चौकियां हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थीं।

 

ऐसी मजबूत रक्षा पंक्ति को तोड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण था, मगर 16 मद्रास ने इसे अपनी हिम्मत और आत्मविश्वास से स्वीकार किया।

 

संकट में संभाला मोर्चा

 

15 दिसंबर की रात, हवलदार थामस फिलिपोस “सी” कंपनी के साथ लालियाल पर धावा बोलने निकले। दुश्मन ने भारी गोलाबारी और मशीन गन से हमला किया। इस दौरान प्लाटून कमांडर गंभीर रूप से घायल हो गया, और कई सैनिक हताहत हो गए। अब सिर्फ 15 सैनिक बचे थे। ऐसे संकट में हवलदार फिलिपोस ने कमान संभाली। उन्होंने नन्ही टुकड़ी के साथ दुश्मन पर जोरदार हमला बोला और लक्ष्य तक पहुंच गए।

 

लेकिन दुश्मन ने हार नहीं मानी। जवाबी हमले की तैयारी शुरू हुई। तब हवलदार फिलिपोस ने अपने सैनिकों के साथ संगीनें चढ़ाईं और दुश्मन पर टूट पड़े। उनकी प्रचंडता से दुश्मन घबरा गया और पीछे हट गया। इस लड़ाई में हवलदार फिलिपोस को गोली लगी, फिर भी वे डटे रहे। युद्धभूमि से निकलने से पहले उन्हें एक और गहरी चोट लगी, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं डगमगाया।

 

महावीर चक्र से सम्मानित

 

अपने दृढ़ नेतृत्व और असाधारण साहस के लिए हवलदार थामस फिलिपोस को भारत के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार “महावीर चक्र” से सम्मानित किया गया। उनकी यह गाथा हमें याद दिलाती है कि सच्चा साहस संख्याओं से नहीं, संकल्प से नापा जाता है।

 

शौर्य नमन: शहीदों का सम्मान

 

“शौर्य नमन” एक ऐसा संगठन है जो हमारे वीर शहीदों और उनके परिवारों के सम्मान के लिए समर्पित है। हवलदार थामस फिलिपोस जैसे नायकों की कहानियां हमें प्रेरित करती हैं कि हम उनके बलिदान को कभी न भूलें।

 

 

 

 

 

 

    • संपर्क: +91 91110-10008

 

आइए, हम सब मिलकर अपने शहीदों को सलाम करें और उनके परिवारों के साथ खड़े हों।
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अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (Ashok Chakra Hero- Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra) https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Feb 2024 08:15:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1103

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस Lieutenant Colonel Chitnis

अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (आई सी-3472) का जन्म 20 अगस्त, 1918 को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. रावजी गोपाल चिटनिस था। उन्हें 12 अप्रैल, 1942 को 1/3 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। अपने विशिष्ट सेवाकाल के दौरान उन्होंने कई पदक जीते।

  1. गोरखा राइफल्सजून, 1956 में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस नगा हिल्स में 1/3 गोरखा राइफल्स की कमान संभाले हुए थे। 14 जून को 8 जीपों के रक्षा दल के साथ मोकोकुचंग से जुन्हेबोटो जाते हुए, 21 माइल स्टोन के पास, उनकी प्लाटून पर करीब 100 नगा विद्रोहियों ने धावा बोल दिया। ये नगा विद्रोही लाइट मशीन गन, स्टेन गन और राइफलों से लैस थे। इस हमले में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस और उनके चार सैनिक घायल हो गए और प्लाटून विद्रोहियों के बंकर से 150 मीटर पहले ही रूक गई। अगस्त 20, 1918 जून 14, 1956तब कमांडिंग अफसर ने विद्रोहियों के बंकर पर संगीन से हमले का आदेश दिया। उन्होंने आगे रहते हुए स्वयं हमले का नेतृत्व किया। अपनी स्टेन गन से उन्होंने एक विद्रोही को मार डाला और दूसरे को घायल कर दिया। इसी समय बाजू में स्थित एक लाइट मशीन गन ने उनकी प्लाटून पर घातक गोलीबारी की। पैर में चोट के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस ने लाइट मशीन गन चौकी पर सामने से धावा बोल दिया। इस बार पेट में गोलियां लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और विद्रोही चौकी से 15 मीटर पहले ही गिर पड़े। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अपने सैनिकों को विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। उनके उदाहरण से प्रोत्साहित होकर सैनिक उत्साह के साथ लड़े और उन्होंने विद्रोहियों के ठिकाने को साफ कर दिया। 20 विद्रोही मारे गए और कई घायल हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस ने न केवल अपने सैनिकों की जान बचाई अपितु शत्रु को भारी नुकसान पहुंचाया। वे अन्तिम सांस तक अपने जवानों का नेतृत्व करते रहे और इस प्रकार उन्होंने उत्कृष्ट नेतृत्व और वीरता का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

                                            लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस को मेरा सलाम।

Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra” Gorkha Rifles Sacrifice

Naga Hills 1956

                                                                                  जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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महावीर चक्र (मरणोपरांत) लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/ https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 12:11:30 +0000 https://shauryasaga.com/?p=873 लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई
22-02-1935 – 15-12-1971
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 16 मद्रास रेजिमेंट
बसंतर का युद्ध
ऑपरेशन कैक्टस लिली
भारत-पाक युद्ध 1971
लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई का जन्म ब्रिटिश भारत में, 22 फरवरी 1935 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तराखंड) के देहरादून नगर में श्री देश राज घई एवं श्रीमती दयावंती देवी के परिवार में हुआ था। 4 दिसंबर 1954 को उन्हें भारतीय सेना की मद्रास रेजिमेंट की 16 वीं बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। अपने सेवाकाल में वह अनेक परिचालन क्षेत्रों में तैनात रहे और 1961 में संयुक्त राष्ट्र के संचालन में कांगो में भारतीय दल के भाग के रूप में भी सेवाएं दी थी। वर्ष 1971 तक वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, लेफ्टिनेंट कर्नल घई पश्चिमी मोर्चे पर शकरगढ़ सेक्टर में 16 मद्रास बटालियन की कमान संभाल रहे थे। 14/15 दिसंबर 1971 की रात्रि में बसंतर के युद्ध में, शत्रु का प्रबल प्रतिरोध होते हुए भी उनकी बटालियन बसंतर नदी और भूमिगत खदानों की बाधाओं को लांघ करके BRIDGE HEAD (पुल का छोर) पर अधिकार करने का प्रयास कर रही थी, उसी समय शत्रु ने भयंकर पलटवार किया। लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने अपने सैनिकों को एकजुट किया और शत्रु के अनवरत हो रहे आक्रमणों को विफल किया।
जैसे ही, सूर्योदय हुआ शत्रु ने टैंकों के साथ भीषण आक्रमण किया। तीव्र गोला वृष्टि में भी, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा पर रंच मात्र भी ध्यान नहीं देते हुए, वह निडरता से बटालियन की एक-एक स्थिति पर गए और अपने सैनिकों को प्रोत्साहित और निर्देशित किया। उनके व्यक्तिगत उदाहरण, साहस और नेतृत्व से प्रेरित होकर, बटालियन ने पलटवार किया और शत्रु को भारी क्षति पहुंचाई किंतु शत्रु की गोला वृष्टि में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। अंततः अपने घातक घावों से वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस कार्रवाई में लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने विशिष्ट वीरता, उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय दिया और भारतीय सेना की उत्कृष्ट परंपराओं में अपने कर्तव्य की पालना में सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र सम्मान दिया गया। 🙏💐🙏
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