kashmir – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Fri, 17 Oct 2025 13:05:41 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 kashmir – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 दीवान रंजीत राय (Lt. Col. Dewan Ranjit Rai) – 1947 स्वतंत्र भारत के पहले महावीर चक्र विजेता की अमर वीर गाथा https://shauryasaga.com/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af-lt-col-dewan-ranjit-rai-1947-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a4%82/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af-lt-col-dewan-ranjit-rai-1947-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a4%82/?noamp=mobile#respond Fri, 17 Oct 2025 13:05:41 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5740 दीवान रंजीत राय: स्वतंत्र भारत के पहले महावीर चक्र विजेता की अमर वीर गाथा

कश्मीर की बर्फीली वादियों में, जब आजादी की खुशियां अभी ताजा थीं, तभी एक ऐसी जंग छिड़ गई जो भारत के टुकड़े करने की साजिश का हिस्सा थी। 1947 का वो अक्टूबर का महीना, जब पाकिस्तानी कबायली लश्कर श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे, तब एक योद्धा ने अपनी जान की बाजी लगाकर इतिहास रच दिया। वो थे लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय। महावीर चक्र से नवाजे गए ये वीर सैनिक स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे अधिकारी बने, जिन्हें ये सम्मान मरणोपरांत मिला। उनकी कहानी न सिर्फ सैन्य इतिहास की किताबों में, बल्कि हर भारतीय के दिल में बसती है – एक ऐसी प्रेरणा जो बताती है कि देश की रक्षा के लिए जान देना ही असली वीरता है।

दीवान रंजीत राय
दीवान रंजीत राय

दीवान रंजीत राय का प्रारंभिक जीवन और सैन्य सफर

दीवान रंजीत राय का जन्म 6 फरवरी 1913 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में एक प्रतिष्ठित हिंदू परिवार में हुआ था। बचपन शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में बीता, जहां से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। 1935 में, वो इंडियन मिलिट्री अकादमी (IMA), देहरादून के पहले कोर्स के छात्र बने और 1 फरवरी 1935 को कमीशन प्राप्त किया। मात्र 22 साल की उम्र में ब्रिटिश आर्मी रेजिमेंट के साथ अटैचमेंट के बाद, वो 24 फरवरी 1936 को 11 सिख रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में पोस्ट हो गए।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनकी बहादुरी ने उन्हें एक्टिंग मेजर के पद तक पहुंचा दिया। 1947 तक, वो 1 सिख रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर बन चुके थे। उस वक्त वो गुड़गांव में शरणार्थियों की व्यवस्था में व्यस्त थे, लेकिन कश्मीर पर आक्रमण की खबर ने सब बदल दिया। रंजीत राय को अमेरिका में मिलिट्री अटैची के पद पर जाने का चयन हो चुका था, लेकिन देश की पुकार ने उन्हें कश्मीर बुला लिया। उनकी जिंदगी का ये टर्निंग पॉइंट था – एक ऐसा फैसला जो न सिर्फ कश्मीर, बल्कि पूरे भारत को बचा गया।

1947 कश्मीर युद्ध: जब रंजीत राय ने श्रीनगर को बचाया

दीवान रंजीत राय
दीवान रंजीत राय

1947 में भारत-पाक युद्ध का आगाज कश्मीर से हुआ। 22 अक्टूबर को पाकिस्तानी कबायली लश्कर, मेजर जनरल अकबर खान (कोड नेम ‘जनरल तारिक’) के नेतृत्व में, मुजफ्फराबाद पर कब्जा कर बारामूला की ओर बढ़े। श्रीनगर एयरफील्ड पर कब्जा हो जाता, तो कश्मीर भारत से कट जाता। ऐसे में, 27 अक्टूबर 1947 को लेफ्टिनेंट कर्नल रंजीत राय अपनी C और D कंपनी के साथ दिल्ली से IAF डकोटा विमानों में सवार होकर श्रीनगर पहुंचे। सुबह 9:30 बजे लैंडिंग के तुरंत बाद, उन्होंने स्थिति का जायजा लिया और एक्शन में कूद पड़े।

बारामूला की रक्षा: वीरता का चरम

दीवान रंजीत राय
दीवान रंजीत राय

दीवान रंजीत राय ने तुरंत C कंपनी को कैप्टन कमलजीत सिंह के नेतृत्व में बारामूला भेजा, जबकि D कंपनी को मेजर हरवंत सिंह ने श्रीनगर में फ्लैग मार्च करवाया ताकि जनता का भरोसा बहाल हो। खुद एयरफील्ड पर रहकर बाकी कंपनियों का इंतजार करते हुए, रंजीत राय ने रेकी की। लेकिन संचार उपकरण वाला विमान जम्मू में क्रैश हो गया, जिससे संपर्क टूट गया।

28 अक्टूबर की सुबह, जब बाकी फोर्स न पहुंची, तो दीवान रंजीत राय माइल 32 (बारामूला से कुछ मील पहले) पर अपनी टुकड़ी के पास पहुंचे। मात्र 140-150 सैनिकों के साथ हजारों कबायलियों का सामना करना था, जो हेवी मशीनगन्स और 3-इंच मोर्टार से लैस थे। दुश्मन ने 11:30 बजे हमला बोला, लेकिन दीवान रंजीत राय के नेतृत्व में सैनिकों ने उसे खदेड़ दिया। दुश्मन ने फ्लैंकिंग की कोशिश की, लेकिन रंजीत राय ने सैनिकों को प्रेरित किया: “सद्दे जीवन तों वड्डा देश है। असि पहलां मरांगे, पर कश्मीर ना दींदी।” (देश हमारी जिंदगी से बड़ा है। हम पहले मरेंगे, लेकिन कश्मीर नहीं देंगे।)

जब स्थिति बिगड़ी, तो उन्होंने विदड्रॉअल का फैसला लिया। लेकिन रास्ता कट चुका था। दुश्मन की गोलीबारी में रंजीत राय को छाती में गोली लगी। वो गिरे, लेकिन अंतिम सांस तक सैनिकों को बचाते रहे। उनकी शहादत ने दुश्मन को कन्फ्यूज कर दिया – उन्हें लगा बड़ा फोर्स आ रहा है। ये 48 घंटों का पॉज भारतीय सेना को रिनफोर्समेंट भेजने का मौका दे गया, और श्रीनगर बच गया।

महावीर चक्र: सम्मान

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

रंजीत रंजीत राय को मरणोपरांत महावीर चक्र मिला, जो भारत का दूसरा सबसे बड़ा युद्धकालीन सम्मान है। 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र दिवस पर ये घोषित हुआ। आधिकारिक उद्धरण में लिखा है: “लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय ने श्रीनगर और उसके एयरफील्ड को बचाने के लिए व्यक्तिगत खतरे की परवाह न करते हुए रेकी और ऑपरेशंस का नेतृत्व किया। उनकी निर्भीकता और प्रेरणादायक लीडरशिप ने दुश्मन को दूर रोक दिया, जिससे निर्णायक जीत संभव हुई।” वो स्वतंत्र भारत के पहले MVC विजेता बने।

परिवार और विरासत: पांच पीढ़ियों का सैन्य परंपरा

रंजीत राय की पत्नी शीला राय और बेटा अरुणजीत राय उनके पीछे रह गए। अरुणजीत को मिर्गी जैसी बीमारी थी, और परिवार को पेंशन व मेडिकल हेल्प के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। लेकिन परिवार की सैन्य परंपरा आज भी जिंदा है। नाती मेजर (रिटायर्ड) शिवजीत एस शेरगिल आर्मर्ड कोर में रहे, और परपोते फरीद शेरगिल उसी रेजिमेंट में शामिल होने को तैयार हैं – पांचवीं पीढ़ी।

उनकी याद में चंडीगढ़ वॉर मेमोरियल पर नाम दर्ज है, जिसके लिए परिवार ने सालों संघर्ष किया। सिख रेजिमेंट में उनकी कहानी ट्रेनिंग का हिस्सा है, और हर साल 27 अक्टूबर को शौर्य दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

रंजीत राय की अनसुनी बातें

-पहली उड़ान: 27 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर पहुंचने वाली पहली भारतीय फोर्स के कमांडर थे रंजीत राय।
-WW2 हीरो: द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा फ्रंट पर लड़े, जहां उनकी बहादुरी ने जल्दी प्रमोशन दिलाया।
– उम्र: शहादत के समय मात्र 34 साल के थे, लेकिन उनकी विरासत अनंतकाल तक जिएगी।
– प्रभाव: उनकी शहादत ने न सिर्फ श्रीनगर बचाया, बल्कि कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखा।

वीरता की लौ जो कभी बुझेगी नहीं

दीवान रंजीत राय की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा सैनिक वो है जो फ्रंट पर खड़ा होकर देश को बचाए। आज जब हम कश्मीर की शांति देखते हैं, तो वो उनकी कुर्बानी का नतीजा है। अगर आप भी उनकी तरह देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हैं, तो कमेंट में अपनी राय शेयर करें।

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मेजर मोहित शर्मा: एक वीर सैनिक की प्रेरणादायक जीवनी https://shauryasaga.com/major-mohit-sharma-ek-veer-sainik/ https://shauryasaga.com/major-mohit-sharma-ek-veer-sainik/?noamp=mobile#respond Fri, 29 Aug 2025 07:04:50 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5424 मेजर मोहित शर्मा, जिन्हें भारत के सर्वोच्च शांति-कालीन सैन्य सम्मान अशोक चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया, भारतीय सेना के उन वीर सपूतों में से एक हैं, जिनकी शहादत और साहस की कहानी हर भारतीय को गर्व से भर देती है। 1 पैरा (स्पेशल फोर्सेस) के इस नायक ने अपनी वीरता, रणनीतिक कुशलता और देश के प्रति अटूट समर्पण से इतिहास के पन्नों में अमर स्थान बनाया। यह लेख उनके जीवन, सैन्य करियर और बलिदान की विस्तृत कहानी प्रस्तुत करता है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मेजर मोहित शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक जिले में हुआ था। उनके पिता श्री राजेंद्र प्रसाद शर्मा और माता श्रीमती सुशीला शर्मा के दूसरे पुत्र थे। परिवार में उन्हें प्यार से ‘चिंटू’ कहा जाता था, जबकि उनके सहपाठी और सहकर्मी उन्हें ‘माइक’ के नाम से बुलाते थे। मोहित एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे गिटार, माउथ ऑर्गन और सिंथेसाइज़र जैसे वाद्ययंत्रों को बखूबी बजा लेते थे। हेमंत कुमार के गीतों को उनकी मधुर आवाज में सुनना सभी को मंत्रमुग्ध कर देता था।

मोहित ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के मानव स्थली स्कूल से शुरू की, फिर एक वर्ष के लिए सहारनपुर के होली एंजल्स स्कूल में पढ़े। इसके बाद, 1988 में उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, गाजियाबाद में दाखिला लिया और 1995 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। स्कूल के दौरान, वे पढ़ाई के साथ-साथ खेल और अन्य गतिविधियों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करते थे। उनकी नेतृत्व क्षमता और अनुशासन ने उन्हें एक आदर्श छात्र बनाया।

मोहित ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन उनका सपना देश की सेवा करना था। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़ दी और 1995 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), पुणे में प्रवेश लिया। एनडीए में उन्होंने तैराकी, मुक्केबाजी और घुड़सवारी जैसे खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वे मुक्केबाजी में फेदरवेट श्रेणी के विजेता बने और घुड़सवारी में चैंपियन रहे, जहाँ उनकी पसंदीदा घोड़ी ‘इंदिरा’ थी।

सैन्य करियर की शुरुआत

1998 में, मोहित ने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में प्रवेश लिया। यहाँ उनकी उत्कृष्टता के कारण उन्हें बटालियन कैडेट एडजुटेंट का पद दिया गया। इस दौरान, उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन से राष्ट्रीय भवन में मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। दिसंबर 1999 में, उन्हें लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ और उनकी पहली तैनाती 5वीं बटालियन, मद्रास रेजिमेंट (5 मद्रास), हैदराबाद में हुई।

तीन वर्षों की सफल सेवा के बाद, मोहित ने अपनी सैन्य यात्रा को और चुनौतीपूर्ण बनाने का निर्णय लिया। दिसंबर 2002 में, उन्होंने पैरा (स्पेशल फोर्सेस) में शामिल होने का फैसला किया और जून 2003 में कठिन प्रशिक्षण पूरा कर पैरा कमांडो बन गए। इस दौरान, उन्होंने 38 राष्ट्रीय राइफल्स में भी सेवा दी, जहाँ उनकी वीरता और नेतृत्व के लिए उन्हें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया।

वीरता के सुनहरे पल

ऑपरेशन सर्प विनाश (2003)

मोहित शर्मा का सबसे चर्चित योगदान 2003 में ऑपरेशन सर्प विनाश के दौरान रहा, जो जम्मू और कश्मीर के पुंछ जिले के हिल काका क्षेत्र में आयोजित किया गया था। इस ऑपरेशन का उद्देश्य घने जंगलों में छिपे आतंकवादियों को खत्म करना था। मोहित ने अपनी रणनीतिक बुद्धिमता का परिचय देते हुए एक आतंकवादी के रूप में घुसपैठ की। उन्होंने अपनी पहचान ‘इफ्तिखार भट्ट’ के रूप में बनाई, लंबी दाढ़ी और बाल रखकर स्थानीय आतंकवादी समूह हिजबुल मुजाहिदीन में घुसपैठ की।

मोहित ने आतंकवादियों को यह विश्वास दिलाया कि वह भारतीय सेना पर हमला करना चाहता है, क्योंकि उसका भाई कथित तौर पर सेना द्वारा मारा गया था। इस छलावे के तहत, उन्होंने आतंकवादी शिविर में प्रवेश किया और महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की। एक सुनियोजित रणनीति के तहत, उन्होंने आतंकवादियों को निशाना बनाया और मौके पर ही दो आतंकवादियों को मार गिराया। इस साहसी मिशन के लिए उन्हें 2005 में सेना मेडल (Gallantry) से सम्मानित किया गया।

प्रशिक्षक के रूप में योगदान

दिसंबर 2005 में, मोहित को मेजर के पद पर पदोन्नति मिली। इसके बाद, उन्हें बेलगाम में पैरा कमांडो प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। दो वर्षों तक, उन्होंने भावी कमांडो को प्रशिक्षित किया, उनकी नेतृत्व क्षमता और अनुशासन को निखारा। उनकी शिक्षण शैली और प्रेरक व्यक्तित्व ने कई युवा सैनिकों को देश सेवा के लिए प्रेरित किया।

अंतिम बलिदान: कुपवाड़ा ऑपरेशन (2009)

2008 में, मेजर मोहित शर्मा को फिर से कश्मीर में तैनात किया गया। 21 मार्च 2009 को, जम्मू और कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हफरूदा जंगल में आतंकवादियों की घुसपैठ की सूचना मिली। मेजर मोहित अपनी ब्रावो असॉल्ट टीम के साथ इस खतरनाक मिशन का नेतृत्व कर रहे थे।

ऑपरेशन के दौरान, उनकी टीम पर तीन दिशाओं से आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू कर दी। इस हमले में चार कमांडो तुरंत घायल हो गए। मोहित ने अपनी जान की परवाह न करते हुए, गोलियों की बौछार के बीच रेंगकर दो घायल सैनिकों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। इसके बाद, उन्होंने ग्रेनेड फेंककर दो आतंकवादियों को मार गिराया।

आतंकवादियों को भागने से रोकने के लिए, गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने नजदीकी युद्ध में दो और आतंकवादियों को मार गिराया। इस दौरान, उनके सीने में कई गोलियाँ लगीं, और उन्होंने 31 वर्ष की आयु में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनके इस अदम्य साहस और बलिदान ने मिशन को सफल बनाया और उनके साथियों की जान बचाई।

सम्मान और विरासत

मेजर मोहित शर्मा के इस सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें 26 जनवरी 2010 को अशोक चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी पत्नी, मेजर रिशिमा शर्मा (जो अब कर्नल रिशिमा सरीन शर्मा हैं) ने भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल से प्राप्त किया। अशोक चक्र का आधिकारिक उल्लेख इस प्रकार है:

 

“मेजर मोहित शर्मा, सेना मेडल, ने कुपवाड़ा जिले में ब्रावो असॉल्ट टीम का नेतृत्व किया। एक वीर योद्धा के रूप में, उन्होंने जंगल युद्ध में आतंकवादियों से लड़ने की कला में महारत हासिल की थी। 21 मार्च 2009 को, हफरूदा जंगल में घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों की सूचना पर, उन्होंने सावधानीपूर्वक योजना बनाई और अपनी टीम का नेतृत्व किया। भारी गोलीबारी के बीच, उन्होंने अपने साथियों को बचाया और चार आतंकवादियों को मार गिराया, लेकिन इस प्रक्रिया में गंभीर रूप से घायल हो गए।”

2019 में, दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन ने उनके सम्मान में राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर मेजर मोहित शर्मा राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन कर दिया। इसके अतिरिक्त, गाजियाबाद में उनकी प्रतिमा का अनावरण रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह द्वारा किया गया। उनकी वीरता को एएएन कॉमिक्स द्वारा एक ग्राफिक उपन्यास में भी चित्रित किया गया है।

निजी जीवन

मेजर मोहित शर्मा की शादी 2006 में मेजर रिशिमा शर्मा से हुई थी, जो स्वयं एक सैन्य अधिकारी हैं और उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। उनके परिवार में उनके पिता श्री राजेंद्र प्रसाद शर्मा, माता श्रीमती सुशीला शर्मा और बड़े भाई श्री मधुर शर्मा शामिल हैं। उनकी शहादत ने उनके परिवार को गहरा आघात पहुँचाया, लेकिन उनकी वीरता उनकी स्मृति को जीवंत रखती है।

प्रेरणा और प्रभाव

मेजर मोहित शर्मा की कहानी केवल एक सैनिक की वीरता की कहानी नहीं है, बल्कि यह देशभक्ति, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। उनकी गुप्त मिशन में आतंकवादी समूहों में घुसपैठ करने की रणनीति और अंतिम ऑपरेशन में उनकी निस्वार्थता भारतीय सेना के उच्च मानकों को दर्शाती है। स्कूलों, सैन्य संस्थानों और सामाजिक मंचों पर उनकी कहानी युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करती है।

24 जनवरी 2021 को, इंडियन आइडल के एक विशेष एपिसोड में भारतीय सशस्त्र बलों को समर्पित करते हुए मेजर मोहित शर्मा को याद किया गया। उनके भाई मधुर शर्मा इस शो में अतिथि के रूप में शामिल हुए।

निष्कर्ष

मेजर मोहित शर्मा का जीवन और बलिदान हमें यह सिखाता है कि सच्चा साहस वह है, जो अपने से ऊपर देश और साथियों को रखता है। उनकी कहानी हर भारतीय के लिए एक प्रेरणा है, जो हमें याद दिलाती है कि हमारी स्वतंत्रता और सुरक्षा के पीछे अनगिनत सैनिकों का बलिदान है। बलिदान दिवस के अवसर पर, हम मेजर मोहित शर्मा को नमन करते हैं और उनके परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना और सम्मान व्यक्त करते हैं।

जय हिंद!

स्रोत: विकिपीडिया, हॉनरपॉइंट, स्टार्सअनफोल्डेड, द ट्रिब्यून इंडिया

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