#kargil – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Thu, 28 Aug 2025 08:14:44 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 #kargil – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 शहीद मार्कंडेय मिश्र: एक वीर की गाथा और बिखरे परिवार का बलिदान https://shauryasaga.com/shaheed-markandey-mishra-ek-veer-ki-gatha-aur-bikhre-pariwar-ka-balidan/ https://shauryasaga.com/shaheed-markandey-mishra-ek-veer-ki-gatha-aur-bikhre-pariwar-ka-balidan/?noamp=mobile#respond Thu, 28 Aug 2025 08:14:44 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5409 मार्कंडेय मिश्र यह नाम कहीं गुमनाम हो गया ! क्यों कि हमने सब भुला दिया – आज आप पढ़िए एक ऐसे योद्धा की कहानी जिसे पढने के बाद आप चैन से सो नहीं पाएंगे क्यों कि यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं है ! यह है मेरे देश के वीर सैनिकों की कहानी –

गोरखपुर के चौरीचौरा के छोटे से गांव अवधपुर की गलियों में कभी एक बच्चे की हंसी गूंजती थी। वह बच्चा था मार्कंडेय मिश्र, जिसका नाम आज कारगिल की बर्फीली चोटियों पर अमर है। यह कहानी उस वीर सपूत की है, जिसने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, और उस परिवार की, जो उसके जाने के बाद धीरे-धीरे अकेलेपन और मुफलिसी की आग में जलता चला गया।

एक साधारण शुरुआत, असाधारण सपने

अवधपुर गांव की मिट्टी में जन्मा मार्कंडेय मिश्र का बचपन गरीबी की साये में बीता। उसके पिता शिवपूजन मिश्र तरकुलहा देवी मंदिर में सत्यनारायण की कथा सुनाकर और पूजा-पाठ करके जैसे-तैसे घर चलाते थे। खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा था, जो मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता था। मां फूलमती देवी की गोद में पलते हुए मार्कंडेय और उसका छोटा भाई योगेंद्र बड़े हुए। लेकिन भाग्य ने योगेंद्र को कम उम्र में ही छीन लिया—महज 14 साल की उम्र में इंसेफेलाइटिस ने उसे हमेशा के लिए सुला दिया। अब मार्कंडेय ही परिवार की एकमात्र उम्मीद था।

मार्कंडेय का मन किताबों में रमता था। गांव के छोटे से स्कूल में वह घंटों पढ़ता, सपने देखता—न सिर्फ अपने परिवार को गरीबी से निकालने के, बल्कि देश के लिए कुछ बड़ा करने के। उसकी आंखों में एक जुनून था, जो उसे भारतीय सेना की वर्दी तक ले गया। जब वह सेना में भर्ती हुआ, तो मां-बाप के चेहरों पर मुस्कान लौट आई। लगा, अब सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किसे पता था कि यह मुस्कान जल्द ही आंसुओं में डूब जाएगी।

कारगिल की बर्फीली चोटियां और एक वीर का बलिदान

सन् 1999। कारगिल की ऊंची चोटियों पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारत की सीमाओं को चुनौती दी थी। मार्कंडेय, जो अब भारतीय सेना का एक जवान था, नियंत्रण रेखा पर तैनात था। बर्फीली हवाओं और गोलीबारी के बीच उसने वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी गोरखपुर के लोगों के सीने में गर्व जगाती है। दुश्मन से लोहा लेते हुए, आखिरी सांस तक लड़ते हुए, मार्कंडेय ने अपनी जान देश को समर्पित कर दी। वह शहीद हो गया।

उसकी शहादत की खबर जब अवधपुर पहुंची, तो गांव की गलियां सन्नाटे में डूब गईं। शिवपूजन और फूलमती का आंगन, जो कभी मार्कंडेय की हंसी से गूंजता था, अब सिर्फ मातम की आवाजों से भर गया। मार्कंडेय की पत्नी मंजू, जो अभी अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर रही थी, अचानक विधवा हो गई। शहीद की बहन मीरा, जो ससुराल छोड़कर माता-पिता के पास रह रही थी, इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकी।

बिखरता परिवार, ठंडा पड़ता चूल्हा

मार्कंडेय की शहादत के बाद सरकार ने कुछ वायदे किए। मंजू को सेना के अस्पताल में नौकरी मिली, और कुछ सरकारी सहायता के साथ वह अपनी बेटियों को लेकर मायके चली गई। लेकिन शिवपूजन और फूलमती के लिए ये वायदे खोखले साबित हुए। गांव में अकेले रह गए इस बुजुर्ग दंपति के पास न तो कोई सहारा था, न ही कोई उम्मीद। 2006 में शिवपूजन का निधन हो गया। दो साल बाद, 2008 में, फूलमती भी दुनिया छोड़ गई।

मीरा, जो पहले ही मानसिक रूप से अस्थिर हो चुकी थी, गांव की गलियों में भटकती रहती थी। उसकी तबीयत बिगड़ी, और जब उसे इलाज के लिए वाराणसी ले जाया गया, तो वह भी चल बसी। मार्कंडेय का घर, जो कभी प्यार और हंसी से भरा था, अब पूरी तरह वीरान हो चुका था। चूल्हा ठंडा पड़ गया, और आंगन में सिर्फ सन्नाटा बचा।

शहीद की विरासत और हमारी जिम्मेदारी

आज, कारगिल विजय दिवस पर जब हम शहीदों को याद करते हैं, तो मार्कंडेय मिश्र की कहानी हमें सिर्फ उनकी वीरता ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के बलिदान की भी याद दिलाती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि देश की रक्षा के लिए दी गई कुर्बानी सिर्फ एक जवान की नहीं होती—उसका पूरा परिवार उस आग में जलता है।

गोरखपुर के लोग आज भी मार्कंडेय को अपने दिल में बसाए हुए हैं। उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता और सम्मान की कीमत कितनी बड़ी होती है। लेकिन क्या हमारा गर्व सिर्फ 26 जुलाई तक सीमित रहना चाहिए? क्या हमारा दायित्व सिर्फ शहीदों को याद करने तक है? मार्कंडेय जैसे वीरों की शहादत का सम्मान तभी सच्चा होगा, जब हम उनके परिवारों की सुध लेंगे, उनके बच्चों के सपनों को सहारा देंगे, और यह सुनिश्चित करेंगे कि उनका बलिदान व्यर्थ न जाए।

यह कहानी सिर्फ मार्कंडेय की नहीं, बल्कि उन तमाम शहीदों की है, जिन्होंने देश के लिए सब कुछ दे दिया। आइए, इस कारगिल विजय दिवस पर हम संकल्प लें कि हम न केवल उनकी वीरता को सलाम करेंगे, बल्कि उनके परिवारों को भी अपनेपन का एहसास दिलाएंगे। क्योंकि एक शहीद का घर कभी सूना नहीं होना चाहिए।

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बलिदान दिवस -नायक जिदान बागे शौर्य चक्र (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/balidan-diwas-naik-jidan-bage-shaurya-chakra-posthumous/ https://shauryasaga.com/balidan-diwas-naik-jidan-bage-shaurya-chakra-posthumous/?noamp=mobile#respond Thu, 27 Feb 2025 10:23:51 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5286

बलिदान दिवस – शौर्य नमन
नायक जिदान बागे
4255634Y | 18-01-1958 – 27-02-1991
शौर्य चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना: श्रीमती सुबाशी बारला
यूनिट: 7 बिहार रेजिमेंट
आतंकवाद विरोधी अभियान (पंजाब)

नायक जिदान बागे का जन्म 18 जनवरी 1958 को बिहार (अब झारखंड) के गुमला जिले के टाटी कुरकुरा गांव में हुआ। बचपन से ही उन्हें अपने भीतर की वीरता और साहस का अहसास था, और वे जानते थे कि इसका सच्चा उपयोग भारतीय सेना में ही हो सकता है। माता-पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद, उनकी हिचक को दरकिनार करते हुए, 29 जुलाई 1977 को वे बिहार रेजिमेंट में रंगरूट बनकर सेना में शामिल हुए। प्रशिक्षण के बाद उन्हें 7 बिहार बटालियन में सिपाही के रूप में नियुक्त किया गया। 25 मार्च 1981 को उनका विवाह हुआ।

अपनी बटालियन के साथ विभिन्न चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेवा देते हुए वे नायक के पद तक पहुँचे। 80 और 90 के दशक में पंजाब आतंकवाद से अशांत था। 1991 में नायक जिदान बागे पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियानों का हिस्सा थे।

27 फरवरी 1991 को गोपनीय सूचना मिली कि लुधियाना जिले के राजेवाल गांव में गेहूं के खेतों में खूंखार आतंकवादी छिपे हैं। नायक जिदान बागे ने तुरंत अपने साथी सैनिकों के साथ मिलकर आतंकियों को घेर लिया और उन्हें आत्मसमर्पण करने की चुनौती दी। जवाब में आतंकियों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। इस अप्रत्याशित हमले में नायक जिदान बागे को संभलने का मौका नहीं मिला और वे कई गोलियों से गंभीर रूप से घायल हो गए।

फिर भी, अपने घावों और खून से लथपथ होने के बावजूद, उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए आतंकियों की ओर बढ़ना जारी रखा और गोलियां चलाते रहे। उनकी इस अद्भुत वीरता से उस मुठभेड़ में 5 आतंकी ढेर हुए। नायक जिदान बागे ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन देश की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

उनके असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प के लिए उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। “Balidan Diwas – Naik Jidan Bage, Shaurya Chakra (Posthumous)”

आइए, उनके बलिदान को याद करें और शहीदों के परिवारों का सम्मान करें।
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अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (Ashok Chakra Hero- Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra) https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Feb 2024 08:15:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1103

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस Lieutenant Colonel Chitnis

अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (आई सी-3472) का जन्म 20 अगस्त, 1918 को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. रावजी गोपाल चिटनिस था। उन्हें 12 अप्रैल, 1942 को 1/3 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। अपने विशिष्ट सेवाकाल के दौरान उन्होंने कई पदक जीते।

  1. गोरखा राइफल्सजून, 1956 में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस नगा हिल्स में 1/3 गोरखा राइफल्स की कमान संभाले हुए थे। 14 जून को 8 जीपों के रक्षा दल के साथ मोकोकुचंग से जुन्हेबोटो जाते हुए, 21 माइल स्टोन के पास, उनकी प्लाटून पर करीब 100 नगा विद्रोहियों ने धावा बोल दिया। ये नगा विद्रोही लाइट मशीन गन, स्टेन गन और राइफलों से लैस थे। इस हमले में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस और उनके चार सैनिक घायल हो गए और प्लाटून विद्रोहियों के बंकर से 150 मीटर पहले ही रूक गई। अगस्त 20, 1918 जून 14, 1956तब कमांडिंग अफसर ने विद्रोहियों के बंकर पर संगीन से हमले का आदेश दिया। उन्होंने आगे रहते हुए स्वयं हमले का नेतृत्व किया। अपनी स्टेन गन से उन्होंने एक विद्रोही को मार डाला और दूसरे को घायल कर दिया। इसी समय बाजू में स्थित एक लाइट मशीन गन ने उनकी प्लाटून पर घातक गोलीबारी की। पैर में चोट के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस ने लाइट मशीन गन चौकी पर सामने से धावा बोल दिया। इस बार पेट में गोलियां लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और विद्रोही चौकी से 15 मीटर पहले ही गिर पड़े। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अपने सैनिकों को विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। उनके उदाहरण से प्रोत्साहित होकर सैनिक उत्साह के साथ लड़े और उन्होंने विद्रोहियों के ठिकाने को साफ कर दिया। 20 विद्रोही मारे गए और कई घायल हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस ने न केवल अपने सैनिकों की जान बचाई अपितु शत्रु को भारी नुकसान पहुंचाया। वे अन्तिम सांस तक अपने जवानों का नेतृत्व करते रहे और इस प्रकार उन्होंने उत्कृष्ट नेतृत्व और वीरता का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

                                            लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस को मेरा सलाम।

Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra” Gorkha Rifles Sacrifice

Naga Hills 1956

                                                                                  जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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महावीर चक्र (मरणोपरांत) लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/ https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 12:11:30 +0000 https://shauryasaga.com/?p=873 लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई
22-02-1935 – 15-12-1971
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 16 मद्रास रेजिमेंट
बसंतर का युद्ध
ऑपरेशन कैक्टस लिली
भारत-पाक युद्ध 1971
लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई का जन्म ब्रिटिश भारत में, 22 फरवरी 1935 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तराखंड) के देहरादून नगर में श्री देश राज घई एवं श्रीमती दयावंती देवी के परिवार में हुआ था। 4 दिसंबर 1954 को उन्हें भारतीय सेना की मद्रास रेजिमेंट की 16 वीं बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। अपने सेवाकाल में वह अनेक परिचालन क्षेत्रों में तैनात रहे और 1961 में संयुक्त राष्ट्र के संचालन में कांगो में भारतीय दल के भाग के रूप में भी सेवाएं दी थी। वर्ष 1971 तक वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, लेफ्टिनेंट कर्नल घई पश्चिमी मोर्चे पर शकरगढ़ सेक्टर में 16 मद्रास बटालियन की कमान संभाल रहे थे। 14/15 दिसंबर 1971 की रात्रि में बसंतर के युद्ध में, शत्रु का प्रबल प्रतिरोध होते हुए भी उनकी बटालियन बसंतर नदी और भूमिगत खदानों की बाधाओं को लांघ करके BRIDGE HEAD (पुल का छोर) पर अधिकार करने का प्रयास कर रही थी, उसी समय शत्रु ने भयंकर पलटवार किया। लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने अपने सैनिकों को एकजुट किया और शत्रु के अनवरत हो रहे आक्रमणों को विफल किया।
जैसे ही, सूर्योदय हुआ शत्रु ने टैंकों के साथ भीषण आक्रमण किया। तीव्र गोला वृष्टि में भी, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा पर रंच मात्र भी ध्यान नहीं देते हुए, वह निडरता से बटालियन की एक-एक स्थिति पर गए और अपने सैनिकों को प्रोत्साहित और निर्देशित किया। उनके व्यक्तिगत उदाहरण, साहस और नेतृत्व से प्रेरित होकर, बटालियन ने पलटवार किया और शत्रु को भारी क्षति पहुंचाई किंतु शत्रु की गोला वृष्टि में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। अंततः अपने घातक घावों से वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस कार्रवाई में लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने विशिष्ट वीरता, उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय दिया और भारतीय सेना की उत्कृष्ट परंपराओं में अपने कर्तव्य की पालना में सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र सम्मान दिया गया। 🙏💐🙏
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