gorakha – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Wed, 12 Nov 2025 08:45:18 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 gorakha – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Shamsher Singh Samra सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा: हिली की रक्तरंजित धरती पर अमर बलिदान https://shauryasaga.com/shamsher-singh-samra-second-lieutenant-sacrifice/ https://shauryasaga.com/shamsher-singh-samra-second-lieutenant-sacrifice/?noamp=mobile#respond Wed, 12 Nov 2025 08:35:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5914 सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा: हिली की रक्तरंजित धरती पर अमर बलिदान

एस एस 22826
महावीर चक्र (मरणोपरांत)

आज हम बात करेंगे एक ऐसे वीर सिपाही की, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए देश की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा – पंजाब की मिट्टी से निकले एक जांबाज़, जिनका बलिदान 1971 के भारत-पाक युद्ध में हिली के मैदान में अमर हो गया।

शमशेर सिंह सामरा
शमशेर सिंह सामरा

प्रारंभिक जीवन: पंजाब की धरती से निकला सूरमा

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा का जन्म 10 जून 1945 को पंजाब के अमृतसर जिले के छोटे से गांव परवोकी में हुआ था। यह गांव पंजाब की हरियाली और सिख संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक है, जहां खेतों की महक और मेहनतकश लोगों की कहानियां हवा में घुली रहती हैं।

उनके पिता, श्री जी.एस. सामरा, एक साधारण लेकिन गर्वीले परिवार के मुखिया थे, जिन्होंने अपने बेटे में देशभक्ति और अनुशासन की भावना बचपन से ही डाली।

शमशेर सिंह सामरा का बचपन गांव की मिट्टी में खेलते-कूदते बीता। वे पढ़ाई में होशियार थे और खेलकूद में आगे। लेकिन उनकी आंखों में हमेशा एक चमक थी – सेना में जाने की। 1960 के दशक में भारत-पाक तनाव बढ़ रहा था, और युवा शमशेर ने भारतीय थल सेना को अपना करियर चुना। 15 मार्च 1970 को उन्हें 8 गोरखा राइफल्स (8 गोरखा राइफल्स बटालियन) में कमीशन मिला।

गोरखा रेजिमेंट – नेपाली और भारतीय गोरखाओं की बहादुरी की मिसाल – में शामिल होना अपने आप में गर्व की बात थी। मात्र 25 वर्ष की उम्र में वे सेकंड लेफ्टिनेंट बन गए, और उनकी यूनिट को जल्द ही युद्ध के मोर्चे पर भेजा जाने वाला था।

1971 का युद्ध: पूर्वी मोर्चे पर हिली का किला

1971 का भारत-पाक युद्ध न केवल दो देशों का संघर्ष था, बल्कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई भी। पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना ने अपनी पोजीशनें इतनी मजबूत बना ली थीं कि उन्हें तोड़ना असंभव लगता था।

हिली क्षेत्र (अब बांग्लादेश में) पाकिस्तान की रक्षा की कुंजी था। यहां की हर इमारत को किलेबंदी दी गई थी – प्रत्येक घर एक किला बन चुका था। हर टीले को खोदकर सेलप्रूफ पिलबॉक्स (गोला-प्रूफ बंकर) बना दिए गए थे। दुश्मन के पास स्वचालित हथियार, मशीन गनें और क्रॉसफायर की पूरी व्यवस्था थी।

8 गोरखा राइफल्स को इसी हिली कॉम्प्लेक्स पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया। यह यूनिट अपनी बहादुरी के लिए मशहूर थी – “कायर गोरखा मरे, बहादुर गोरखा जिए” उनका नारा था। लेकिन हिली में कई रक्तरंजित लड़ाइयां लड़ी गईं। पाकिस्तानी सैनिकों की भारी गोलाबारी ने कई हमलों को रोक दिया। हजारों गोले बरस रहे थे, और भारतीय सैनिकों की जान पर बन आई थी।

संकट की घड़ी: प्लाटून का नेतृत्व और अदम्य साहस

शमशेर सिंह सामरा एक निर्णायक हमले में दुश्मन की लाइट मशीन गनों (LMG) की क्रॉसफायर ने 8 गोरखा को रोक दिया। कंपनी की बाईं धावामार प्लाटून का नेतृत्व कर रहे सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा ने इस संकट में अपनी असली परीक्षा दी। वे जानते थे कि रुकना मतलब हार है। सैनिकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने ललकारा: “आगे बढ़ो! देश के लिए!”

दुश्मन की दो LMG की क्रॉसफायर की परवाह न करते हुए, वे प्लाटून को दुश्मन की पोजीशन से मात्र 25 मीटर की दूरी तक ले गए। यह दूरी मौत की दहलीज थी। अचानक, एक LMG का गोला उनके सीने के दाहिने तरफ लगा।

खून बहने लगा, लेकिन शमशेर रुके नहीं। चोट की पीड़ा को नजरअंदाज कर उन्होंने नजदीकी मीडियम मशीन गन (MMG) बंकर पर हैंड ग्रेनेड फेंका और उसे उड़ा दिया। बंकर में धमाका हुआ, दुश्मन के सैनिक मारे गए।

अब वे दूसरे बंकर की ओर दौड़े। ग्रेनेड फेंकने ही वाले थे कि LMG की दूसरी बौछार उनके सीने में लगी। यह घाव घातक था। फिर भी, वे लड़खड़ाते हुए बंकर को एक हाथ से पकड़े रहे और दूसरे हाथ में ग्रेनेड थामे जमीन पर गिर पड़े। उनकी आंखें बंद हो गईं, लेकिन चेहरे पर धैर्य और दृढ़ निश्चय की झलक साफ झलक रही थी – मानो कह रहे हों, “मिशन पूरा हुआ!”

बलिदान का फल: हिली पर विजय और महावीर चक्र

शमशेर सिंह सामरा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके साहस से प्रेरित होकर प्लाटून ने बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया, और 8 गोरखा राइफल्स ने हिली कॉम्प्लेक्स पर कब्जा कर लिया। यह जीत पूर्वी मोर्चे पर भारत की बढ़त का महत्वपूर्ण कदम थी। लेकिन कीमत थी एक युवा अधिकारी की जान।

उनकी अत्यंत वीरता, नेतृत्व और दृढ़ता के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया। महावीर चक्र भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है, जो केवल असाधारण साहस के लिए दिया जाता है। उनकी साइटेशन में लिखा है: “मृत्यु के बाद भी उनके चेहरे पर धैर्य और दृढ़ निश्चय की झलक नजर आ रही थी।”

विरासत: आज भी प्रेरणा का स्रोत

सेकंड लेफ्टिनेंट शमशेर सिंह सामरा की कहानी भारतीय सेना की किताबों में दर्ज है। अमृतसर के उनके गांव परवोकी में उनकी स्मृति में एक स्मारक है। हर साल 16 दिसंबर (विजय दिवस) पर उनकी याद की जाती है। वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची देशभक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि बलिदान में होती है।

जय हिंद! जय भारत!

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Naik Prem Bahadur Gurung सियाचिन का शेर: नायक प्रेम बहादुर गुरुंग महावीर चक्र https://shauryasaga.com/naik-prem-bahadur-gurung-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81/ https://shauryasaga.com/naik-prem-bahadur-gurung-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81/?noamp=mobile#respond Sat, 25 Oct 2025 09:29:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5779

नायक प्रेम बहादुर गुरुंग

प्रेम बहादुर गुरुंग
प्रेम बहादुर गुरुंग

भारत और नेपाल की सदियों पुरानी दोस्ती का प्रतीक, गोरखा राइफल्स के वीर सपूत, नायक प्रेम बहादुर गुरुंग का नाम भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 22 नवम्बर, 1956 को नेपाल के सुरम्य गांव सिदनी, जिला कस्की में जन्मे प्रेम बहादुर, श्री कर्ण बहादुर गुरुंग के पुत्र थे। एक साधारण नेपाली परिवार में पले-बढ़े इस बालक ने 22 नवम्बर, 1976 को 3/4 गोरखा राइफल्स में कदम रखा, और बहुत जल्द ही उन्होंने साबित कर दिया कि वह असाधारण साहस के लिए ही बने थे। उनकी कहानी केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि उस अटूट संकल्प की है जो देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाने से भी नहीं कतराता।

सियाचिन: जहाँ ज़िन्दगी भी जम जाती है

सियाचिन
सियाचिन

सितम्बर 1987 में, नायक गुरुंग की बटालियन, 3/4 गोरखा राइफल्स को दुनिया के सबसे ऊंचे और दुर्गम युद्धक्षेत्र – सियाचिन ग्लेशियर – में तैनात किया गया। यह वह जगह है जहाँ दुश्मन से ज़्यादा मुकाबला जमा देने वाली ठंड, बर्फीले तूफानों और पतली हवा से होता है। नायक गुरुंग का सेक्शन बिला फोंडला इलाके में एक महत्वपूर्ण रक्षात्मक चौकी पर तैनात था, जो दुश्मन की हरकतों पर नज़र रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

23 सितम्बर, 1987 की रात, दुश्मन ने इस चौकी पर कब्ज़ा करने के लिए एक जबरदस्त धावा बोल दिया। गोरखा जवानों की सतर्कता और दृढ़ जवाबी कार्रवाई के सामने दुश्मन टिक नहीं पाया और उसे भारी नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा। यह तो बस शुरुआत थी।

आग और बर्फ के बीच अदम्य नेतृत्व

प्रेम बहादुर गुरुंग
प्रेम बहादुर गुरुंग

असफलता से बौखलाए शत्रु ने अगली ही रात, 24 सितम्बर को, और भी घातक हमला करने का निश्चय किया। इस बार उन्होंने हमले की शुरुआत भारी तोपखाने (Heavy Artillery) की गोलाबारी से की, जिसका उद्देश्य चौकी को पूरी तरह नष्ट करना था।

भीषण गोलाबारी के बीच, एक दुखद घटना हुई—सेक्शन के कमांडर घायल हो गए। ऐसे नाजुक पल में, जब चारों ओर गोलियाँ बरस रही थीं और जीवन दाँव पर था, नायक प्रेम बहादुर गुरुंग ने तत्काल कमान संभाल ली। यह किसी भी सैनिक के नेतृत्व क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा होती है, और गुरुंग इस पर पूरी तरह खरे उतरे।

उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी गोला-बारूद की कमी। भयंकर गोलाबारी के कारण आपूर्ति लगभग असंभव थी। लेकिन गुरुंग ने हार नहीं मानी। अपनी जान को खतरे में डालते हुए, वह तेज गोलाबारी के बीच दो बार प्लाटून मुख्यालय तक दौड़े और आवश्यक गोला-बारूद लेकर वापस आए। उनके इस अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा ने सेक्शन का मनोबल आसमान छूने लगा। गोरखा सैनिकों ने एकजुट होकर दुश्मन के सभी हमलों को विफल कर दिया। इस चरण के युद्ध में शत्रु के 6 सैनिक हताहत हुए।

खुखरी का तांडव: आखिरी और निर्णायक मुक़ाबला

24 सितम्बर को अभी भोर नहीं हुई थी, जब 03:25 बजे दुश्मन ने अंतिम और निर्णायक आक्रमण शुरू किया। पाकिस्तानी सैनिक लगभग 50 मीटर की दूरी तक चौकी के बहुत करीब आ गए थे। खतरा स्पष्ट और भयानक था।

इस क्षण, नायक प्रेम बहादुर गुरुंग ने वह किया जिसने उन्हें एक महावीर बना दिया। खतरे की गंभीरता को भाँपते हुए, उन्होंने अपनी खाई से बाहर निकलकर खुद को दुश्मन के सामने उजागर कर दिया। वह हथगोले और राइफल लेकर अकेले ही शत्रु पर ‘टूट पड़े’। उनका यह अप्रत्याशित, भयंकर और व्यक्तिगत हमला दुश्मन के लिए असहनीय था। शत्रु सेना इस अचानक आए आक्रमण को सह न सकी और सिर पर पाँव रखकर भागने लगी।

पीछा करते हुए, नायक गुरुंग ने पाया कि उनका सारा गोला-बारूद समाप्त हो चुका है। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपनी राइफल फेंक दी और अपनी पारंपरिक गोरखा खुखरी निकाली—एक ऐसा हथियार जो गोरखा सैनिकों की पहचान है। खुखरी हाथ में लेकर, वह भागते हुए शत्रु का पीछा करते रहे। अपनी व्यक्तिगत खुखरी की शक्ति से, उन्होंने दुश्मन के तीन सैनिकों को मार गिराया, जिससे दुश्मन की हमले की क्षमता पूरी तरह ध्वस्त हो गई।

सर्वोच्च बलिदान और महावीर चक्र

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

यही वह अंतिम और वीरतम मुठभेड़ थी। भागते हुए शत्रु पर प्रहार करते समय, एक दुश्मन की गोली नायक गुरुंग के सीने में आ लगी। वह घातक रूप से घायल हो गए और अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए।

नायक प्रेम बहादुर गुरुंग ने न केवल अपनी चौकी की रक्षा की, बल्कि अपनी व्यक्तिगत बहादुरी और नेतृत्व से युद्ध का रुख पलट दिया। उन्होंने अत्यंत विषम परिस्थितियों में, अदम्य साहस, असाधारण वीरता और कर्तव्य के प्रति सर्वोच्च समर्पण का परिचय दिया। राष्ट्र ने उनके इस सर्वोच्च बलिदान को सम्मान दिया।

उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान, महावीर चक्र (Mahavir Chakra) से अलंकृत किया गया।

नायक प्रेम बहादुर गुरुंग
नायक प्रेम बहादुर गुरुंग

नायक प्रेम बहादुर गुरुंग की कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे देश की सीमाएं जिन हाथों में सुरक्षित हैं, उनमें केवल बंदूक नहीं, बल्कि अटूट देशभक्ति और असाधारण शौर्य भी है। उनका बलिदान युगों-युगों तक भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा को प्रेरित करता रहेगा।

जय हिन्द!

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Lance Naik Ran Bahadur Gurung लांस नायक रण बहादुर गुरुंग – जिन्होंने कांगो में फहराया साहस का परचम (महावीर चक्र विजेता) https://shauryasaga.com/lance-naik-ran-bahadur-gurung-%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%97/ https://shauryasaga.com/lance-naik-ran-bahadur-gurung-%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%97/?noamp=mobile#respond Sat, 25 Oct 2025 08:58:19 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5774

लांस नायक रण बहादुर गुरुंग: साहस, पराक्रम और सर्वोच्च बलिदान की अमर कहानी

भारतीय सेना के इतिहास में ऐसे कई अनगिनत नायक हुए हैं, जिनकी वीरता की कहानियाँ सीमाओं से परे जाकर मानवता और शांति के मूल्यों को स्थापित करती हैं।

ऐसी ही एक अविस्मरणीय गाथा है लांस नायक रण बहादुर गुरुंग की, जिन्होंने सुदूर अफ्रीका के कांगो में संयुक्त राष्ट्र (UN) शांति मिशन के दौरान अपनी अद्भुत बहादुरी और कर्तव्यनिष्ठा से न केवल अपनी रेजिमेंट, बल्कि पूरे भारत का गौरव बढ़ाया। उनका सर्वोच्च बलिदान आज भी हमें प्रेरणा देता है।

रण बहादुर गुरुंग
रण बहादुर गुरुंग

नेपाल से भारतीय सेना तक का सफर

लांस नायक रण बहादुर गुरुंग का जन्म 06 अक्तूबर, 1935 को नेपाल के लामजुंग जिले के गाँव पारवरीकत में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कृष्ण बहादुर गुरुंग था। एक गोरखा परिवार में पले-बढ़े गुरुंग में बचपन से ही साहस और समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी थी।

इसी भावना के साथ, उन्होंने 06 अक्तूबर, 1952 को, अपनी 17वीं वर्षगांठ के दिन, भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 3/1 गोरखा राइफल्स में कदम रखा। यह भर्ती एक साधारण सैनिक के असाधारण सफर की शुरुआत थी, जिसने उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार तक पहुँचाया।

कांगो मिशन: शांति की स्थापना की चुनौती (1961)

कांगो मिशन
कांगो मिशन

वर्ष 1961 का समय था, जब मध्य अफ्रीका का देश कांगो (तत्कालीन कटांगा) गंभीर आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा था। संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) ने अंतर्राष्ट्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए सदस्य राष्ट्रों से सैन्य सहायता की अपील की। भारत ने इस वैश्विक जिम्मेदारी को समझते हुए तुरंत प्रतिक्रिया दी और शांति स्थापित करने के लिए एक पूरी ब्रिगेड कांगो भेजी। जिसमे लांस नायक रण बहादुर गुरुंग भी शामिल थे |

1961 की शुरुआत तक, कटांगा की विद्रोही सेनाओं, जिन्हें जेंडरमेरी कहा जाता था, ने एलिजाबेथविले जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कई मार्ग-अवरोध (रोडब्लॉक) खड़े कर दिए थे और कई रणनीतिक स्थानों पर कब्ज़ा जमा लिया था।

05 दिसम्बर तक, जेंडरमेरी को अतिरिक्त दो बटालियनें मिल चुकी थीं, जिसने उनकी शक्ति और आक्रामकता को बहुत बढ़ा दिया था। इस बढ़ते खतरे को समाप्त करने और क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए, संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं ने निर्णायक सैन्य कार्रवाई करने का निर्णय लिया।

06 दिसम्बर, 1961: शौर्य का अविस्मरणीय प्रदर्शन

रण बहादुर गुरुंग
रण बहादुर गुरुंग

सैन्य कार्रवाई के दौरान, 06 दिसम्बर को कटांगा में शत्रु के ठिकानों पर हमला बोलते समय, 3/1 गोरखा राइफल्स की बटालियन को जेंडरमेरी की मशीन गन और राइफल्स की तेज और सटीक गोलाबारी ने बुरी तरह घेर लिया। बटालियन आगे बढ़ने में मुश्किल महसूस कर रही थी।

ठीक इसी नाजुक समय पर, लांस नायक रण बहादुर गुरुंग ने वह असाधारण पहल की, जिसने युद्ध का रुख मोड़ दिया। उस समय वह अपनी प्लाटून की एक सेक्शन के द्वितीय कमान अफसर थे।

  1. अकेले हमला: बिना किसी की परवाह किए, रण बहादुर गुरुंग ने अपनी ब्रेन गन (लाइट मशीन गन) संभाली। उन्होंने दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच लगभग 300 मीटर तक रेंगते हुए, अपनी जान जोखिम में डालकर, शत्रु की एक मुख्य और मजबूत चौकी के बिल्कुल पास तक पहुँचने का जोखिम उठाया।
  2. नौ दुश्मनों का सफाया: दुश्मन की चौकी तक पहुँचकर, रण बहादुर गुरुंग ने अपनी ब्रेन गन से अचूक और घातक हमला किया। इस एकल कार्रवाई में, उन्होंने उस पूरी चौकी को ध्वस्त कर दिया और वहाँ तैनात सभी 9 शत्रु सैनिकों को मार गिराया। इस साहसिक कार्य ने बटालियन के लिए आगे बढ़ने का रास्ता खोल दिया और दुश्मन के एक महत्वपूर्ण प्रतिरोध बिंदु को समाप्त कर दिया।
  3. सर्वोच्च बलिदान: रण बहादुर गुरुंग की इस सफलता ने बटालियन को तो बढ़त दिलाई, लेकिन इसी बीच, उनका दल पास की एक पहाड़ी पर स्थित दुश्मन की मीडियम मशीन गन की तीव्र गोलाबारी के घेरे में आ गया। शत्रु की मशीन गन की बौछार में, राष्ट्र और शांति के लिए अपने कर्तव्य को निभाते हुए, लांस नायक रण बहादुर गुरुंग ने तत्काल वीरगति प्राप्त की।

अमर सम्मान: महावीर चक्र (मरणोपरांत)

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

लांस नायक रण बहादुर गुरुंग ने जिस अदम्य साहस, असाधारण कर्तव्यनिष्ठा और अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया, वह गोरखा रेजिमेंट की ‘कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो’ (कायर होने से मरना बेहतर है) की भावना को चरितार्थ करता है। राष्ट्र ने उनके इस अविस्मरणीय बलिदान को सलाम किया।

उन्हें उनकी उत्कृष्ट वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत शौर्य का प्रतीक है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शांति मिशनों में भारतीय सैनिकों के बेजोड़ योगदान को भी रेखांकित करता है।

रण बहादुर गुरुंग
रण बहादुर गुरुंग

लांस नायक रण बहादुर गुरुंग की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि भारत के वीर जवान सिर्फ देश की सीमाओं की ही नहीं, बल्कि वैश्विक शांति की रक्षा के लिए भी सदैव तत्पर रहते हैं। उनका त्याग और बलिदान पीढ़ियों तक प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

जय हिन्द !

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Rifleman Pati Ram Gurung राइफलमैन पाती राम गुरुंग: 1971 के युद्ध में वीरता की अमर कहानी https://shauryasaga.com/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%97-1971-rifleman-pati-ram-gurung/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%97-1971-rifleman-pati-ram-gurung/?noamp=mobile#respond Fri, 24 Oct 2025 10:27:33 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5759 राइफलमैन पाती राम गुरुंग

राइफलमैन पाती राम गुरुंग की वीरता और बलिदान की कहानी भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई है। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह ब्लॉग उनकी प्रेरणादायक कहानी को विस्तार से प्रस्तुत करता है, जो न केवल उनके शौर्य को दर्शाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।

पाती राम गुरुंग
पाती राम गुरुंग

प्रारंभिक जीवन और सेना में भर्ती

पाती राम गुरुंग का जन्म 8 सितंबर, 1948 को नेपाल के लामजुंग जिले के बर्दैन गांव में हुआ था। उनके पिता, श्री पदम बहादुर गुरुंग, एक साधारण परिवार से थे। बचपन से ही पाती राम में देशसेवा का जज्बा था। मात्र 15 वर्ष की आयु में, 8 मार्च, 1963 को उन्हें 5/1 गोरखा राइफल्स में एक बॉय के रूप में भर्ती किया गया। गोरखा सैनिकों की वीरता और अनुशासन की गौरवशाली परंपरा में शामिल होकर, पाती राम ने सैन्य प्रशिक्षण के दौरान अपनी क्षमता और समर्पण का परिचय दिया।

1971 का भारत-पाक युद्ध और उथाली का युद्धक्षेत्र

1971 का भारत-पाक युद्ध 1971 का भारत-पाक युद्ध पाती राम गुरुंग

1971 का भारत-पाक युद्ध भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस युद्ध में पूर्वी मोर्चे पर 5/1 गोरखा राइफल्स को 41 माउंटेन ब्रिगेड के साथ तैनात किया गया था। बटालियन को कुश्तिया जिले (वर्तमान बांग्लादेश) में उथाली नामक एक मजबूत दुश्मन ठिकाने पर कब्जा करने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया। यह ठिकाना दुश्मन की भारी मशीन गनों और बंकरों से सुरक्षित था, जिसके कारण इसे जीतना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था।

दुश्मन की मशीन गनों की तीव्र और सटीक गोलाबारी ने गोरखा सैनिकों की प्रगति को रोक दिया था। उथाली पर चढ़ाई के दौरान स्थिति इतनी जटिल थी कि किसी भी सैनिक के लिए आगे बढ़ना जानलेवा साबित हो सकता था। लेकिन युद्ध के मैदान में असाधारण साहस और निस्वार्थ भावना ही विजय की कुंजी होती है, और राइफलमैन पाती राम गुरुंग ने इसे साकार कर दिखाया।

असाधारण वीरता का प्रदर्शन

1971 war
1971 का भारत-पाक युद्ध और उथाली का युद्धक्षेत्र

उथाली के युद्धक्षेत्र में, राइफलमैन पाती राम गुरुंग अपनी कंपनी की मीडियम मशीन गन टुकड़ी के साथ थे। उनकी कंपनी एक दुश्मन बंकर से भारी मशीन गन की गोलाबारी की चपेट में आ गई, जिसने पूरी कार्रवाई को ठप कर दिया। इस बंकर को नष्ट करना युद्ध की सफलता के लिए अनिवार्य था, लेकिन यह कार्य अत्यंत जोखिम भरा था।

पाती राम ने स्थिति की गंभीरता को समझा और बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी जान की परवाह किए बिना आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने दुश्मन की मशीन गन चौकी पर सीधा आक्रमण किया। इस दौरान, दुश्मन की मशीन गन की बौछार ने उन्हें घातक रूप से घायल कर दिया। लेकिन उनकी इच्छाशक्ति अडिग थी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने मशीन गन पर प्रहार किया और उसे नष्ट करने में सफल रहे। इस प्रक्रिया में, उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन उनकी वीरता ने उनकी कंपनी को आगे बढ़ने का रास्ता साफ कर दिया।

मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

राइफलमैन पाती राम गुरुंग की इस असाधारण वीरता और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। महावीर चक्र भारत का दूसरा सर्वोच्च सैन्य सम्मान है, जो युद्ध के मैदान में असाधारण साहस और वीरता के लिए प्रदान किया जाता है। पाती राम की इस वीरगाथा ने न केवल उनकी बटालियन, बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया।

पाती राम गुरुंग की विरासत

पाती राम गुरुंग
पाती राम गुरुंग

राइफलमैन पाती राम गुरुंग की कहानी केवल एक सैनिक की वीरता की कहानी नहीं है; यह निस्वार्थ देशभक्ति और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है। उनकी वीरता ने यह साबित किया कि साहस और समर्पण के सामने कोई भी बाधा अजेय नहीं है। आज भी, उनकी कहानी भारतीय सेना के सैनिकों और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि देश की रक्षा के लिए सैनिक जिस समर्पण और साहस के साथ मैदान में उतरते हैं, वह अतुलनीय है। पाती राम गुरुंग जैसे वीर सैनिकों की कहानियां हमें अपने देश के प्रति कर्तव्य और सम्मान की भावना को जीवित रखने की प्रेरणा देती हैं।

राइफलमैन पाती राम गुरुंग की कहानी 1971 के युद्ध के उन अनगिनत नायकों में से एक है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा की। उनकी वीरता और बलिदान हमें यह याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता की कीमत कितनी भारी होती है। हम उनके साहस को नमन करते हैं और उनकी स्मृति को हमेशा अपने दिलों में संजोकर रखेंगे।

जय हिंद!

 

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Lance Havildar Nar Bahadur Ale लांस हवलदार नर बहादुर आले: 1987 सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर अमर वीरता की दास्तान https://shauryasaga.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%b9%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%87-1987/ https://shauryasaga.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8-%e0%a4%b9%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%87-1987/?noamp=mobile#respond Fri, 10 Oct 2025 08:01:20 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5717 लांस हवलदार नर बहादुर आले कल्पना कीजिए, दुनिया की सबसे ऊंची युद्ध भूमि पर, जहां हवा इतनी पतली है कि सांस लेना भी जंग लगता है। बर्फीले तूफान, -50 डिग्री की ठंड, और दुश्मन की गोलियां हर पल जान लेने को बेताब। ऐसे ही सियाचिन ग्लेशियर पर, 23-24 सितंबर 1987 की वो काली रात में, एक नेपाली मूल का साधारण सिपाही, लांस हवलदार नर बहादुर आले, ने अपनी जान की बाजी लगाकर भारतीय सेना की चौकी को बचाया। मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित, नर बहादुर आले की कहानी सिर्फ वीरता की नहीं, बल्कि एक इंसान के अटूट हौसले और देशभक्ति की है। आज, जब हम आराम की जिंदगी जी रहे हैं, उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि आजादी की कीमत क्या होती है। यह ब्लॉग उनकी भावुक गाथा को समर्पित है – एक ऐसी कहानी जो दिल को छू लेती है।

मिट्टी के खिलौनों से सेना की वर्दी तक

लांस हवलदार नर बहादुर आले
लांस हवलदार नर बहादुर आले
15 जुलाई 1954 को, नेपाल के दैलेख जिले के छोटे से गांव खेतर में, बाल बहादुर आले के घर एक बेटा पैदा हुआ। नाम रखा नर बहादुर। गांव की हरी-भरी वादियां, नदियों का कलकलाना, और परिवार की सादगी भरी जिंदगी – यही था उनका बचपन। लेकिन नेपाल के उन पहाड़ी इलाकों में, जहां गरीबी और कठिनाइयां आम हैं, नर बहादुर आले का मन हमेशा कुछ बड़ा करने को बेचैन रहता था। उनके पिता बाल बहादुर, एक मेहनती किसान, ने उन्हें सिखाया कि मेहनत और हिम्मत से हर मुश्किल हल हो सकती है। उम्र के सत्रहवें बसंत में, 15 जुलाई 1972 को, नर बहादुर आले ने भारतीय सेना में कदम रखा। 3/4 गोरखा राइफल्स – वो रेजिमेंट जो गोरखाओं की बहादुरी के लिए मशहूर है। नेपाली खून में बहने वाली वो जंगजू वीरता, जो कभी पीछे नहीं हटती। ट्रेनिंग के दिनों में, वो हमेशा सबसे आगे रहते। साथी सिपाहियों को हंसाते, लेकिन ड्यूटी पर लोहे जितने सख्त। कल्पना कीजिए, एक युवा लड़के का वो सपना – मां-बाप का नाम रोशन करना, और अगर जरूरत पड़ी तो देश के लिए जान देना। सियाचिन की ठंड ने उनकी परीक्षा ली, लेकिन उन्होंने कभी सिर नहीं झुकाया।

सियाचिन की कठोर जंग: जहां मौत भी सांस लेती है

सियाचिन
सियाचिन
1987 का साल। ऑपरेशन मेघदूत के तहत भारतीय सेना सियाचिन पर काबिज थी, लेकिन पाकिस्तानी घुसपैठिए हर मौके का फायदा उठाते। बिलाफंडला (बिला फोडला) की वो महत्वपूर्ण चौकी – ऊंची चोटी पर बसी, जहां हवा भी दुश्मन लगती है। लांस हवलदार नर बहादुर आले को मीडियम मशीन गन डिटैचमेंट की कमान सौंपी गई। उनकी गन, वो हथियार जो चौकी की ढाल था। दिन-रात बर्फ से लड़ना, ऑक्सीजन की कमी से जूझना, और फिर दुश्मन की नजरों का इंतजार। 23 सितंबर की रात, अंधेरा घना था। अचानक, दुश्मन ने भारी तोपखाने की बौछार शुरू कर दी। गोलियां आसमान से बरस रही थीं, और साथ ही सैकड़ों की तादाद में पाकिस्तानी सैनिक चौकी पर टूट पड़े। नर बहादुर आले की मशीन गन गरजी। सटीक निशाना, लगातार गोलियां – हमला रुक गया। लेकिन ये तो शुरुआत थी। 24 सितंबर को, सुबह होते ही दूसरा हमला। इस बार और भयानक – रॉकेट लॉन्चर, तोपें, और पैदल हमलावर। चौकी हिलने लगी। एक गोला ऐसा आया कि गन क्रू बिखर गया। नर बहादुर के बाएं पैर पर सीधा वार – हड्डियां चकनाचूर, खून की धार बहने लगी। दर्द इतना कि कोई और तो चीख उठता, लेकिन नर बहादुर? वे चुपचाप उठे। खून से लथपथ, पैर घसीटते हुए, नर बहादुर आले ने मशीन गन उठाई। कूल्हे पर लादकर, 50 मीटर दूर रुके दुश्मन पर गोलियां बरसाईं। कम से कम 15 दुश्मन ढेर। हमला टूट गया। साथी हैरान – “भाई, पीछे हट जाओ, मेडिकल मदद लो!” लेकिन नर बहादुर आले ने इंकार कर दिया। “चौकी को खतरा है, मैं हटूंगा नहीं।” स्थिति की गंभीरता देखी, और दो और हमलों को अपनी गन से रोका। आखिरकार, घावों ने साथ देना छोड़ दिया। नर बहादुर आले की शहादत हो गई। लेकिन उनकी वो आखिरी लड़ाई, सियाचिन की बर्फ पर अमिट निशान छोड़ गई। सोचिए, एक इंसान कैसे इतना मजबूत हो सकता है? खून बह रहा हो, दर्द चीर रहा हो, फिर भी देश पहले।

महावीर चक्र: देश का गौरव

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC
नर बहादुर की शहादत की खबर जब नेपाल के खेतर गांव पहुंची, तो पूरा गांव सन्न रह गया। पिता बाल बहादुर की आंखों में आंसू, मां का सीना विदीर्ण। लेकिन साथ ही, गर्व भी। राष्ट्रपति ने मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया – वो सम्मान जो ‘महा वीर’ कहलाता है। भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य पुरस्कार, जो दुश्मन के सामने असाधारण बहादुरी के लिए मिलता है। नर बहादुर की वो गन आज भी सियाचिन की चौकियों में प्रेरणा है। गोरखा रेजिमेंट के जवान उनकी कहानी सुनाते हैं, और आंखें नम हो जाती हैं। उनकी शहादत ने साबित किया कि सीमाएं सिर्फ जमीन पर नहीं, दिलों में भी खींची जाती हैं। नेपाली मूल का ये सिपाही, भारतीय सेना का लाल। आज, जब सियाचिन पर शांति की बात होती है, नर बहादुर की याद हमें चेतावनी देती है – शांति की कीमत साहस से चुकानी पड़ती है।

आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा: हौसले की वो मशाल

लांस हवलदार नर बहादुर आले
लांस हवलदार नर बहादुर आले
नर बहादुर आले जैसी कहानियां हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। आज के युवा, जो एसी कमरों में बैठे हैं, क्या वे ऐसी ठंड सह सकते हैं? उनकी वीरता सिखाती है कि जिंदगी में असली जीत दर्द सहने में है। परिवार से दूर, मौत के मुंह में झांकते हुए भी मुस्कुराना। अगर आप सियाचिन घूमने जाएं, तो बिलाफंडला की चोटी पर खड़े होकर महसूस कीजिए – वो हवा में अभी भी उनकी सांसें गूंजती हैं। उनकी याद में, हम सबको वादा करना चाहिए: देश के लिए कुछ न कुछ करेंगे। चाहे छोटा ही सही। लांस हवलदार नर बहादुर आले की शहादत एक दर्द भरी, लेकिन गर्वित कहानी है। सियाचिन की बर्फीली रातों में, उन्होंने साबित किया कि सच्चा सिपाही कभी हार नहीं मानता। महावीर चक्र सिर्फ एक मेडल नहीं, बल्कि लाखों दिलों का सम्मान है। आज, 2025 में भी, जब हम उनकी जयंती मनाते हैं, आइए नमन करें। जय हिंद! जय गोरखा! Follow us on :- शौर्य गाथा Shaurya Saga | Facebook also read :- देविन्दर सिंह अहलावत Captain Devinder Singh Ahlawat Hero of 1971 India-Pak war: महावीर चक्र for more :- Shaurya naman is the best ngo for martyrs family and soldier ]]>
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Major Dhan Singh Thapa मेजर धन सिंह थापा: 1962 के युद्ध का अमर नायक https://shauryasaga.com/major-dhan-singh-thapa-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%9c%e0%a4%b0-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be-1962-%e0%a4%95%e0%a5%87/ https://shauryasaga.com/major-dhan-singh-thapa-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%9c%e0%a4%b0-%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%be-1962-%e0%a4%95%e0%a5%87/?noamp=mobile#respond Tue, 16 Sep 2025 09:34:49 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5544 भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो साहस, बलिदान और देशभक्ति की अमर गाथा बन गए। मेजर धन सिंह थापा इन्हीं में से एक हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध में अपनी असाधारण वीरता के लिए उन्हें परम वीर चक्र, भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान, प्रदान किया गया।

Major Dhan Singh Thapa


शुरुआती जीवन: एक गोरखा सैनिक का उदय

Major Dhan Singh Thapa धन सिंह थापा का जन्म 28 अप्रैल, 1928 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में एक नेपाली परिवार में हुआ था। उनके पिता, पी.एस. थापा (पदम सिंह थापा), एक साधारण परिवार से थे। शिमला की पहाड़ियों में पले-बढ़े धन सिंह ने गोरखा समुदाय की सैन्य परंपराओं से प्रेरणा ली। गोरखा सैनिक अपनी नन्ही कद-काठी, अपार साहस और खुखरी (पारंपरिक चाकू) के लिए प्रसिद्ध हैं। युवावस्था में ही धन सिंह ने सेना में शामिल होने का फैसला किया। 28 अगस्त, 1949 को वे 1/8 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त कर भारतीय सेना का हिस्सा बने। अपने शुरुआती करियर में, उन्होंने नगालैंड में उग्रवाद-रोधी अभियानों में हिस्सा लिया, जहां उनकी नेतृत्व क्षमता और साहस की झलक दिखाई दी।


1962 का भारत-चीन युद्ध: सिरिजाप-1 की वीरतापूर्ण रक्षा

1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ा, जो भारत के लिए एक कठिन दौर था। मेजर धन सिंह थापा को लद्दाख के सिरिजाप घाटी में सिरिजाप-1 चौकी की कमान सौंपी गई थी। यह चौकी पांगोंग त्सो झील के उत्तरी किनारे पर थी और चुशुल हवाई पट्टी की रक्षा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थी। भारत की “फॉरवर्ड पॉलिसी” के तहत इस चौकी को बनाए रखना जरूरी था, क्योंकि यह भारत-चीन सीमा पर नियंत्रण रेखा (LAC) के पास थी।

20 अक्टूबर, 1962 को चीनी सेना (People’s Liberation Army) ने सिरिजाप-1 पर भीषण हमला बोला। मेजर थापा की डी कंपनी (1/8 गोरखा राइफल्स) में केवल 28-30 सैनिक थे, जबकि चीनी सेना सैकड़ों की संख्या में थी, उनके पास टैंक और भारी तोपें थीं। इसके बावजूद, थापा ने अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाया और तीन हमलों का डटकर मुकाबला किया।

पहला हमला: साहस का प्रथम प्रदर्शन

Major Dhan Singh Thapa

सुबह-सुबह चीनी सेना ने भारी गोलाबारी और मोर्टार से हमला शुरू किया। चौकी को भारी नुकसान हुआ, कई सैनिक शहीद हो गए, और रसद आपूर्ति बाधित हो गई। मेजर थापा ने अपने सैनिकों को “जल्दी खोदो, गहरा खोदो” जैसे आदेशों से प्रेरित किया, ताकि वे मजबूत स्थिति में रहें। उनकी रणनीति और नेतृत्व के कारण पहला हमला नाकाम रहा, और चीनी सेना को भारी नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा।

दूसरा हमला: अडिग नेतृत्व

चीनी सेना ने फिर से हमला बोला, इस बार और तीव्रता के साथ। मेजर थापा ने अपने सैनिकों को एकजुट रखा। इस दौरान, नायक कृष्णबहादुर थापा जैसे सैनिकों ने असाधारण साहस दिखाया। कृष्णबहादुर का एक पैर गोले के टुकड़े से कट गया, लेकिन उन्होंने लाइट मशीन गन से गोलीबारी जारी रखी। इस वीरता ने चीनी सेना को फिर से पीछे धकेल दिया।

तीसरा हमला: खुखरी की धार और अंतिम बलिदान

Major Dhan Singh Thapa

गोला-बारूद और संसाधन खत्म होने लगे। तीसरे हमले में चीनी सेना ने पूरी ताकत झोंक दी। चौकी पर कब्जा हो गया। मेजर थापा और तीन अन्य गोरखा सैनिकों ने अपनी पारंपरिक खुखरी निकाली और दुश्मन पर टूट पड़े। उन्होंने कई चीनी सैनिकों को मार गिराया, लेकिन अंततः वे हार गए। थापा और दो अन्य सैनिकों को बंदी बना लिया गया, जबकि बाकी सैनिक शहीद हो गए।

उस समय खबर फैली कि मेजर थापा शहीद हो गए। एक असफल बचाव अभियान, जिसमें स्टॉर्म बोट्स का इस्तेमाल हुआ, ने भी यही बताया कि चौकी नष्ट हो गई और सभी सैनिक मारे गए। इस आधार पर, 26 अक्टूबर, 1962 को उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। लेकिन नवंबर 1962 में युद्धविराम के बाद, जब थापा चीनी कैद से रिहा हुए, तो देश को अपने जीवित नायक की वापसी की खुशी मिली।

परम वीर चक्र उद्धरण – मेजर धन सिंह थापा लद्दाख में एक अग्रिम चौकी के कमांडर थे। 20 अक्टूबर को चीनी सेना ने भारी संख्या में हमला किया। भारी गोलाबारी के बावजूद, थापा के नेतृत्व में उनकी छोटी टुकड़ी ने हमले को विफल कर दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया। 21 अक्टूबर को दूसरा हमला हुआ, जिसमें थापा कंधे में घायल हुए, फिर भी उन्होंने जवाबी हमला किया। दूसरी बार घायल होने के बाद भी उन्होंने निकासी से इनकार किया और अंत तक लड़े। उनकी वीरता और नेतृत्व हमारी सेना की सर्वोच्च परंपराओं का प्रतीक है।”

  • परम वीर चक्र: थापा को 26 अक्टूबर, 1962 को मरणोपरांत परम वीर चक्र दिया गया, जो उनकी रिहाई के बाद जीवित प्राप्तकर्ता के रूप में दर्ज हुआ।

एक नायक की वापसी

चीनी कैद से रिहा होने के बाद, मेजर थापा की जीवित वापसी ने पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ा दी। उन्होंने भारतीय सेना में अपनी सेवा जारी रखी और 1980 में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद, उन्होंने कुछ समय तक सहारा एयरलाइंस में काम किया। 6 सितंबर, 2005 को उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी शुकला थापा, बेटियाँ पूर्णिमा और पूनम, और बेटा परम दीप थापा (जिनका नाम उनके परम वीर चक्र के सम्मान में रखा गया) उनकी विरासत को संजोए हुए हैं।


मेजर थापा की विरासत

मेजर धन सिंह थापा की वीरता आज भी भारत के सैन्य इतिहास में एक प्रेरणास्रोत है। उनकी याद में पांगोंग त्सो के पास धन सिंह थापा पोस्ट बनाई गई, जो भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) द्वारा संचालित एक स्थायी चौकी है। 1980 के दशक में, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने एक तेल टैंकर का नाम एमटी मेजर धन सिंह थापा, पीवीसी रखा, जो 25 साल तक सेवा में रहा। उनकी कहानी किताबों, सैन्य रिकॉर्ड्स और गोरखा रेजिमेंट की गौरव गाथाओं में अमर है। उनकी खुखरी की धार और गोरखा सैनिकों का जज्बा आज भी युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करता है।


एक नायक की अमर गाथा

मेजर धन सिंह थापा की कहानी केवल एक सैनिक की नहीं, बल्कि एक ऐसे नायक की है जिसने असंभव परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। अपनी छोटी-सी टुकड़ी के साथ उन्होंने सैकड़ों दुश्मनों का सामना किया, अपनी खुखरी की धार से चीनी सेना को चुनौती दी, और देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। उनकी वीरता ने न केवल 1962 के युद्ध में भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाया, बल्कि आज भी यह हमें सिखाती है कि साहस, नेतृत्व और देशभक्ति के सामने कोई बाधा बड़ी नहीं होती।

मेजर धन सिंह थापा की कहानी हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। उनकी खुखरी की चमक और गोरखा सैनिकों का जज्बा हमें याद दिलाता है कि देश की रक्षा के लिए कोई भी बलिदान छोटा नहीं होता। इस महान नायक को कोटि-कोटि नमन!

जय हिन्द !

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