Site icon shauryasaga.com

Major Vijay Ratan Chaudhry शौर्य गाथा: मेजर विजय रतन चौधरी – महावीर चक्र (मरणोपरांत)

मेजर विजय रतन चौधरी का नाम भारतीय सेना के उन बहादुर अधिकारियों में शामिल है, जिन्होंने देश की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी और सर्वोच्च बलिदान दिया। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनके अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य विरासत

मेजर विजय रतन चौधरी
मेजर विजय रतन चौधरी

मेजर विजय रतन चौधरी का जन्म 09 जुलाई, 1939 को पंजाब के अम्बाला छावनी में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. एम.डी. चौधरी था। उनके परिवार में पहले से ही सैन्य सेवा की लंबी परंपरा थी, जिससे प्रेरणा लेकर उन्होंने भी देश सेवा का मार्ग चुना।

  • कमीशन: उन्हें 14 दिसंबर, 1958 को कोर ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन मिला।
  • शिक्षा: उन्होंने 1962 में कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग, पुणे से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

1971 के युद्ध में अद्वितीय शौर्य

1971 का भारत-पाक युद्ध

1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, मेजर विजय रतन चौधरी 9 इंजीनियरिंग रेजीमेंट में कार्यरत थे। पश्चिमी मोर्चे पर साम्बा सेक्टर में भारतीय सेना ने शत्रु के इलाके में घुसने की एक योजना बनाई।

चक्रा में निर्णायक भूमिका:

11 दिसंबर की रात को, भारतीय सेना को चक्रा में दुश्मन द्वारा बिछाए गए विस्तृत सुरंग क्षेत्र (Minefield) के कारण भारी रुकावट का सामना करना पड़ा। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए, भारतीय आर्मर के लिए सुरंग क्षेत्र को पार करना अत्यंत आवश्यक हो गया था।मेजर विजय रतन चौधरी ने इस विकट चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने सुरंग क्षेत्र को साफ करने और भारतीय आर्मर के लिए सुरक्षित मार्ग खोलने का बीड़ा उठाया।

“दुश्मन की गोलियों की परवाह न कर अपनी जान पर खेलते हुए उन्होंने सुरंग हटाने की कार्रवाई की देख-रेख की।”

मेजर विजय रतन चौधरी ने शत्रु की भयंकर गोलाबारी के बावजूद, न तो हार मानी और न ही हतोत्साहित हुए। उन्होंने अपने सैनिकों के बीच सक्रिय रूप से घूमते हुए, कभी सहायता करते हुए तो कभी आवश्यक आदेश देते हुए, तब तक काम जारी रखा जब तक रास्ता तैयार नहीं हो गया। उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप, चक्रा के सुरंग भरे क्षेत्र में आवागमन पुनः प्रारम्भ हो गया, जिससे भारतीय आर्मर और टैंकमारक सामग्री अपने गंतव्य तक पहुँच सकी।

अंतिम बलिदान

मेजर विजय रतन चौधरी

मेजर विजय रतन चौधरी का नेतृत्व यहीं नहीं रुका। उन्होंने साम्बा क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए ठाकुरद्वारा, लोहारा और बसंतार नदी के 950 से 1400 मीटर तक गहरे सुरंग क्षेत्रों को साफ करने में अपने दल का कुशल नेतृत्व किया।

17 दिसंबर को, बसंतार के सुरंग क्षेत्र में रास्ता बनाते समय देख-रेख करते हुए, मेजर विजय रतन चौधरी शत्रु की गोलाबारी की चपेट में आ गए और शहीद हो गए। विडंबना यह थी कि उन्होंने जिस स्थान पर अपने प्राण त्यागे, वह उनके घर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर था।

महावीर चक्र सम्मान: मेजर विजय रतन चौधरी

महावीर चक्र MVC

मेजर विजय रतन चौधरी को 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनके असाधारण साहस और बलिदान के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान, परमवीर चक्र के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य अलंकरण है, जो दुश्मन की उपस्थिति में ज़मीन, समुद्र या हवा में किए गए विशिष्ट वीरतापूर्ण कार्य के लिए दिया जाता है।

प्रशस्ति पत्र का सार

महावीर चक्र की प्रशस्ति में विशेष रूप से साम्बा सेक्टर में उनके नेतृत्व और बहादुरी का उल्लेख है:

  • वीरतापूर्ण कार्य: 11 दिसंबर, 1971 को घने अंधेरे में, मेजर विजय रतन चौधरी ने 9 इंजीनियरिंग रेजीमेंट के अपने दल का नेतृत्व किया। दुश्मन के भारी सुरंग क्षेत्र (Minefield) को साफ़ करने और भारतीय आर्मर के लिए एक सुरक्षित मार्ग खोलने का अत्यंत जोखिम भरा काम उन्होंने हाथ में लिया।
  • अदम्य साहस: शत्रु की तरफ से हो रही लगातार और भीषण गोलाबारी के बावजूद, उन्होंने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी जान को खतरे में डालकर अपने सैनिकों के बीच सक्रिय रूप से घूमते हुए कार्य की देखरेख की, आदेश दिए और उनका मनोबल बनाए रखा।
  • परिणाम: उनके प्रयासों के कारण चक्रा के सुरंग क्षेत्र में रास्ता खुल गया, जिससे भारतीय आर्मर और टैंक-भेदी हथियार अपने गंतव्य तक पहुँच सके और भारतीय आक्रमण को गति मिली।
  • सर्वोच्च बलिदान: 17 दिसंबर को, बसंतार के पास एक और सुरंग क्षेत्र में रास्ता बनाते समय, वह दुश्मन की गोलाबारी में शहीद हो गए।

    मेजर विजय रतन चौधरी

मेजर विजय रतन चौधरी उनका यह कार्य कर्तव्य के प्रति असाधारण समर्पण और असाधारण बहादुरी का प्रतीक था।

मेजर विजय रतन चौधरी का बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि हमारी स्वतंत्रता और सुरक्षा हमारे बहादुर सैनिकों के असाधारण साहस और त्याग का परिणाम है। वह न केवल कोर ऑफ इंजीनियर्स के लिए, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

जय हिन्द!

also read:-नायक चैन सिंह Naik Chain Singh: Immortal Hero of 1962 Indo-China War – Mahavir Chakra (Posthumous) Legend

follow us:-शौर्य गाथा Shaurya Saga | Facebook

Exit mobile version