Veer Chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Fri, 21 Nov 2025 08:03:59 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Veer Chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी (वीर चक्र): नूरानांग के अमर शहीद https://shauryasaga.com/lance-naik-trilok-singh-negi-veer-chakra/ https://shauryasaga.com/lance-naik-trilok-singh-negi-veer-chakra/?noamp=mobile#respond Fri, 21 Nov 2025 08:00:50 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5952

Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी (वीर चक्र): नूरानांग के अमर शहीद

Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी, वीर चक्र (मरणोपरांत), भारतीय सेना की 4वीं बटालियन, गढ़वाल राइफल्स (4 Garhwal Rifles) के एक ऐसे वीर सपूत थे, जिनकी कहानी भारतीय सैन्य इतिहास में अदम्य साहस और निःस्वार्थ बलिदान का एक स्वर्णिम अध्याय है। उनका शौर्य विशेष रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, नूरानांग की दुर्गम पहाड़ियों पर पहुंचा, जहां उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

Lance Naik Trilok Singh Negi
Lance Naik Trilok Singh Negi

प्रारंभिक जीवन और सैन्य प्रेरणा

Lance Naik Trilok Singh Negi त्रिलोक सिंह नेगी का जन्म 3 दिसंबर, 1940 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के छोटे से और शांत गाँव थैर में हुआ था। वह एक साधारण लेकिन देशभक्त परिवार से थे। उनके पिता, श्री चितर सिंह, और माता, श्रीमती बिकला देवी, ने उन्हें गढ़वाली संस्कृति के मजबूत मूल्यों—साहस, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा—के साथ पाला। एक पहाड़ी क्षेत्र का निवासी होने के नाते, उनका स्वभाव बचपन से ही कठोर, लचीला और चुनौतियों का सामना करने को तत्पर था।

पहाड़ों के अधिकांश युवाओं की तरह, Lance Naik Trilok Singh Negi त्रिलोक सिंह के मन में भी सेना की वर्दी और देश सेवा का गहरा आकर्षण था। अपने 18वें जन्मदिन के ठीक दिन, 3 दिसंबर, 1958 को, वह भारतीय सेना में शामिल हो गए। उन्हें गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की 4वीं बटालियन में नियुक्त किया गया। गढ़वाल राइफल्स, अपनी युद्ध परंपराओं और ‘बढ़ता जा’ (आगे बढ़ो) के नारे के लिए जानी जाती है, जिसने युवा त्रिलोक सिंह के सैन्य जुनून को और भी मजबूत किया। अपनी प्रारंभिक सेवा के दौरान, उन्होंने अनुशासन, तीव्र निशानेबाजी और उत्कृष्ट शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए तेजी से लांसनायक का पद प्राप्त किया।

1962 का निर्णायक युद्ध और नूरानांग की पोस्ट

जब अक्टूबर 1962 में भारत-चीन युद्ध छिड़ा, तो Lance Naik Trilok Singh Negi की बटालियन को अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन नेफा) के संवेदनशील क्षेत्र में तैनात किया गया था। युद्ध की सबसे क्रूर और निर्णायक लड़ाई में से एक, नूरानांग की लड़ाई, 17 नवंबर, 1962 को लड़ी गई। नूरानांग पुल के पास स्थित यह भारतीय पोस्ट अत्यंत रणनीतिक महत्व रखती थी।

इस दिन, चीनी सेना ने भारतीय ठिकानों पर तीसरी बार भीषण और संगठित हमला किया। हमलावर सेना एक मीडियम मशीन गन (MMG) को भारतीय पोस्ट के बहुत करीब लाने में सफल रही। इस एमएमजी की सटीक और तीव्र गोलीबारी ने भारतीय सैनिकों को प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने से रोक दिया और पोस्ट को बचाने का कार्य लगभग असंभव बना दिया। पोस्ट के कमांडर और सैनिकों के लिए यह स्थिति जीवन-मरण का प्रश्न बन गई थी।

वीरता: एमएमजी को नष्ट करने का अभियान

इस संकटपूर्ण क्षण में, Lance Naik Trilok Singh Negi ने एक ऐसा निर्णय लिया जो उन्हें भारतीय सेना के इतिहास में अमर कर गया। उन्होंने अपने साथियों, राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं और राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, के साथ मिलकर दुश्मन की उस खतरनाक एमएमजी पोस्ट को निष्क्रिय करने का संकल्प लिया। यह आत्मघाती मिशन था, जिसमें सफलता की संभावना बहुत कम थी।

तीनों वीरों ने दुश्मन की भयंकर गोलीबारी के बीच रेंगना शुरू किया। लांसनायक नेगी, जो स्टेन गन से लैस थे, ने सबसे आगे रहते हुए दुश्मन पर दबाव वाली और सटीक कवरिंग फायर प्रदान करना शुरू किया। उनकी यह गोलीबारी इतनी प्रभावी थी कि उनके साथियों को एमएमजी ठिकाने के करीब पहुंचने का मौका मिला। गुसाईं और रावत ने तब हथगोले फेंककर उस ठिकाने को ध्वस्त कर दिया, और वहां तैनात चीनी गार्डों को काबू करके उस महत्वपूर्ण एमएमजी पर कब्ज़ा कर लिया। यह भारतीय सेना के लिए एक तात्कालिक और बड़ी सफलता थी।

सर्वोच्च बलिदान (The Supreme Sacrifice)

Lance Naik Trilok Singh Negi
Lance Naik Trilok Singh Negi

एमएमजी पर कब्ज़ा करने के बाद, जब राइफलमैन गुसाईं और रावत पकड़ी गई मशीन गन को लेकर वापस सुरक्षित क्षेत्र की ओर आ रहे थे, तब Lance Naik Trilok Singh Negi ने अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपना स्थान नहीं छोड़ा। वह लगातार दुश्मन पर कवरिंग फायर देते रहे।

इसी दौरान, दुश्मन की ऑटोमैटिक गोलीबारी के एक बर्स्ट से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। मृत्यु करीब होने के बावजूद, उन्होंने दर्द को दरकिनार करते हुए, अपनी अंतिम साँस तक फायर करना जारी रखा, ताकि उनके साथी सफलतापूर्वक पीछे हट सकें। उन्होंने अपने कर्तव्य को अपने जीवन से ऊपर रखा और 17 नवंबर, 1962 को रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अद्वितीय बलिदान ने न केवल उनके साथियों की जान बचाई, बल्कि नूरानांग पोस्ट को कुछ समय के लिए बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ (Vir Chakra)

Veer Chakra वीर चक्र
Veer Chakra वीर चक्र

Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, अदम्य साहस और कर्तव्य के प्रति सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ (Vir Chakra) से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी आज भी गढ़वाल राइफल्स और भारतीय सेना की हर इकाई में प्रेरणा का स्रोत है।

नवंबर 2025 में, उनके बलिदान के 63 साल बाद, गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट ने नूरानांग दिवस पर उनके पैतृक गाँव में उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ प्रदान किया और उनकी स्मृति में निर्मित ‘शौर्य द्वार’ का अनावरण किया। Lance Naik Trilok Singh Negi लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी का नाम हमेशा उन महान सैनिकों में गिना जाएगा जिन्होंने अपनी मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी।

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शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्मा Martyred Inspector Ashish Sharma https://shauryasaga.com/shaheed-inspector-ashish-sharma/ https://shauryasaga.com/shaheed-inspector-ashish-sharma/?noamp=mobile#respond Thu, 20 Nov 2025 11:06:00 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5960 शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्मा को बालाघाट में भावुक विदाई: पुलिसकर्मी से लेकर एसपी तक फूट-फूटकर रोए

नरसिंहपुर/बालाघाट/राजनांदगांव, 20 नवंबर 2025: मध्य प्रदेश पुलिस की स्पेशल एंटी-नक्सल हॉक फोर्स के बहादुर इंस्पेक्टर आशीष शर्मा, जो छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए, उनके पार्थिव शरीर को गुरुवार को बालाघाट पुलिस लाइन लाया गया। यहां श्रद्धांजलि सभा में शहीद का चेहरा देखते ही पूरा पुलिस महकमा भावुक हो गया। हॉक फोर्स के जवान अपने कप्तान बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। सहकर्मियों को इस हालत में देखकर एसपी साहब खुद भी फफक पड़े। यह दृश्य किसी की भी आंखें नम कर देने वाला था।

मुठभेड़ का पूरा घटनाक्रम 19 नवंबर 2025 को सुबह करीब 7-8 बजे छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के बोरतालाब थाना क्षेत्र के कौहापानी-कंघुर्रा जंगलों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र पुलिस की संयुक्त टीम नक्सल विरोधी अभियान चला रही थी। इंटेलिजेंस इनपुट मिला था कि तीन राज्यों की सीमा पर नक्सलियों का एक बड़ा ग्रुप छिपा हुआ है। टीम का नेतृत्व कर रहे इंस्पेक्टर आशीष शर्मा आगे बढ़े ही थे कि घात लगाए नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने कई नक्सलियों को मार गिराया (कुछ रिपोर्ट्स में 7 नक्सलियों के मारे जाने की बात), लेकिन आशीष शर्मा को सीने, पेट और पैर में متعدد गोलियां लगीं। उन्हें तुरंत डोंगरगढ़ अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उन्होंने वीरगति प्राप्त की। हेलीकॉप्टर से बेहतर इलाज के लिए ले जाने की तैयारी हो रही थी, लेकिन तब तक वे शहीद हो चुके थे।

शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्मा Martyred Inspector Ashish Sharma
शहीद इंस्पेक्टर आशीष शर्माMartyred Inspector Ashish Sharma

कौन थे शहीद आशीष शर्मा? Martyred Inspector Ashish Sharma

  • उम्र: महज 29-30 साल (कुछ रिपोर्ट्स में 40 का उल्लेख, लेकिन ज्यादातर में युवा बताया गया)
  • मूल निवासी: नरसिंहपुर जिले की गाडरवाड़ा तहसील के बोहानी गांव
  • पदस्थापना: बालाघाट हॉक फोर्स (किरनापुर क्षेत्र की कीन्ही चौकी प्रभारी)
  • उपलब्धियां: हॉक फोर्स के ‘आइडियल कमांडो’ कहे जाते थे। दो बार भारत सरकार से गैलेंट्री अवॉर्ड (वीरता पदक) मिल चुका था। फरवरी 2025 में बालाघाट के रौंदा जंगलों में हुई मुठभेड़ में तीन महिला नक्सलियों को मार गिराने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके लिए आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला और सब-इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर बने। पहले इंटेलिजेंस में आरक्षक रह चुके थे।
  • निजी जीवन: जनवरी 2026 में शादी होने वाली थी। परिवार में माता-पिता और छोटा भाई अंकित शर्मा हैं।

बालाघाट में भावुक श्रद्धांजलि शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा पुलिस लाइन पहुंचा तो छोटा भाई अंकित साष्टांग दंडवत होकर गिर पड़ा और दहाड़ें मारकर रोने लगा। हॉक फोर्स के जवानों ने अपने ‘आइडियल’ को अंतिम सलामी दी, लेकिन कोई खुद को रोक नहीं पाया। एसपी से लेकर सिपाही तक सबकी आंखें नम थीं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद बालाघाट पहुंचे और श्रद्धांजलि अर्पित की।

सीएम मोहन यादव का बयान सीएम ने X पर लिखा: “हॉक फोर्स के निरीक्षक आशीष शर्मा नक्सलियों से मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए। मैं उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। नक्सल उन्मूलन के राष्ट्रीय अभियान में उनका सर्वोच्च बलिदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।” सीएम ने घोषणा की कि शहीद के परिवार को सभी सुविधाएं दी जाएंगी, छोटे भाई को सरकारी नौकरी मिलेगी और सम्मान निधि प्रदान की जाएगी।

शहीद आशीष शर्मा की बहादुरी के किस्से पुलिस ट्रेनिंग में नए जवानों को सुनाए जाते थे। उनका बलिदान नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को और मजबूत करेगा। पूरा प्रदेश उनके परिवार के साथ है।

Martyred Inspector Ashish Sharma

ओम शांति! शहीद आशीष शर्मा अमर रहें!

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शहीद मोहम्मद इम्तियाज: ऑपरेशन सिंदूर में एक वीर की शहादत https://shauryasaga.com/shaheed-mohammad-imtiyaz-operation-sindoor-bihar/ https://shauryasaga.com/shaheed-mohammad-imtiyaz-operation-sindoor-bihar/?noamp=mobile#respond Thu, 11 Sep 2025 08:07:53 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5488 मोहम्मद इम्तियाज mohammad imtiyaz

बिहार के सरन जिले के छोटे से गांव नारायणपुर में 12 मई 2025 का दिन गम और गर्व  लेकर आया। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज , जो इस गांव के सपूत थे, की पार्थिव देह जब उनके पैतृक गांव पहुंची, तो हजारों लोगों की आंखें नम थीं, और दिलों में उनके प्रति सम्मान की लौ जल रही थी। जम्मू-कश्मीर के आरएस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान की ओर से की गई गोलीबारी में शहीद हुए इम्तियाज ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की। उनकी यह शहादत न केवल उनके परिवार और गांव के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐसी कहानी है, जो साहस, बलिदान और देशभक्ति की मिसाल बन गई।

मोहम्मद इम्तियाज mohammad imtiyaz

56 वर्षीय मोहम्मद इम्तियाज का जन्म सरन जिले के गड़खा थाना क्षेत्र के नारायणपुर गांव में हुआ था। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले इम्तियाज का जीवन देशसेवा के प्रति समर्पण का जीता-जागता उदाहरण था। बचपन से ही उनके मन में देश की रक्षा करने का जज्बा था। गांव के लोग बताते हैं कि इम्तियाज न केवल एक मेहनती और अनुशासित व्यक्ति थे, बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी थे, जिन्होंने गांव के कई युवाओं को सेना और अर्धसैनिक बलों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।

mohammad-imtiyaz का छोटा भाई, मोहम्मद असलम, जो स्वयं बीएसएफ में सब-इंस्पेक्टर है, उनके साथ कई बार सीमा पर तैनात रहा। दोनों भाइयों ने बांग्लादेश और मेघालय जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में एक साथ सेवा की। इम्तियाज की मेहनत और लगन ने उन्हें बीएसएफ में एक सम्मानित स्थान दिलाया। उनकी वर्दी उनके लिए सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि उनके कर्तव्य और देश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक थी।

नारायणपुर में उनका घर, जिसे उन्होंने और उनके भाई असलम ने मिलकर बनाया और ‘सीमा प्रहरी निवास’ का नाम दिया, आज भी उनकी देशभक्ति की कहानी कहता है। हर साल ईद और अन्य त्योहारों पर इम्तियाज अपने गांव लौटते थे। मार्च 2025 में अपनी आखिरी छुट्टी के दौरान, जब वे ईद मनाने घर आए थे, तब भी उन्होंने गांव के बच्चों और युवाओं के साथ समय बिताया, उन्हें पढ़ाई और देशसेवा के लिए प्रेरित किया। उस समय किसी को नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात होगी।

ऑपरेशन सिंदूर

ऑपरेशन सिंदूर भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखने और घुसपैठ को रोकने के लिए शुरू किया गया एक महत्वपूर्ण अभियान था। जम्मू-कश्मीर का आरएस पुरा सेक्टर, जहां मोहम्मद इम्तियाज तैनात थे, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यह इलाका अक्सर सीमा पार से गोलीबारी और तनाव का गवाह बनता है। इम्तियाज और उनकी बीएसएफ की टुकड़ी इस क्षेत्र में न केवल सीमा की सुरक्षा कर रही थी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी एक ढाल की तरह थी।

10 मई 2025 की देर शाम, पाकिस्तान की ओर से अचानक भारी गोलीबारी शुरू हुई। यह हमला इतना तीव्र था कि बीएसएफ की चौकियों पर तैनात जवानों को तुरंत मोर्चा संभालना पड़ा। मोहम्मद इम्तियाज, जो अपनी चौकी पर पूरी मुस्तैदी के साथ डटे थे, ने इस हमले का डटकर मुकाबला किया। लेकिन इस गोलीबारी में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी हालत नाजुक थी, और तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। mohammad-imtiyaz ने अपनी अंतिम सांस तक अपने कर्तव्य का पालन किया और देश के लिए शहादत दी।

शहादत की खबर: गांव में मातम, देश में गर्व

जब मोहम्मद इम्तियाज की शहादत की खबर नारायणपुर पहुंची, तो पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। उनके परिवार, जिसमें उनकी पत्नी, दो बेटे, और बेटियां शामिल हैं, के लिए यह एक असहनीय क्षति थी। उनके भाई असलम, जो स्वयं बीएसएफ में हैं, ने इस दुख को सहन करने की हिम्मत दिखाई। उन्होंने कहा, “मेरे भाई ने देश के लिए अपनी जान दी। हमें दुख है, लेकिन गर्व भी है कि उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।”

12 मई 2025 को जब इम्तियाज की पार्थिव देह उनके गांव लाई गई, तो हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़े। गांव के बुजुर्गों ने उनकी सादगी और देशभक्ति की मिसाल दी, जबकि युवाओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। स्थानीय प्रशासन और बीएसएफ के अधिकारियों ने भी उनके बलिदान को सलाम किया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल हर व्यक्ति की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में यह गर्व भी था कि उनका सपूत देश के लिए शहीद हुआ।

एक शहीद की अमर कहानी

मोहम्मद इम्तियाज की शहादत केवल उनके परिवार या नारायणपुर गांव की कहानी नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है, जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देता है। उनकी वीरता हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी और सुरक्षा उन अनगिनत सैनिकों के बलिदान का परिणाम है, जो दिन-रात सीमाओं पर हमारी हिफाजत के लिए खड़े रहते हैं।

इम्तियाज की जिंदगी और उनकी शहादत नारायणपुर के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है। उनका ‘सीमा प्रहरी निवास’ अब केवल एक घर नहीं, बल्कि देशभक्ति और बलिदान का प्रतीक है। उनकी स्मृति में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे। हमें उनके जैसे वीरों के सपनों को साकार करने के लिए अपने देश की सेवा और सम्मान में योगदान देना होगा।

देश के लिए एक संदेश

मोहम्मद इम्तियाज की शहादत हमें यह सिखाती है कि देश की रक्षा केवल सैनिकों का कर्तव्य नहीं है। हम सभी को अपने स्तर पर देश के लिए कुछ न कुछ करना होगा। चाहे वह समाज में एकता को बढ़ावा देना हो, युवाओं को प्रेरित करना हो, या देश की प्रगति में योगदान देना हो। इम्तियाज जैसे शहीदों की कहानियां हमें यह सिखाती हैं कि देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में होनी चाहिए।

शहीद मोहम्मद इम्तियाज अमर रहें! उनकी शहादत हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

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वीर चक्र लांस हवलदार उमराव सिंह यादव https://shauryasaga.com/vir-chakra-lance-havildar-umarao-singh-yadav/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-lance-havildar-umarao-singh-yadav/?noamp=mobile#respond Fri, 30 Aug 2024 15:08:05 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5248
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
लांस हवलदार उमराव सिंह यादव
4139233
10-08-1932 – 30-08-1965
वीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 1 पैराशूट (SF)
हाजी पीर का युद्ध
ऑपरेशन अब्लेज (ABLAZE)
भारत-पाक युद्ध 1965
लांस हवलदार उमराव सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत में 10 अगस्त 1932 को संयुक्त पंजाब (वर्तमान हरियाणा) के महेंद्रगढ़ जिले की कनीना तहसील के सुरजनवास गांव में श्री तोता राम यादव के घर में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वह भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 1 पैरा (SF) में पैराट्रूपर के पद पर नियुक्त किया गया था। अपनी बटालियन में भिन्न-भिन्न परिचालन परिस्थितियों और स्थानों पर सेवाएं देते हुए वर्ष 1965 तक वह लांस हवलदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
28 अगस्त 1965 को भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान में प्रवेश कर हाजी पीर दर्रे को अपने अधिकार में ले लिया था। कितु कुछ क्षेत्रों पर अभी भी पाकिस्तानी सेना का अधिकार था। 30 अगस्त 1965 को 1 पैराशूट बटालियन की एक कंपनी को हाजी पीर दर्रे की एक विशेषता पर अधिकार करने का आदेश दिया गया। लांस हवलदार उमराव सिंह इस कंपनी के एक प्लाटून के एक अग्रणी सेक्शन की कमान संभाल रहे थे। आक्रमण के आरंभ में पहले तो शत्रु की दो लाइट मशीन गनों से फायर आया, किंतु जैसे ही आक्रमण करने वाले सेक्शन के सैनिक शत्रु की स्थिति के ओर आगे बढ़े, एक अन्य लाइट मशीन गन से भी भीषण फायर आया, जिसने आक्रमण को रोक दिया।
इस विकट परिस्थिति में, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की पूर्णतः उपेक्षा करते हुए, लांस हवलदार उमराव सिंह ने शत्रु की लाइट मशीन गन की ओर आक्रमण किया और उच्च स्वर में अपने साथियों को पीछे आने का आदेश दिया। जब वह शत्रु की मशीन गन से 20 गज के अंतर पर थे, तब उन्होंने एक हथगोला फेंक कर उस मशीन गन को शांत कर दिया। इस वीरतापूर्ण कार्रवाई में उनकी छाती पर लाइट मशीन गन की गोलियों की झड़ लगी और वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
उनके द्वारा शत्रु की मशीन गन को नष्ट करने की साहसी और समयबद्ध कार्रवाई ने उनके सेक्शन के लक्ष्य पर अधिकार करने का मार्ग प्रशस्त किया। इस पूर्ण ऑपरेशन में लांस हवलदार उमराव सिंह ने अनुकरणीय साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” सम्मान दिया गया।
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वीर चक्र सूबेदार भीम सिंह बोहरा https://shauryasaga.com/vir-chakra-subedar-bhim-singh-bohra/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-subedar-bhim-singh-bohra/?noamp=mobile#respond Thu, 29 Aug 2024 13:23:31 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5223 Veer Chakra Subedar Bhim Singh Bohra
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सूबेदार भीम सिंह बोहरा
IO-18775
वीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती सुभद्रा देवी
यूनिट – 3/9 गोरखा राइफल्स
भारत-पाक युद्ध 1947-48
सूबेदार भीम सिंह बोहरा का जन्म कहराम बोहरा के घर में हुआ था। वह देहरादून के निवासी थे और भारतीय सेना की 9 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 3 बटालियन में सेवारत थे। वर्ष 1948 में वह जम्मू-कश्मीर के कबायली युद्ध में तैनात थे।
 
28/29 अगस्त 1948 की रात्रि, जम्मू कश्मीर के पुंछ क्षेत्र में एक पहाड़ी विशेषता पर किए गए आक्रमण में सूबेदार भीम सिंह बोहरा अग्रणी कंपनी के प्रभारी थे। हमारी अग्रिम पंक्ति शत्रु की प्रचंड फायरिंग में थी, तो भी सूबेदार भीम सिंह ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की पूर्णतः उपेक्षा करते हुए, आक्रमण का नेतृत्व किया और अपनी खुकरी चमकाते हुए वह शत्रुओं पर टूट पड़े।
 
शत्रु द्वारा दृढ़ता से अधिकृत स्थिति के उच्चतम बिंदु पर जब तक अधिकार नहीं कर लिया गया, तब तक वह शत्रु का पीछा करते रहे। तत्पश्चात शत्रु की तीव्र गोला वृष्टि के होते हुए भी अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हुए वह एक-एक चौकी तक गए। उसी समय उन्हें प्रत्यक्ष रूप से शत्रु मोर्टार का गोला लगा और वह वीरगति को प्राप्त हो गए‌।
 
सूबेदार भीम सिंह अपनी कंपनी के लिए वीरता का महान उदाहरण थे एवं इस पूरे ऑपरेशन में उनका साहस, नेतृत्व एवं वीरता उत्कृष्ट थी। उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
Veer Chakra Subedar Bhim Singh Bohra
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महावीर चक्र लेफ्टिनेंट कर्नल संपूर्ण सिंह https://shauryasaga.com/mahavir-chakra-lieutenant-colonel-sampurn-singh/ https://shauryasaga.com/mahavir-chakra-lieutenant-colonel-sampurn-singh/?noamp=mobile#respond Wed, 28 Aug 2024 13:32:02 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5220 Mahavir Chakra Lieutenant Colonel Sampooran Singh
—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
लेफ्टिनेंट कर्नल संपूर्ण सिंह
महावीर चक्र, वीर चक्र
यूनिट – 19 पंजाब रेजिमेंट
ऑपरेशन अब्लेज (ABLAZE)
भारत-पाक युद्ध 1965
लेफ्टिनेंट कर्नल संपूर्ण सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत में 22 फरवरी 1935 को संयुक्त पंजाब के वर्तमान लुधियाना जिले में सरदार रतन सिंह के घर में हुआ था। उन्हें भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था।
 
1965 के युद्ध में हाजी पीर दर्रे की ओर बढ़ने के लिए हमारी सेनाओं को बेदोरी पर अधिकार करना अति आवश्यक था। बेदोरी संपूर्ण क्षेत्र का अवलोकन करता एक सामरिक स्थान था तथा इस पर लाइट मशीन गनों और मीडियम मशीन गनों से सुसज्जित दो पाकिस्तानी कंपनियां तैनात थी। इस सीधी खड़ी चट्टानों युक्त स्थान पर अधिकार करना अत्यंत कठिन था। 26 और 27 अगस्त 1965 को वहां अधिकार करने के पिछले दो प्रयास विफल हो चुके थे।
 
28 अगस्त 1965 को 19 पंजाब रेजिमेंट को बेदोरी पर अधिकार करने का आदेश दिया गया। शत्रु की तीव्र फायरिंग ने बटालियन को भारी क्षति पहुंचाई और उसे दबा दिया। उस महत्वपूर्ण क्षण में लेफ्टिनेंट कर्नल संपूर्ण सिंह 19 पंजाब बटालियन की कमान संभाल रहे थे।
 
उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अति साहस और दृढ़ संकल्प के साथ अपने सैनिकों का नेतृत्व किया। अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की पूर्ण उपेक्षा करते हुए, अपने सैनिकों के साथ शत्रु की भीषण फायरिंग में वह आगे बढ़े और आगामी प्रातः तक बेदोरी पर अधिकार कर लिया।
 
इस ऑपरेशन में लेफ्टिनेंट कर्नल संपूर्ण सिंह ने भारतीय सेना की श्रेष्ठ परंपराओं में उच्च कोटि के साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। उन्हें “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया। ऑपरेशन रिडल में 9 सितंबर 1965 को उन्हें पुनः “महावीर चक्र” से अलंकृत किया गया था। वह ब्रिगेडियर के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे।
Mahavir Chakra Lieutenant Colonel Sampooran Singh महावीर चक्र लेफ्टिनेंट कर्नल संपूर्ण सिंह 
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वीर चक्र सिपाही गुरमेल सिंह https://shauryasaga.com/vir-chakra-sepoy-gurmel-singh/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-sepoy-gurmel-singh/?noamp=mobile#respond Sun, 25 Aug 2024 06:59:34 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5214 Veer Chakra Constable Gurmail Singh
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सिपाही गुरमेल सिंह
29-11-1944 – 25-08-1965
वीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 1 सिख रेजिमेंट
ऑपरेशन अब्लेज (ABLAZE)
भारत-पाक युद्ध 1965
सिपाही गुरमेल सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत में 29 नवंबर 1944 को संयुक्त पंजाब के भटिंडा (वर्तमान फरीदकोट) जिले के दल सिंह वाला गांव में सरदार काका सिंह एवं श्रीमती शाम कौर के परिवार में हुआ था। वह भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 1 सिख बटालियन में सिपाही के पद नियुक्त किया गया था।
 
25 अगस्त 1965 को जम्मू-कश्मीर में 1 सिख बटालियन की एक कंपनी ने शत्रु की स्थिति पर आक्रमण किया। किंतु लक्ष्य तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग शत्रु की मीडियम मशीनगन (MMG) और लाइट मशीनगन (LMG) के FIRE में होने से आक्रमण रोक दिया गया। सिपाही गुरमेल सिंह इस कंपनी के अग्रणी सेक्शन में थे।
 
अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए सिपाही गुरमेल सिंह आगे बढ़े और शत्रु की एक लाइट मशीन गन पर प्रत्यक्ष आक्रमण किया। उन्होंने अंधाधुंध गोलियां बरसा रही उस लाइट मशीन गन की अंगारे सी लाल बैरल को पकड़ कर बाहर खींच लिया। इस वीरतापूर्ण और भयानक कार्रवाई में उन्हें उस मशीन गन की अनेक गोलियां लगी और वह वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए।
 
सिपाही गुरमेल सिंह ने भारतीय सेना की सर्वोत्तम परंपराओं में अनुकरणीय साहस और दृढ़ संकल्प प्रदर्शित किया। उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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वीर चक्र मेजर सोमेश कपूर https://shauryasaga.com/vir-chakra-major-somesh-kapoor/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-major-somesh-kapoor/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Aug 2024 14:02:08 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5202
—— शौर्य दिवस -शौर्यनमन—–
मेजर सोमेश कपूर
वीर चक्र
यूनिट – 1 सिख रेजिमेंट
ऑपरेशन अब्लेज (Ablaze)
भारत-पाक युद्ध 1965
1965 के ऑपरेशन अब्लेज में मेजर सोमेश कपूर जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में 1 सिख बटालियन की एक कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे। 22 अगस्त 1965 को, मेजर सोमेश कपूर को, 24 अगस्त तक इस सेक्टर में शत्रु की दो चौकियों पर अधिकार करने का कार्य सौंपा गया। मेजर कपूर ने सामने से आक्रमण करने का निर्णय किया। 24 अगस्त को, मेजर कपूर ने अपनी कंपनी पोस्ट को प्रथम पोस्ट से आगे बढ़ाया। किंतु, जब वह द्वितीय पोस्ट से पचास गज की दूरी पर थे, उसी समय शत्रु ने मीडियम और लाइट मशीनगनों से प्रचंड और सटीक फायरिंग आरंभ कर दी।
शत्रु की भयानक फायरिंग से अभीत और अविचलित मेजर कपूर तृतीय प्लाटून के साथ, शत्रु की अग्रिम स्थिति से होकर आगे बढ़े और उसके भीतर के क्षेत्र पर आक्रमण किया। आक्रमण की गति और संवेग ने शत्रु के प्रतिरोध को तोड़ दिया और तीस मिनट में ही पोस्ट पर अधिकार कर लिया गया। आठ शत्रु सैनिक मारे गए, छह को बंदी बना लिया गया और विपुल मात्रा में शत्रु के शस्त्र और गोला-बारूद को अधिकृत कर लिया गया।
भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं में मेजर कपूर का नेतृत्व और कर्तव्य के प्रति समर्पण उनके सैनिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत थे। उच्च स्तरीय नेतृत्व, सूक्ष्म योजना और प्रचंड साहस प्रदर्शन के लिए मेजर कपूर को वीर चक्र सम्मान दिया गया। उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक सेना में अपनी सक्रिय सेवाएं प्रदान की।
वीर चक्र मेजर सोमेश कपूर
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वीर चक्र नायब सूबेदार मदन लाल https://shauryasaga.com/vir-chakra-naib-subedar-madanlal/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-naib-subedar-madanlal/?noamp=mobile#respond Fri, 16 Aug 2024 13:20:44 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5185
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
नायब सूबेदार मदन लाल
JC-175319W
09-10-1948 – 16-08-1988
वीर चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती मूली देवी
यूनिट – 1 पैराशूट रेजिमेंट (SF)
ऑपरेशन पवन
नायब सूबेदार मदन लाल का जन्म 9 अक्टूबर 1948 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील के बांसियाल गांव में पुरी की ढाणी में, श्री भजन राम के घर में हुआ था। 13 अप्रैल 1967 को वह भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 1 पैरा बटालियन में पैराट्रूपर के पद पर नियुक्त किया गया था। अपनी बटालियन में भिन्न-भिन्न स्थानों पर और परिचालन परिस्थितियों में सेवाएं देते हुए वह नायब सूबेदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे। वर्ष 1987-88 में उनकी बटालियन को भारतीय शांति सेना के एक भाग के रूप में ‘ऑपरेशन पवन’ में श्रीलंका में तैनात किया गया था।
16 अगस्त 1988 को, नायब सूबेदार मदन लाल श्रीलंका के आलमपिल जंगल में SEARCH & DESTROY ऑपरेशन चलाने के लिए तैनात कमांडो टुकड़ी के सदस्य थे। वह अपनी टुकड़ी के पार्श्व भाग को आगे ला रहे थे, उसी समय दूर कुछ ध्वनियां सुनाई पड़ी। टीम कमांडर ने नायब सूबेदार मदन लाल को 10 अन्य रैंकों के सैनिकों के साथ गश्त पर जाकर उस कोलाहल की जांच करने का आदेश दिया। नायब सूबेदार मदन लाल सक्रिय हुए और दांई ओर 150 मीटर जाने पर आकस्मिक उन्होंने उग्रवादियों का एक हरा तंबू देखा।
तंबू के भीतर गतिविधियों को देख, वह शीघ्रता से रेंगते हुए उस तंबू तक गए और साथ ही साथ उन्होंने अपने गश्ती दल को प्रसारित होने का आदेश दिया और इसके पश्चात उन्होंने अपनी एके -47 से दो बार तंबू पर अंधाधुंध फायर किए। जब नायब सूबेदार मदन लाल अपनी एके-47 की मैगजीन परिवर्तित करने की प्रक्रिया में थे, उसी समय उन पर दो खाइयों से एक साथ गोलियां चलाई गईं, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल होते हुए भी, उन्होंने मैगजीन परिवर्तित कर एक खाई पर फायर किए और एक उग्रवादी को मार दिया। अंततः अपने घातक घावों से वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
नायब सूबेदार मदन लाल एक वीर सैनिक और प्रतिबद्ध जूनियर कमीशंड अधिकारी (JCO) थे। इस ऑपरेशन में उन्होंने 3 उग्रवादियों को मारने और 6/7 अन्य उग्रवादियों को घायल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की। नायब सूबेदार मदन लाल को उनके अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय एवं वीरता के लिए मरणोपरांत “वीर चक्र” सम्मान दिया गया।
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वीर चक्र लांस नायक प्रेम पाल https://shauryasaga.com/vir-chakra-lance-naik-prem-pal/ https://shauryasaga.com/vir-chakra-lance-naik-prem-pal/?noamp=mobile#respond Sat, 27 Jul 2024 07:09:26 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5115
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
लांस नायक प्रेम पाल
406978W
01-01-1968 – 27-07-1998
वीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 19 गढ़वाल राइफल्स
आतंकवाद विरोधी अभियान
लांस नायक (धोबी) प्रेम पाल का जन्म 1 जनवरी 1968 को हुआ था। वह भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की 19 बटालियन में सेवारत थे।
जुलाई 1998 में बटालिक सेक्टर में HAA LC असुरक्षित थी और शत्रु के अवलोकन और फायरिंग से प्रभावित थी, अतः 19 गढ़वाल राइफल्स की एक अग्रिम चौकी वहां तैनात की गई। यद्यपि, लांस नायक (धोबी) प्रेम पाल Tradesman थे, तो भी उन्होंने स्वेच्छा से इस कठिन पिकेट पर अपनी सेवा प्रदान की।
27 जुलाई 1998 को निकट की एक चौकी शत्रु की तीन चौकियों से की जा रही तीव्र फायरिंग में घिर गई। उस चौकी पर दबाव अल्प करने के लिए लांस नायक प्रेम पाल की पिकेट ने फायरिंग की।
जब स्वचालित ग्रेनेड लॉंचर का गोला-बारूद रिक्त हो रहा था, तो लांस नायक प्रेम पाल स्वेच्छा से गोला-बारूद पुनर्भरण के लिए आगे आए। शत्रु तोपखाने की विनाशकारी गोला वृष्टि में, जब वह गोला-बारूद लेने बाहर आए तो उनकी जांघ में छर्रा (SPLINTER) लग गया। प्राथमिक उपचार के पश्चात, वह पुनः गोला-बारूद भरने के कार्य में लग गए।
अपरान्ह लगभग 01:45 बजे चौकी पर रखे केरोसीन बैरल्स पर एक गोला आकर गिरा, जिसके कारण वहां आग लग गई और शीघ्र ही वह आग गोला बारूद बंकरों की ओर फैलने लगी। आसन्न संकट को भांप, लांस नायक प्रेम पाल अनावृत स्थिति में अग्निशमन के लिए दौड़ पड़े। ऐसा करते समय उन्हें दांए कंधे के समीप मशीन गन की गोली लगी।
गोली के आघात से अविचलित, वह आगे बढ़े और अग्निशमन में सहायता करने में सक्षम रहे। जब वह रेंगते हुए अपने आश्रय (SHELTER) में लौट रहे थे, उसी समय उन्हें प्रत्यक्ष तोप का गोला लगा और वह तत्क्षण वीरगति को प्राप्त हो गए। लांस नायक प्रेम पाल के इस वीरतापूर्ण कार्य ने चौकी और उनके साथियों के जीवन की रक्षा की।
लांस नायक (धोबी) प्रेम पाल ने अतुलनीय प्रतिबद्धता की भावना, असाधारण सूझबूझ, कर्तव्य के प्रति निस्वार्थ समर्पण और कर्तव्य से परे वीरता का सर्वोच्च उदाहरण प्रदर्शित किया। 15 अगस्त 1999 को उन्हें मरणोपरांत “वीर चक्र” से सम्मानित किया गया।
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