Kargil story – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Fri, 23 Jan 2026 11:54:39 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Kargil story – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 Captain Anuj Nayyar: कैप्टन अनुज नय्यर 1 Brave Hero’s Fearless Sacrifice at Point 4875 https://shauryasaga.com/captain-anuj-nayyar-brave-hero-sacrifice/ https://shauryasaga.com/captain-anuj-nayyar-brave-hero-sacrifice/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Jan 2026 11:54:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6069

Captain Anuj Nayyar कैप्टन अनुज नय्यर की शौर्य गाथा : कारगिल का वो जांबाज, जिसने मौत को गले लगाकर तिरंगा फहराया

Captain Anuj Nayyar :- जब भी भारत के वीर सपूतों की बात होती है, तो 1999 के कारगिल युद्ध का नाम सबसे पहले आता है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसने दुनिया को दिखाया कि भारतीय सेना के पास न केवल आधुनिक हथियार हैं, बल्कि ऐसे जिगरे वाले सिपाही भी हैं जो अपनी मातृभूमि के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हीं नायकों में से एक थे कैप्टन अनुज नय्यर। मात्र 24 साल की उम्र में उन्होंने जो वीरता दिखाई, उसने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।

विवरण जानकारी
पूरा नाम कैप्टन अनुज नय्यर Captain Anuj Nayyar
जन्म 28 अगस्त, 1975
जन्म स्थान दिल्ली, भारत
पिता का नाम प्रो. एस. के. नय्यर (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के पूर्व कार्यकारी निदेशक)
माता का नाम श्रीमती मीना नय्यर
रेजीमेंट 17 जाट (17 Jat Regiment)
सम्मान महावीर चक्र (मरणोपरांत)

बचपन और सेना में आने का अटूट सपना

Captain Anuj Nayyar
Captain Anuj Nayyar

28 अगस्त 1975 को दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे Captain Anuj Nayyar बचपन से ही अन्य बच्चों से अलग थे। उनके पिता, प्रोफेसर एस.के. नय्यर, दिल्ली मेट्रो में कार्यरत थे। अनुज की शुरुआती शिक्षा दिल्ली के धौला कुआं स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल से हुई।

सेना की वर्दी के प्रति Captain Anuj Nayyar का आकर्षण इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करते ही नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) की परीक्षा दी और सफल हुए। NDA के 90वें कोर्स से पास आउट होने के बाद, उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रशिक्षण लिया। जून 1997 में वे भारतीय सेना की प्रतिष्ठित ’17 जाट रेजीमेंट’ में बतौर ऑफिसर शामिल हुए।

कारगिल युद्ध और मुश्कोह घाटी का मोर्चा

साल 1999 की गर्मियों में जब पाकिस्तान ने विश्वासघात करते हुए कारगिल की चोटियों पर कब्जा कर लिया, तब कैप्टन अनुज नय्यर को मोर्चे पर भेजा गया। उनकी टुकड़ी को मुश्कोह घाटी में स्थित पॉइंट 4875 को वापस जीतने का लक्ष्य दिया गया। यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चोटी थी, क्योंकि यहाँ से दुश्मन भारतीय सेना के रसद मार्ग पर सीधी नज़र रख सकते थे।

6 जुलाई 1999 की वह रात इतिहास में दर्ज होने वाली थी। Captain Anuj Nayyar को अपनी कंपनी के ‘चार्ली’ ग्रुप का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई। उनकी टुकड़ी को बिना किसी तोपखाने (Artillery) की मदद के ऊपर की ओर चढ़ना था, जबकि दुश्मन चोटी पर बंकर बनाकर बैठे थे और लगातार गोलियों की बौछार कर रहे थे।

अदम्य साहस: जब अकेले ही नष्ट किए चार बंकर

चढ़ाई के दौरान, Captain Anuj Nayyar और उनकी टीम पर भारी गोलीबारी हुई। लेकिन Captain Anuj Nayyar के इरादे चट्टान की तरह मजबूत थे। उन्होंने अपनी टीम को कवर दिया और खुद आगे बढ़कर दुश्मन के पहले बंकर पर ग्रेनेड से हमला किया। पहला बंकर तबाह हो गया। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और दूसरे तथा तीसरे बंकर को भी आमने-सामने की लड़ाई (Hand-to-Hand Combat) में नष्ट कर दिया।

अंतिम बंकर को नष्ट करते समय, एक दुश्मन का आरपीजी (RPG) सीधे अनुज को लगा। वे गंभीर रूप से घायल हो गए और खून से लथपथ थे। लेकिन मौत को सामने देखकर भी इस वीर योद्धा के कदम पीछे नहीं हटे। Captain Anuj Nayyar ने चौथे बंकर को भी नष्ट किया और यह सुनिश्चित किया कि उनके साथी चोटी पर कब्जा कर सकें। अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने अपनी टीम को लक्ष्य हासिल करते देखा।

मरणोपरांत सम्मान और अनमोल विरासत

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

Captain Anuj Nayyar  की इस शहादत ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि पूरे देश को गर्व से भर दिया। उनकी असाधारण वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया। जिस ‘पॉइंट 4875’ पर उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी, उसे आज सेना में सम्मान के साथ ‘नय्यर हिल’ के नाम से पुकारा जाता है।

एक भावुक पहलू यह भी है कि युद्ध पर जाने से कुछ समय पहले ही उनकी सगाई हुई थी और कुछ ही महीनों बाद उनकी शादी होने वाली थी। उनके पिता आज भी उनकी यादों को संजोकर रखते हैं। वे अक्सर बताते हैं कि अनुज के जूतों को वे आज भी खुद पॉलिश करते हैं, मानो उनका बेटा अभी सरहद से लौटकर आएगा।

Captain Anuj Nayyar
Captain Anuj Nayyar

Captain Anuj Nayyar  की कहानी केवल युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस जुनून की जो वतन की मिट्टी के लिए मर मिटने की प्रेरणा देता है। 24 साल की उम्र में जहाँ युवा अपने करियर की शुरुआत कर रहे होते हैं, अनुज ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया। आज का युवा वर्ग उनसे नेतृत्व, साहस और अटूट कर्तव्यनिष्ठा की सीख ले सकता है।

Captain Anuj Nayyar जैसे नायकों के कारण ही आज हम चैन की नींद सो पाते हैं। उनके बलिदान को यह देश कभी नहीं भूलेगा।

जय हिंद, जय भारत!


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Tashi Namgyal : How a Missing Yak Changed India’s History: Remembering the Hero of Kargil https://shauryasaga.com/tashi-namgyal-biography-kargil-hero/ https://shauryasaga.com/tashi-namgyal-biography-kargil-hero/?noamp=mobile#respond Thu, 18 Dec 2025 09:46:12 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6053

Tashi Namgyal ताशी नामग्याल: वो चरवाहा जिसने ‘याक’ ढूंढते-ढूंढते देश की सरहद बचा ली

Tashi Namgyal इतिहास अक्सर बड़ी जंगों, महान सेनापतियों और आधुनिक हथियारों की कहानियों से भरा होता है। लेकिन भारत के सामरिक इतिहास में एक ऐसा नाम भी दर्ज है, जिसके पास न तो कोई वर्दी थी और न ही कोई बंदूक। उनके पास थी तो बस एक दूरबीन, अपने मवेशियों के प्रति लगाव और एक सजग भारतीय की पैनी नज़र। हम बात कर रहे हैं लद्दाख के ताशी नामग्याल की

लद्दाख की वादियों में एक साधारण जीवन

Tashi Namgyal
Tashi Namgyal

Tashi Namgyal ताशी नामग्याल का जन्म लद्दाख की खूबसूरत ‘आरयन घाटी’ के गारखोन (Garkone) गांव में हुआ था। वह एक साधारण चरवाहे थे, जिनका जीवन सिंधु नदी के किनारे और ऊंचे पहाड़ों की तलहटियों में अपने याक और भेड़ों को चराते हुए बीतता था। दुर्गम पहाड़ियां और हाड़ कंपा देने वाली ठंड उनका रोजमर्रा का हिस्सा थी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनकी यही दिनचर्या भारत के इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक का केंद्र बन जाएगी।

मई 1999: एक ‘खोया हुआ याक’ और किस्मत का खेल

साल 1999 की गर्मियों की शुरुआत थी। ताशी ने हाल ही में एक नया याक खरीदा था, जो कहीं गुम हो गया था। ताशी के लिए वह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि उनकी आजीविका का साधन था। 2 या 3 मई का वह दिन था, जब ताशी अपने याक की तलाश में बटालिक सेक्टर की जुबार पहाड़ियों (Jubar Hills) पर काफी ऊंचाई तक चढ़ गए।

थक कर जब वह एक चट्टान पर बैठे और अपनी दूरबीन से नीचे की घाटियों और ऊपर की चोटियों को निहारने लगे, तो उन्हें कुछ ऐसा दिखा जिसने उनके होश उड़ा दिए। पहाड़ी की चोटी पर कुछ लोग पत्थर हटा रहे थे और बर्फ साफ कर रहे थे। उन्होंने देखा कि वे लोग पठान पोशाक में थे। Tashi Namgyal को तुरंत खटका हुआ कि इस दुर्गम इलाके में, जहां परिंदा भी पर नहीं मारता, वहां ये लोग क्या कर रहे हैं? और सबसे बड़ी बात, वे स्थानीय लोग नहीं लग रहे थे।

जब देश को आगाह किया

Tashi Namgyal के पास दो विकल्प थे—या तो वह अपने याक को ढूंढते रहते, या फिर जो देखा उसे सेना को बताते। उन्होंने देश को चुना। वह पहाड़ियों से भागते हुए नीचे उतरे और पास में स्थित 3 पंजाब रेजिमेंट की चौकी पर पहुंचे।

शुरुआत में सैनिकों को एक चरवाहे की बात पर यकीन करना मुश्किल लगा, क्योंकि उस समय सीमा पर शांति का माहौल था। लेकिन ताशी के दावों में इतनी सच्चाई और घबराहट थी कि सेना ने एक गश्ती दल (Patrol) ऊपर भेजने का फैसला किया। जब वह दल वहां पहुंचा, तो पाकिस्तानी सेना की भारी घुसपैठ की पुष्टि हो गई। ताशी की उस एक सूचना ने ‘ऑपरेशन विजय’ की नींव रखी।

युद्ध का नायक, गुमनामी का साया

Tashi Namgyal
Tashi Namgyal

कारगिल युद्ध छिड़ा, भारत के करीब 600 वीर जवान शहीद हुए, और अंततः भारत ने अपनी चोटियों को दुश्मन से मुक्त करा लिया। इस जीत के बाद Tashi Namgyal रातों-रात चर्चा में आए। उन्हें सेना के अधिकारियों द्वारा सम्मानित किया गया, प्रशस्ति पत्र मिले और मीडिया में ‘कारगिल का हीरो’ कहा गया।

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, Tashi Namgyal की कहानी फाइलों में दबती गई। ताशी को इस बात का मलाल हमेशा रहा कि जिस सजगता ने देश को इतने बड़े संकट से बचाया, उसे वह नागरिक सम्मान (जैसे पद्म पुरस्कार) नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। वह अक्सर कहते थे, “अगर वो मेरा नया-नवेला याक न होता, तो शायद मैं वहां न जाता और देश को कभी पता नहीं चलता कि दुश्मन घर के अंदर घुस आया है।”

अंतिम विदाई और विरासत

58 वर्ष की आयु में, दिसंबर 2024 में ताशी नामग्याल ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वह अपनी मृत्यु तक लद्दाख की उसी मिट्टी से जुड़े रहे, जिसे बचाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। भारतीय सेना ने उनकी याद में हाल ही में एक स्मारक भी बनाया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि एक ‘निहत्था चरवाहा’ भी राष्ट्र का रक्षक हो सकता है।

Tashi Namgyal की कहानी हमें सिखाती है कि देशभक्ति के लिए वर्दी की जरूरत नहीं होती, बस एक सजग नागरिक की नजर ही काफी है। वह भले ही युद्ध के मैदान में बंदूक लेकर नहीं लड़े, लेकिन वह उन 600 शहीदों और हजारों सैनिकों की जीत के पहले सूत्रधार थे।


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Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता :कारगिल युद्ध के नायक ,महावीर चक्र  https://shauryasaga.com/major-vivek-gupta-kargil-hero-mahavir-chakra/ https://shauryasaga.com/major-vivek-gupta-kargil-hero-mahavir-chakra/?noamp=mobile#respond Wed, 03 Dec 2025 10:33:14 +0000 https://shauryasaga.com/?p=6009

टोलोलिंग चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराने वाला सूरमा

Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता (2 जनवरी 1970 – 13 जून 1999) भारतीय सेना के एक अत्यंत वीर अधिकारी थे, जिन्हें 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) में उनके अदम्य साहस और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन सैन्य सम्मान महावीर चक्र (MVC) से सम्मानित किया गया था। वह 2 राजपूताना राइफल्स (2 Raj Rif) बटालियन का हिस्सा थे।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य यात्रा

Major Vivek Gupta MVC
Major Vivek Gupta MVC
  • जन्म और परिवार: मेजर विवेक गुप्ता का जन्म 2 जनवरी 1970 को देहरादून, उत्तराखंड में हुआ था। उनके पिता भी सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल बीआरएस गुप्ता थे।

  • शिक्षा और कमीशन: उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। 13 जून 1992 को, उन्हें अपने शौर्य के लिए प्रसिद्ध इन्फैंट्री रेजिमेंट राजपूताना राइफल्स में कमीशन मिला।

  • विवाह और सेवा: 1997 में, उन्होंने सेना अधिकारी कैप्टन राजश्री बिष्ट से विवाह किया। उन्हें उनकी असाधारण क्षमताओं के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) कमेंडेशन कार्ड से भी नवाजा गया था और वह महू के इन्फैंट्री स्कूल में एक हथियार प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किए गए थे।

कारगिल युद्ध में वीरता (जून 1999)

operatin vijay
operatin vijay

जब भारतीय सेना के पास घुसपैठ की सीमा के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, तब 2 राजपूताना राइफल्स को युद्ध में उतारा गया। Major Vivek Gupta मेजर विवेक गुप्ता और उनकी चार्ली कंपनी को द्रास सेक्टर में टोलोलिंग चोटी (Point 4590) पर स्थित शत्रु चौकियों पर फिर से कब्जा करने का महत्वपूर्ण और खतरनाक मिशन सौंपा गया।

यह मिशन बहुत कठिन था क्योंकि दुश्मन एक ऊँचे और सुरक्षित स्थान पर डटा हुआ था, जिससे वे नीचे की ओर चढ़ने वाले भारतीय सैनिकों पर आसानी से हमला कर सकते थे।

टोलोलिंग पर निर्णायक हमला

tololing
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13 जून 1999 को, जब 2 राजपूताना राइफल्स ने टोलोलिंग टॉप पर बटालियन हमला शुरू किया, मेजर विवेक गुप्ता अग्रणी चार्ली कंपनी की कमान संभाल रहे थे।

  1. भारी गोलीबारी का सामना: भारी तोपखाने और स्वचालित हथियारों की गोलीबारी के बावजूद, मेजर गुप्ता के नेतृत्व में कंपनी दुश्मन के करीब पहुँचने में सफल रही।

  2. तीव्र जवाबी हमला: जैसे ही कंपनी खुले में आई, उन पर कई दिशाओं से तीव्र गोलीबारी हुई, जिससे कंपनी के तीन जवान घायल हो गए और हमला अस्थायी रूप से रुक गया।

  3. साहसी नेतृत्व: Major Vivek Gupta को पता था कि खुले में रुकना अधिक नुकसानदायक होगा। उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की और दुश्मन की चौकी पर रॉकेट लॉन्चर से फायर किया।

  4. आमने-सामने की भीषण लड़ाई: इससे पहले कि स्तब्ध दुश्मन संभल पाता, Major Vivek Gupta ने दुश्मन की चौकी की ओर दौड़ लगा दी। इस दौरान, उन्हें दो गोलियाँ लगीं, लेकिन उन्होंने आगे बढ़ना जारी रखा। चौकी पर पहुँचकर, उन्होंने अपनी चोटों के बावजूद दुश्मन के साथ भयंकर आमने-सामने की लड़ाई की और तीन शत्रु सैनिकों को मार गिराया।

  5. चोटी पर कब्जा: अपने अधिकारी के वीरतापूर्ण कार्य से प्रेरणा लेकर, कंपनी के बाकी सैनिकों ने दुश्मन की चौकी पर हमला कर दिया और उस पर कब्जा कर लिया

सर्वोच्च बलिदान: हालांकि, इस भीषण मुकाबले के दौरान, मेजर विवेक गुप्ता को दुश्मन की एक और गोली लगी और वह अंततः अपनी चोटों के कारण शहीद हो गए। यह ठीक उसी दिन हुआ जब उन्होंने आठ साल पहले राजपूताना राइफल्स में कमीशन प्राप्त किया था।

Major Vivek Gupta MVC मेजर विवेक गुप्ता का यह असाधारण पराक्रम और प्रेरणादायक नेतृत्व ही टोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का मुख्य कारण बना।

महावीर चक्र से सम्मान

महावीर चक्र MVC
महावीर चक्र MVC

राष्ट्र के प्रति उनके सर्वोच्च बलिदान और विशिष्ट वीरता के लिए, उन्हें 15 अगस्त 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Major Vivek Gupta मेजर विवेक गुप्ता की कहानी भारतीय सेना के ‘सर्वप्रथम कर्तव्य’ की भावना का प्रतीक है और वह हमेशा देश की युवा पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

Major Vivek Gupta MVC
Major Vivek Gupta MVC

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शहीद मार्कंडेय मिश्र: एक वीर की गाथा और बिखरे परिवार का बलिदान https://shauryasaga.com/shaheed-markandey-mishra-ek-veer-ki-gatha-aur-bikhre-pariwar-ka-balidan/ https://shauryasaga.com/shaheed-markandey-mishra-ek-veer-ki-gatha-aur-bikhre-pariwar-ka-balidan/?noamp=mobile#respond Thu, 28 Aug 2025 08:14:44 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5409 मार्कंडेय मिश्र यह नाम कहीं गुमनाम हो गया ! क्यों कि हमने सब भुला दिया – आज आप पढ़िए एक ऐसे योद्धा की कहानी जिसे पढने के बाद आप चैन से सो नहीं पाएंगे क्यों कि यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं है ! यह है मेरे देश के वीर सैनिकों की कहानी –

गोरखपुर के चौरीचौरा के छोटे से गांव अवधपुर की गलियों में कभी एक बच्चे की हंसी गूंजती थी। वह बच्चा था मार्कंडेय मिश्र, जिसका नाम आज कारगिल की बर्फीली चोटियों पर अमर है। यह कहानी उस वीर सपूत की है, जिसने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया, और उस परिवार की, जो उसके जाने के बाद धीरे-धीरे अकेलेपन और मुफलिसी की आग में जलता चला गया।

एक साधारण शुरुआत, असाधारण सपने

अवधपुर गांव की मिट्टी में जन्मा मार्कंडेय मिश्र का बचपन गरीबी की साये में बीता। उसके पिता शिवपूजन मिश्र तरकुलहा देवी मंदिर में सत्यनारायण की कथा सुनाकर और पूजा-पाठ करके जैसे-तैसे घर चलाते थे। खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा था, जो मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता था। मां फूलमती देवी की गोद में पलते हुए मार्कंडेय और उसका छोटा भाई योगेंद्र बड़े हुए। लेकिन भाग्य ने योगेंद्र को कम उम्र में ही छीन लिया—महज 14 साल की उम्र में इंसेफेलाइटिस ने उसे हमेशा के लिए सुला दिया। अब मार्कंडेय ही परिवार की एकमात्र उम्मीद था।

मार्कंडेय का मन किताबों में रमता था। गांव के छोटे से स्कूल में वह घंटों पढ़ता, सपने देखता—न सिर्फ अपने परिवार को गरीबी से निकालने के, बल्कि देश के लिए कुछ बड़ा करने के। उसकी आंखों में एक जुनून था, जो उसे भारतीय सेना की वर्दी तक ले गया। जब वह सेना में भर्ती हुआ, तो मां-बाप के चेहरों पर मुस्कान लौट आई। लगा, अब सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किसे पता था कि यह मुस्कान जल्द ही आंसुओं में डूब जाएगी।

कारगिल की बर्फीली चोटियां और एक वीर का बलिदान

सन् 1999। कारगिल की ऊंची चोटियों पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारत की सीमाओं को चुनौती दी थी। मार्कंडेय, जो अब भारतीय सेना का एक जवान था, नियंत्रण रेखा पर तैनात था। बर्फीली हवाओं और गोलीबारी के बीच उसने वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, जो आज भी गोरखपुर के लोगों के सीने में गर्व जगाती है। दुश्मन से लोहा लेते हुए, आखिरी सांस तक लड़ते हुए, मार्कंडेय ने अपनी जान देश को समर्पित कर दी। वह शहीद हो गया।

उसकी शहादत की खबर जब अवधपुर पहुंची, तो गांव की गलियां सन्नाटे में डूब गईं। शिवपूजन और फूलमती का आंगन, जो कभी मार्कंडेय की हंसी से गूंजता था, अब सिर्फ मातम की आवाजों से भर गया। मार्कंडेय की पत्नी मंजू, जो अभी अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों के साथ नई जिंदगी की शुरुआत कर रही थी, अचानक विधवा हो गई। शहीद की बहन मीरा, जो ससुराल छोड़कर माता-पिता के पास रह रही थी, इस सदमे को बर्दाश्त न कर सकी।

बिखरता परिवार, ठंडा पड़ता चूल्हा

मार्कंडेय की शहादत के बाद सरकार ने कुछ वायदे किए। मंजू को सेना के अस्पताल में नौकरी मिली, और कुछ सरकारी सहायता के साथ वह अपनी बेटियों को लेकर मायके चली गई। लेकिन शिवपूजन और फूलमती के लिए ये वायदे खोखले साबित हुए। गांव में अकेले रह गए इस बुजुर्ग दंपति के पास न तो कोई सहारा था, न ही कोई उम्मीद। 2006 में शिवपूजन का निधन हो गया। दो साल बाद, 2008 में, फूलमती भी दुनिया छोड़ गई।

मीरा, जो पहले ही मानसिक रूप से अस्थिर हो चुकी थी, गांव की गलियों में भटकती रहती थी। उसकी तबीयत बिगड़ी, और जब उसे इलाज के लिए वाराणसी ले जाया गया, तो वह भी चल बसी। मार्कंडेय का घर, जो कभी प्यार और हंसी से भरा था, अब पूरी तरह वीरान हो चुका था। चूल्हा ठंडा पड़ गया, और आंगन में सिर्फ सन्नाटा बचा।

शहीद की विरासत और हमारी जिम्मेदारी

आज, कारगिल विजय दिवस पर जब हम शहीदों को याद करते हैं, तो मार्कंडेय मिश्र की कहानी हमें सिर्फ उनकी वीरता ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के बलिदान की भी याद दिलाती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि देश की रक्षा के लिए दी गई कुर्बानी सिर्फ एक जवान की नहीं होती—उसका पूरा परिवार उस आग में जलता है।

गोरखपुर के लोग आज भी मार्कंडेय को अपने दिल में बसाए हुए हैं। उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता और सम्मान की कीमत कितनी बड़ी होती है। लेकिन क्या हमारा गर्व सिर्फ 26 जुलाई तक सीमित रहना चाहिए? क्या हमारा दायित्व सिर्फ शहीदों को याद करने तक है? मार्कंडेय जैसे वीरों की शहादत का सम्मान तभी सच्चा होगा, जब हम उनके परिवारों की सुध लेंगे, उनके बच्चों के सपनों को सहारा देंगे, और यह सुनिश्चित करेंगे कि उनका बलिदान व्यर्थ न जाए।

यह कहानी सिर्फ मार्कंडेय की नहीं, बल्कि उन तमाम शहीदों की है, जिन्होंने देश के लिए सब कुछ दे दिया। आइए, इस कारगिल विजय दिवस पर हम संकल्प लें कि हम न केवल उनकी वीरता को सलाम करेंगे, बल्कि उनके परिवारों को भी अपनेपन का एहसास दिलाएंगे। क्योंकि एक शहीद का घर कभी सूना नहीं होना चाहिए।

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कारगिल का वो शेर: नायक दीपचंद – गोला-बारूद की भूख और देश की रक्षा का जुनून https://shauryasaga.com/karagil-ka-wo-sher-nayak-deepchand-fauji/ https://shauryasaga.com/karagil-ka-wo-sher-nayak-deepchand-fauji/?noamp=mobile#respond Mon, 03 Mar 2025 13:05:19 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5344

हरियाणा की मिट्टी में जन्मा एक ऐसा योद्धा, जिसने 1999 के कारगिल युद्ध में अपने दोनों पैर और एक हाथ खो दिए, लेकिन हौसला? वो आज भी आसमान छूता है। हिसार के पाबड़ा गांव के नायक दीपचंद की शौर्यगाथा ऐसी है कि इसे सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और सीना गर्व से चौड़ा। कारगिल विजय दिवस के मौके पर जब देश अपने शहीदों को याद करता है, तब दीपचंद जैसे जिंदा जांबाजों की कहानी हमें बताती है कि वीरता सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हमारे बीच सांस लेती है।

जंग का मैदान और दीपचंद का जज्बा

1999 की सर्दियां, कारगिल की बर्फीली चोटियां, और दुश्मन की गोलियां। भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़ी उस जंग में दीपचंद मिसाइल रेजिमेंट के एक गनर थे। वो बताते हैं, “जब हमें युद्ध के लिए मूव करने का ऑर्डर मिला, हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। पहला गोला मेरी गन चार्ली-2 से निकला और वो सीधे निशाने पर लगा।” उस एक पल में शुरू हुई उनकी बटालियन की वो कहानी, जिसमें 10 हजार राउंड फायर किए गए और 8 बार गन पोजीशन बदली गई। कंधों पर तोप उठाकर चलते थे ये जांबाज, ठंड में कपड़ों की परवाह नहीं, बस एक ही मकसद – दुश्मन को उसकी औकात दिखाना।

दीपचंद की आवाज में आज भी वही जोश झलकता है जब वो कहते हैं, “हम सप्लाई वालों से कहते थे – खाना मिले न मिले, गोला-बारूद ज्यादा चाहिए। दुश्मन ने हमारी जमीन पर कब्जा किया था, उसे खदेड़ना था।” उनकी बटालियन को 12 गैलेंट्री अवॉर्ड्स मिले और कारगिल की जीत का तमगा उनके सीने पर चमकता है।

वो हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया

लेकिन जंग का मैदान सिर्फ जीत की कहानियां नहीं लिखता, वो बलिदान भी मांगता है। ऑपरेशन पराक्रम के दौरान जब दीपचंद और उनके साथी वापसी की तैयारी कर रहे थे, तभी एक तोप का गोला फट गया। वो पल दीपचंद की जिंदगी का सबसे काला पल बन गया। धमाके में उनके दोनों पैर और एक हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए। दो और सैनिक भी घायल हुए। खून इतना बहा कि डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के लिए 17 बोतल खून चढ़ाया। जिंदा रखने की जद्दोजहद में उनकी दोनों टांगें घुटनों तक और एक हाथ काटना पड़ा।

कोई और होता तो शायद टूट जाता, लेकिन दीपचंद हरियाणा के उस मिट्टी से बने थे, जो हार नहीं मानती। आज उनके घुटनों तक नकली पैर हैं, फिर भी वो फौजी सलामी देते हैं – दाहिने बाजू से, सीना तानकर।

“हम सामने नहीं लड़े, पर सपोर्ट से दुश्मन हारा”

दीपचंद कहते हैं, “मैं दुश्मन के आमने-सामने तो कभी नहीं हुआ, लेकिन हमारी आर्टिलरी फायरिंग ने इन्फेंट्री को आगे बढ़ने की ताकत दी।” युद्ध में आर्टिलरी सपोर्ट की अहमियत को वो बखूबी समझते हैं। उनकी गन की गूंज ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे।

आज भी जिंदा है वो फौजी

1989 में सेना में भर्ती हुए दीपचंद कश्मीर के कई जोखिम भरे ऑपरेशन्स का हिस्सा रहे। कारगिल के बाद भी वो सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, अपनी कहानियां सुनाते हैं। जो भी उनसे मिलता है, उनकी जंग की दास्तां सुने बिना रह नहीं पाता। कारगिल विजय दिवस पर उन्हें देशभर में सम्मानित किया जाता है, लेकिन उनकी असली पहचान वो भावुक आंखें हैं, जो जंग के दिनों को याद करते हुए चमक उठती हैं।

शौर्य का सबक

नायक दीपचंद की कहानी सिर्फ एक सैनिक की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो कहता है – शरीर टूट सकता है, पर हौसला नहीं। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर लिखी उनकी गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है कि देश के लिए कुछ भी कुर्बान करने का मतलब क्या होता है। वो कहते हैं, “हमें जीत का सौभाग्य मिला, और यही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मेडल है।”

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सूबेदार गिरधारी लाल https://shauryasaga.com/subedar-girdhari-lal/ https://shauryasaga.com/subedar-girdhari-lal/?noamp=mobile#respond Sun, 25 Aug 2024 07:14:41 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5217 Subedar Girdhari Lal
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सूबेदार गिरधारी लाल
JC220743
वीरांगना – श्रीमती प्रकाशो देवी
यूनिट -12 जाट रेजिमेंट
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
सूबेदार गिरधारी लाल जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के रख कंगवाला गांव के निवासी थे और भारतीय सेना की 12 जाट बटालियन में सेवारत थे।
“कारगिल युद्ध” में सूबेदार गिरधारी लाल थंग वाक्सा पोस्ट पर तैनात थे। यद्यपि 26 जुलाई 1999 को आधिकारिक रूप से कारगिल युद्ध का संघर्ष विराम हो गया था, किंतु नियंत्रण रेखा पर छिटपुट झड़पें और फायरिंग होती रहती थी।
 
25 अगस्त 1999 को शत्रु की ऐसी ही एक उकसावे की कार्रवाई में अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय एवं वीरता से अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए गोली लगने से सूबेदार गिरधारी लाल वीरगति को प्राप्त हुए थे।
Subedar Girdhari Lal सूबेदार गिरधारी लाल 
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कारगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 सैपर सतीश कुमार वाल्मीकि https://shauryasaga.com/kargil-26-july-1999-sapper-satish-kumar-valmiki/ https://shauryasaga.com/kargil-26-july-1999-sapper-satish-kumar-valmiki/?noamp=mobile#respond Fri, 26 Jul 2024 10:19:17 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5109
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सैपर सतीश कुमार वाल्मीकि
1487884
सेना मेडल (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती विमलेश देवी
यूनिट – 236 इंजिनियर रेजिमेंट
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
सैपर सतीश कुमार उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतौली तहसील के फुलत गांव के निवासी थे और भारतीय सेना के कॉर्प्स ऑफ इंजिनियर्स की 236 इंजिनियर रेजिमेंट में सेवारत थे।
वर्ष 1999 में वह जम्मू-कश्मीर में तैनात थे। कारगिल युद्ध आरंभ हुआ, तो उनकी बटालियन को कारगिल पहुंचने के आदेश प्राप्त हुए। कारगिल कूच करने से पांच दिन पूर्व उन्होंने घर पर फोन किया था।
“ऑपरेशन विजय” में उनकी रेजिमेंट ने अदम्य साहस एवं दृढ़ निश्चय से उन्हें दिया गया कार्य पूर्ण किया। 26 जुलाई 1999 को अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए शत्रु तोप का गोला गिरने से वह वीरगति को प्राप्त हुए थे।
सैपर सतीश कुमार को उनकी कर्तव्यनिष्ठा एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत “सेना मेडल” से सम्मानित किया गया।
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कारगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 नायब सूबेदार राजबीर सिंह, लांस नायक विजय कुमार शुक्ला https://shauryasaga.com/kargil-26-july-1999-nb-rajbir-singh-ln-vijay-kumar/ https://shauryasaga.com/kargil-26-july-1999-nb-rajbir-singh-ln-vijay-kumar/?noamp=mobile#respond Fri, 26 Jul 2024 10:03:56 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5106
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
नायब सूबेदार राजबीर सिंह
JC488573X
वीरांगना – श्रीमती रामवती देवी
लांस नायक विजय कुमार शुक्ला
3180136M
वीरांगना – श्रीमती गुड़िया देवी
यूनिट – 12 जाट रेजिमेंट
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
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नायब सूबेदार राजबीर सिंह उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील के राजगांव के निवासी थे। वह भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट की 12 बटालियन में सेवारत थे। अपनी बटालियन में सेवाएं प्रदान करते हुए वह नायब सूबेदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
“कारगिल युद्ध” आरंभ होने से पूर्व वह पुत्र के विवाह के लिए घर आए थे। दुर्गम और कठिन स्थान पर तैनाती के संबंध में सुनकर पत्नी ने कहा कि “अब सैन्य सेवा छोड़कर गांव में खेतीबाड़ी देखिए…” तो उन्होंने कहा “जा दिन याद करिंगे भगवान, काल कुठरियनु में हूं न छोड़ेगो। क्यों न देश के लिए बलिदान हो कर अमर हो जाऊं…” इससे लगता है की उन्हें युद्धभूमि में अपनी वीरगति का पूर्वाभास हो गया था।
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लांस नायक विजय कुमार शुक्ला का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील के पीथीपुर गांव में श्री केदारनाथ शुक्ला एवं श्रीमती बिट्टन देवी के परिवार में हुआ था। वह भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट की 12 बटालियन में सेवारत थे। अपनी बटालियन में सेवाएं प्रदान करते हुए वह लांस नायक के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
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कारगिल युद्ध में नायब सूबेदार सूबेदार राजबीर सिंह और लांस नायक विजय कुमार अपनी बटालियन के साथ युद्धक्षेत्र में तैनात थे। “ऑपरेशन विजय” में 26 जुलाई 1999 को वे द्रास सेक्टर में हजारों फीट ऊंची, हिमाच्छादित, उबड़खाबड़ व कठिन चढ़ाई की पहाड़ियों पर तोपों व स्वचालित शस्त्रों से सुसज्जित, सुदृढ़, बंकरों में स्थिति लिए हुए शत्रुओं से घोर विपरीत परिस्थितियों में, अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय एवं वीरता से संघर्ष कर रहे थे।
इस युद्ध में, लांस नायक विजय कुमार शत्रु की फायरिंग से घायल होकर गिर गए। सौहार्द की असाधारण भावना का परिचय देते हुए और अपने जीवन की घोर उपेक्षा करते हुए नायब सूबेदार राजबीर सिंह तत्क्षण आड़ से निकल कर उनके रक्षण के लिए दौड़ पड़े। उसी समय उन्हें शत्रु की अनेक गोलियां लगी और वे दोनों ही वीरगति को प्राप्त हो गए।
नायब सूबेदार राजबीर सिंह और लांस नायक विजय कुमार की स्मृति में गांव में स्मारक निर्मित किए गए है, जहां उनकी प्रतिमाएं स्थापित है।
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कारगिल युद्ध ऑपरेशन विजय 25 जुलाई 1999 https://shauryasaga.com/kargil-opperation-vijay-25-july-1999/ https://shauryasaga.com/kargil-opperation-vijay-25-july-1999/?noamp=mobile#respond Thu, 25 Jul 2024 10:42:52 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5102
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
हवलदार मदन सिंह नेगी
4058687Y
वीरांगना – श्रीमती जीना देवी
नायक सुरेंद्र सिंह
3387077X
वीरांगना – श्रीमती दमयंती देवी
लांस नायक रामप्रसाद ध्यानी
3391489W
17-07-1971 – 25-07-1999
वीरांगना – श्रीमती जयंती देवी
राइफलमैन दलवीर सिंह राणा
4080306M
03-02-1981 – 25-07- 1999
सेना मेडल (मरणोपरांत)
यूनिट – 17 गढ़वाल राइफल्स
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
हवलदार मदन सिंह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की लैंसडाउन तहसील के शिवराजपुर गांव के निवासी थे। वह भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की 17 बटालियन में सेवारत थे।
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नायक सुरेंद्र सिंह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की लैंसडाउन तहसील के सिलगांव गांव के निवासी थे। वह भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की 17 बटालियन में सेवारत थे।
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लांस नायक राम प्रसाद का जन्म 17 जुलाई 1971 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की धुमाकोट तहसील के नैनीडांडा ब्लॉक के डांडा तौली गांव में श्री सकलानंद ध्यानी एवं श्रीमती सिंदोरी देवी के परिवार में हुआ था। 18 जुलाई 1989 को वह भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट मेंं रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 17 गढ़वाल बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था। अपनी बटालियन में विभिन्न स्थानों और परिचालन परिस्थितियों में सेवाएं देते हुए वह लांस नायक के पद पर पदोन्नत हो चुके थे।
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राइफलमैन दलवीर सिंह का जन्म 3 फरवरी 1981 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखंड) के टिहरी गढ़वाल जिले के ठेला पट्टी नेलचामी गांव में श्री गोपाल सिंह राणा एवं श्रीमती विजया देवी के परिवार में हुआ था। माध्यमिक तक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए टिहरी के एक कॉलेज में प्रवेश के लिए आवेदन किया था। उसी समय, वहां भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की भर्ती आयोजित होने से वह भर्ती हो गए। प्रारंभिक प्रशिक्षण के उपरांत उन्हें 17 गढ़वाल बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था।
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कारगिल युद्ध में हवलदार मदन सिंह, नायक सुरेंद्र सिंह, लांस नायक राम प्रसाद और राइफलमैन दलवीर सिंह अपनी बटालियन के साथ युद्धक्षेत्र में तैनात थे। “ऑपरेशन विजय” में, हजारों फीट ऊंची हिमाच्छादित, चोटियों पर, तोपों व स्वचालित शस्त्रों से सुसज्जित, सुदृढ़, बंकरों में, स्थिति लिए हुए शत्रु से अति विषम परिस्थितियों में, अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय एवं वीरता से युद्ध करते हुए 25 जुलाई 1999 को हवलदार मदन सिंह, नायक सुरेंद्र सिंह, लांस नायक राम प्रसाद और राइफलमैन दलवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे।
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कारगिल युद्ध 25 जुलाई 1999 पॉइंट 5363 का संग्राम https://shauryasaga.com/kargil-25-july-1999/ https://shauryasaga.com/kargil-25-july-1999/?noamp=mobile#respond Thu, 25 Jul 2024 08:37:07 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5097
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
लांस नायक अमर बहादुर सिंह
2682610A
06-08-1969 – 25-07-1999
वीरांगना – श्रीमती मिथिलेश देवी
ग्रेनेडियर गनपत सिंह ढाका
2685959
वीरांगना – श्रीमती मंजू देवी
ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह डढवाल
2690357Y
15-01-1977 – 25-07-1999
ग्रेनेडियर योगिंदर सिंह
2690281K
14-02-1976 – 25-07-1999
यूनिट – 16 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट
पॉइंट 5363 का संग्राम
ऑपरेशन विजय
कारगिल युद्ध 1999
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लांस नायक अमर बहादुर सिंह का जन्म 6 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की बीघापुर तहसील के बजौरा गांव में, श्री मनमोहन सिंह एवं श्रीमती रामप्यारी देवी के घर में हुआ था। इनके घर की आर्थिक स्थिति क्षीण थी व खेती की भूमि भी अधिक नहीं थी। अमर बहादुर सिंह गांव में हल चलाने के साथ मल्लयुद्ध भी करते थे। 1 मार्च 1988 को वह भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन में ग्रेनेडियर के पद पर नियुक्त किया गया था।
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ग्रेनेडियर गनपत सिंह ढाका का जन्म राजस्थान के सीकर जिले के सिहोट छोटी गांव में, पूर्व सैनिक श्री रतन लाल ढाका एवं श्रीमती देबू देवी के परिवार में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात 30 जुलाई 1993 को वह भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन में ग्रेनेडियर के पद पर नियुक्त किया गया था।
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ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह का जन्म 15 जनवरी 1977 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के लॉअर सुन्हेत के चुधरेहड़ गांव में श्री हुकमसिंह डढवाल एवं श्रीमती ईश्वरी देवी के परिवार में हुआ था। 28 अक्टूबर 1996 को जबलपुर से वह भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रारंभिक प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन में ग्रेनेडियर के पद पर नियुक्त किया गया था। प्रशिक्षण पूरा होने के 9 माह पश्चात ही उन्हें कारगिल के द्रास सेक्टर में तैनात किया गया था।
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ग्रेनेडियर योगिंदर सिंह का जन्म 14 फरवरी 1976 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की ज्वालामुखी तहसील के अंब गांव में हुआ था। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वह भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन में ग्रेनेडियर के पद पर नियुक्त किया गया था।
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कारगिल युद्ध के समय लांस नायक अमर बहादुर सिंह, ग्रेनेडियर गनपत सिंह, ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह व ग्रेनेडियर योगिंदर सिंह अपनी बटालियन के साथ युद्धक्षेत्र में तैनात थे।
“ऑपरेशन विजय” में 24 जुलाई 1999 को, 16 ग्रेनेडियर्स बटालियन को नियंत्रण रेखा के निकट पॉइंट 5363 पर अधिकार करने का कार्य सौंपा गया था। लांस नायक अमर बहादुर सिंह, ग्रेनेडियर गनपत सिंह, ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह व ग्रेनेडियर योगिंदर सिंह भी इस आक्रमण में भाग ले रहे थे।
चढ़ाई आरंभ करते ही शत्रु पोस्ट छोड़कर भाग गए। 25 जुलाई 1999 की प्रातः लगभग 250 की संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों और कमांडो ने प्रचंड पलटवार किया। उस भीषण संघर्ष में, अदम्य साहस, दृढ़ निश्चय एवं वीरता से युद्ध करते हुए लांस नायक अमर बहादुर सिंह, ग्रेनेडियर गनपत सिंह, ग्रेनेडियर सुरजीत सिंह व ग्रेनेडियर योगिंदर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे।
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लांस नायक अमर बहादुर सिंह के चार पुत्रियां थी व उनके परिवार में, पांचवीं संतान का आगमन होने को था। वीरगति से कुछ दिन पूर्व उन्होंने घर पर फोन कर कहा कि अब युद्ध समाप्ति की ओर है। आने वाली संतान का जन्म समारोह मिलकर मनाएंगे। उनकी वीरगति के 15 दिन पश्चात उनके पुत्र का जन्म हुआ था। वह अपने पुत्र का मुंह नहीं देख पाए थे।
कारगिल युद्ध में ही आर्टिलरी रेजिमेंट में, तैनात उनके छोटे भाई रामचंद्र सिंह उनका पार्थिव शरीर लेकर गांव पहुंचे थे। गांव में इनका स्मारक बना हुआ है‌। वीरांगना को भारत सरकार द्वारा गैस एजेंसी आवंटित की गई। जिसे उनके पुत्र अजय सिंह संचालित करते हैं।
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