Ashok Chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Fri, 29 Aug 2025 07:04:50 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Ashok Chakra – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 मेजर मोहित शर्मा: एक वीर सैनिक की प्रेरणादायक जीवनी https://shauryasaga.com/major-mohit-sharma-ek-veer-sainik/ https://shauryasaga.com/major-mohit-sharma-ek-veer-sainik/?noamp=mobile#respond Fri, 29 Aug 2025 07:04:50 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5424 मेजर मोहित शर्मा, जिन्हें भारत के सर्वोच्च शांति-कालीन सैन्य सम्मान अशोक चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया, भारतीय सेना के उन वीर सपूतों में से एक हैं, जिनकी शहादत और साहस की कहानी हर भारतीय को गर्व से भर देती है। 1 पैरा (स्पेशल फोर्सेस) के इस नायक ने अपनी वीरता, रणनीतिक कुशलता और देश के प्रति अटूट समर्पण से इतिहास के पन्नों में अमर स्थान बनाया। यह लेख उनके जीवन, सैन्य करियर और बलिदान की विस्तृत कहानी प्रस्तुत करता है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मेजर मोहित शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक जिले में हुआ था। उनके पिता श्री राजेंद्र प्रसाद शर्मा और माता श्रीमती सुशीला शर्मा के दूसरे पुत्र थे। परिवार में उन्हें प्यार से ‘चिंटू’ कहा जाता था, जबकि उनके सहपाठी और सहकर्मी उन्हें ‘माइक’ के नाम से बुलाते थे। मोहित एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे गिटार, माउथ ऑर्गन और सिंथेसाइज़र जैसे वाद्ययंत्रों को बखूबी बजा लेते थे। हेमंत कुमार के गीतों को उनकी मधुर आवाज में सुनना सभी को मंत्रमुग्ध कर देता था।

मोहित ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के मानव स्थली स्कूल से शुरू की, फिर एक वर्ष के लिए सहारनपुर के होली एंजल्स स्कूल में पढ़े। इसके बाद, 1988 में उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल, गाजियाबाद में दाखिला लिया और 1995 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। स्कूल के दौरान, वे पढ़ाई के साथ-साथ खेल और अन्य गतिविधियों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करते थे। उनकी नेतृत्व क्षमता और अनुशासन ने उन्हें एक आदर्श छात्र बनाया।

मोहित ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन उनका सपना देश की सेवा करना था। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़ दी और 1995 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), पुणे में प्रवेश लिया। एनडीए में उन्होंने तैराकी, मुक्केबाजी और घुड़सवारी जैसे खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वे मुक्केबाजी में फेदरवेट श्रेणी के विजेता बने और घुड़सवारी में चैंपियन रहे, जहाँ उनकी पसंदीदा घोड़ी ‘इंदिरा’ थी।

सैन्य करियर की शुरुआत

1998 में, मोहित ने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में प्रवेश लिया। यहाँ उनकी उत्कृष्टता के कारण उन्हें बटालियन कैडेट एडजुटेंट का पद दिया गया। इस दौरान, उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन से राष्ट्रीय भवन में मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। दिसंबर 1999 में, उन्हें लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ और उनकी पहली तैनाती 5वीं बटालियन, मद्रास रेजिमेंट (5 मद्रास), हैदराबाद में हुई।

तीन वर्षों की सफल सेवा के बाद, मोहित ने अपनी सैन्य यात्रा को और चुनौतीपूर्ण बनाने का निर्णय लिया। दिसंबर 2002 में, उन्होंने पैरा (स्पेशल फोर्सेस) में शामिल होने का फैसला किया और जून 2003 में कठिन प्रशिक्षण पूरा कर पैरा कमांडो बन गए। इस दौरान, उन्होंने 38 राष्ट्रीय राइफल्स में भी सेवा दी, जहाँ उनकी वीरता और नेतृत्व के लिए उन्हें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया।

वीरता के सुनहरे पल

ऑपरेशन सर्प विनाश (2003)

मोहित शर्मा का सबसे चर्चित योगदान 2003 में ऑपरेशन सर्प विनाश के दौरान रहा, जो जम्मू और कश्मीर के पुंछ जिले के हिल काका क्षेत्र में आयोजित किया गया था। इस ऑपरेशन का उद्देश्य घने जंगलों में छिपे आतंकवादियों को खत्म करना था। मोहित ने अपनी रणनीतिक बुद्धिमता का परिचय देते हुए एक आतंकवादी के रूप में घुसपैठ की। उन्होंने अपनी पहचान ‘इफ्तिखार भट्ट’ के रूप में बनाई, लंबी दाढ़ी और बाल रखकर स्थानीय आतंकवादी समूह हिजबुल मुजाहिदीन में घुसपैठ की।

मोहित ने आतंकवादियों को यह विश्वास दिलाया कि वह भारतीय सेना पर हमला करना चाहता है, क्योंकि उसका भाई कथित तौर पर सेना द्वारा मारा गया था। इस छलावे के तहत, उन्होंने आतंकवादी शिविर में प्रवेश किया और महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की। एक सुनियोजित रणनीति के तहत, उन्होंने आतंकवादियों को निशाना बनाया और मौके पर ही दो आतंकवादियों को मार गिराया। इस साहसी मिशन के लिए उन्हें 2005 में सेना मेडल (Gallantry) से सम्मानित किया गया।

प्रशिक्षक के रूप में योगदान

दिसंबर 2005 में, मोहित को मेजर के पद पर पदोन्नति मिली। इसके बाद, उन्हें बेलगाम में पैरा कमांडो प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। दो वर्षों तक, उन्होंने भावी कमांडो को प्रशिक्षित किया, उनकी नेतृत्व क्षमता और अनुशासन को निखारा। उनकी शिक्षण शैली और प्रेरक व्यक्तित्व ने कई युवा सैनिकों को देश सेवा के लिए प्रेरित किया।

अंतिम बलिदान: कुपवाड़ा ऑपरेशन (2009)

2008 में, मेजर मोहित शर्मा को फिर से कश्मीर में तैनात किया गया। 21 मार्च 2009 को, जम्मू और कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हफरूदा जंगल में आतंकवादियों की घुसपैठ की सूचना मिली। मेजर मोहित अपनी ब्रावो असॉल्ट टीम के साथ इस खतरनाक मिशन का नेतृत्व कर रहे थे।

ऑपरेशन के दौरान, उनकी टीम पर तीन दिशाओं से आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू कर दी। इस हमले में चार कमांडो तुरंत घायल हो गए। मोहित ने अपनी जान की परवाह न करते हुए, गोलियों की बौछार के बीच रेंगकर दो घायल सैनिकों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। इसके बाद, उन्होंने ग्रेनेड फेंककर दो आतंकवादियों को मार गिराया।

आतंकवादियों को भागने से रोकने के लिए, गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने नजदीकी युद्ध में दो और आतंकवादियों को मार गिराया। इस दौरान, उनके सीने में कई गोलियाँ लगीं, और उन्होंने 31 वर्ष की आयु में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनके इस अदम्य साहस और बलिदान ने मिशन को सफल बनाया और उनके साथियों की जान बचाई।

सम्मान और विरासत

मेजर मोहित शर्मा के इस सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें 26 जनवरी 2010 को अशोक चक्र से मरणोपरांत सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी पत्नी, मेजर रिशिमा शर्मा (जो अब कर्नल रिशिमा सरीन शर्मा हैं) ने भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल से प्राप्त किया। अशोक चक्र का आधिकारिक उल्लेख इस प्रकार है:

 

“मेजर मोहित शर्मा, सेना मेडल, ने कुपवाड़ा जिले में ब्रावो असॉल्ट टीम का नेतृत्व किया। एक वीर योद्धा के रूप में, उन्होंने जंगल युद्ध में आतंकवादियों से लड़ने की कला में महारत हासिल की थी। 21 मार्च 2009 को, हफरूदा जंगल में घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों की सूचना पर, उन्होंने सावधानीपूर्वक योजना बनाई और अपनी टीम का नेतृत्व किया। भारी गोलीबारी के बीच, उन्होंने अपने साथियों को बचाया और चार आतंकवादियों को मार गिराया, लेकिन इस प्रक्रिया में गंभीर रूप से घायल हो गए।”

2019 में, दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन ने उनके सम्मान में राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर मेजर मोहित शर्मा राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन कर दिया। इसके अतिरिक्त, गाजियाबाद में उनकी प्रतिमा का अनावरण रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह द्वारा किया गया। उनकी वीरता को एएएन कॉमिक्स द्वारा एक ग्राफिक उपन्यास में भी चित्रित किया गया है।

निजी जीवन

मेजर मोहित शर्मा की शादी 2006 में मेजर रिशिमा शर्मा से हुई थी, जो स्वयं एक सैन्य अधिकारी हैं और उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। उनके परिवार में उनके पिता श्री राजेंद्र प्रसाद शर्मा, माता श्रीमती सुशीला शर्मा और बड़े भाई श्री मधुर शर्मा शामिल हैं। उनकी शहादत ने उनके परिवार को गहरा आघात पहुँचाया, लेकिन उनकी वीरता उनकी स्मृति को जीवंत रखती है।

प्रेरणा और प्रभाव

मेजर मोहित शर्मा की कहानी केवल एक सैनिक की वीरता की कहानी नहीं है, बल्कि यह देशभक्ति, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। उनकी गुप्त मिशन में आतंकवादी समूहों में घुसपैठ करने की रणनीति और अंतिम ऑपरेशन में उनकी निस्वार्थता भारतीय सेना के उच्च मानकों को दर्शाती है। स्कूलों, सैन्य संस्थानों और सामाजिक मंचों पर उनकी कहानी युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करती है।

24 जनवरी 2021 को, इंडियन आइडल के एक विशेष एपिसोड में भारतीय सशस्त्र बलों को समर्पित करते हुए मेजर मोहित शर्मा को याद किया गया। उनके भाई मधुर शर्मा इस शो में अतिथि के रूप में शामिल हुए।

निष्कर्ष

मेजर मोहित शर्मा का जीवन और बलिदान हमें यह सिखाता है कि सच्चा साहस वह है, जो अपने से ऊपर देश और साथियों को रखता है। उनकी कहानी हर भारतीय के लिए एक प्रेरणा है, जो हमें याद दिलाती है कि हमारी स्वतंत्रता और सुरक्षा के पीछे अनगिनत सैनिकों का बलिदान है। बलिदान दिवस के अवसर पर, हम मेजर मोहित शर्मा को नमन करते हैं और उनके परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना और सम्मान व्यक्त करते हैं।

जय हिंद!

स्रोत: विकिपीडिया, हॉनरपॉइंट, स्टार्सअनफोल्डेड, द ट्रिब्यून इंडिया

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कैप्टन राधाकृष्णन हर्षन नायर “लोलाब का शेर” अशोक चक्र (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/captain-radhakrishnan-harshan-nair-lion-of-lolab/ https://shauryasaga.com/captain-radhakrishnan-harshan-nair-lion-of-lolab/?noamp=mobile#respond Thu, 20 Mar 2025 09:22:36 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5380 बलिदान दिवस – शौर्य नमन

कैप्टन राधाकृष्णन हर्षन नायर “लोलाब का शेर”

जन्म: 15 अप्रैल 1980
वीरगति: 20 मार्च 2007
सम्मान: अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट: 2 पैराशूट रेजिमेंट (रेड डेविल)
मिशन: आतंकवाद विरोधी अभियान

कैप्टन राधाकृष्णन हर्षन नायर का जन्म त्रिवेंद्रम, केरल के मन्नकड़ क्षेत्र में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर साहस और देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी। सैनिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्होंने सर्वश्रेष्ठ कैडेट का सम्मान हासिल किया और खेलों में भी हमेशा अव्वल रहे। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, वे 2002 में भारतीय सेना की 2 पैरा बटालियन में लेफ्टिनेंट बने।

कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में तैनाती के दौरान, कैप्टन हर्षन ने आतंकवाद के खिलाफ कई अभियानों में हिस्सा लिया। 7 मार्च 2007 को उन्होंने अकेले ही दो आतंकवादियों को ढेर किया। इसके बाद, 20 मार्च 2007 को लोलाब घाटी में एक भीषण मुठभेड़ में चार आतंकवादियों से भिड़ गए। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने दो आतंकियों को मार गिराया और तीसरे को हथगोले से घायल किया। इस मुठभेड़ में वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनके बलिदान ने राष्ट्र की सुरक्षा को सुनिश्चित किया।

उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। आज, बलिदान दिवस पर हम “लोलाब के शेर” को नमन करते हैं।
#जय_हिंद #शौर्य_नमन


Sacrifice Day – A Salute to Valor

Captain Radhakrishnan Harshan Nair “Lion of Lolab”

Born: April 15, 1980
Martyrdom: March 20, 2007
Honor: Ashok Chakra (Posthumous)
Unit: 2 Parachute Regiment (Red Devil)
Mission: Counter-Terrorism Operations

Captain Radhakrishnan Harshan Nair was born in Mannakad, Trivandrum, Kerala, to Shri Radhakrishnan Nair and Smt. G.C. Chitrambika. From a young age, he displayed remarkable courage and patriotism. During his time at Sainik School, Kazhakootam, he earned the title of Best Cadet and excelled in sports. After secretly appearing for the NDA entrance exam and succeeding, he completed his training at the National Defence Academy (NDA) and Indian Military Academy (IMA).

Commissioned as a Lieutenant in the 2 Para Battalion in 2002, he underwent training in Kashmir and even traveled to Israel for specialized weapons training. In 2006, his battalion was deployed to Kupwara, Kashmir, an area plagued by terrorism. On March 7, 2007, he single-handedly eliminated two terrorists during a patrol. Later, on March 20, 2007, in a fierce encounter in Lolab Valley, he faced four terrorists. Despite being gravely injured, he killed two and wounded a third with a grenade before attaining martyrdom.

For his extraordinary bravery and ultimate sacrifice, Captain Harshan was posthumously awarded the Ashok Chakra. On this Sacrifice Day, we salute the “Lion of Lolab” for his unwavering dedication to the nation.
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अशोक चक्र कर्नल जोजन थॉमस https://shauryasaga.com/ashok-chakra-colonel-jojan-thomas-2/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-colonel-jojan-thomas-2/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Aug 2024 13:36:51 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5199
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
कर्नल जोजन थॉमस
22-05-1965 – 22-08-2008
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती बीना थॉमस
यूनिट – 45 राष्ट्रीय राइफल्स/11 जाट रेजिमेंट
आतंकवाद विरोधी अभियान
कर्नल जोजन थॉमस का जन्म 22 मई 1965 को केरल के तिरुवल्ला जिले के कुट्टूर गांव में कैप्टन श्री पी.ए. थॉमस एवं श्रीमती एलेयम्मा थॉमस के परिवार में हुआ था। मार्च 1986 में अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (OTA) चेन्नई से पासिंग आउट के पश्चात उन्हें भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट की 11 बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था।
उन्होंने 6 वर्ष तक आर्मी एविएशन कॉर्प्स के साथ कार्य किया था। वह एक प्रशिक्षित पायलट भी थे। वर्ष 2008 में उन्हें प्रतिनियुक्ति पर जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद विरोधी अभियानों में 45 राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन का कमांडिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया था।
22 अगस्त 2008 की रात्रि 3:30 बजे, गोपनीय सूत्रों से उन्हें कुपवाड़ा जिले के माछल के जंगलों में आतंकवादियों की उपस्थिति से संबंधित विश्वसनीय सूचना प्राप्त हुई। कर्नल थॉमस ने आतंकवादियों को निष्क्रिय करने के लिए त्वरित ऑपरेशन चलाया और अपने उपलब्ध सैनिकों के साथ उस स्थान की ओर दौड़े पड़े और आतंकवादियों को घेर लिया। परिणामस्वरूप वहां भीषण मुठभेड़ आरंभ हो गई। कर्नल थॉमस ने अति निकट से दो आतंकवादियों को मार दिया।
इस भयानक प्रक्रिया में, गोलियां लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। तो भी उन्होने तृतीय आतंकवादी को आमने-सामने की मुठभेड़ में व्यस्त रखा और अंतत: उसे भी मार दिया। इस मुठभेड़ में उनके नेतृत्व में छ: दुर्दांत आतंकवादी मारे गए, किंतु अत्यधिक रक्तस्राव होने से कर्नल जोजन थॉमस वीरगति को प्राप्त हो गए।
कर्नल जोजन थॉमस को उनके उत्कृष्ट साहस, अडिग नेतृत्व, वीरता एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत शांतिकाल का सर्वोच्च वीरता सम्मान “अशोक चक्र” दिया गया।
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अशोक चक्र कैप्टन एरिक जेम्स टकर https://shauryasaga.com/ashok-chakra-captain-arik-jams-takar/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-captain-arik-jams-takar/?noamp=mobile#respond Fri, 02 Aug 2024 08:21:57 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5162
—— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
कैप्टन एरिक जेम्स टकर
IC5034
21-10-1927 – 02-08-1957
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 2 मराठा लाइट इंफेट्री
आतंकवाद विरोधी अभियान
कैप्टन एरिक जेम्स टकर का जन्म 21 अक्टूबर 1927 को श्री वीरा विजया सुकेव के परिवार में हुआ था। 13 जुलाई 1947 को उन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेना की मराठा लाइट इंफेट्री रेजिमेंट की 2 बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था।
स्वतंत्रता के पश्चात से नागा विद्रोह भारत का प्रथम और सबसे प्राचीन विद्रोह भी था। नागा गुरिल्ला समूह क्रूर और युद्ध प्रशिक्षित थे। 1956 में कैप्टन एरिक जेम्स टकर नागा हिल्स (वर्तमान नागालैंड राज्य) में तैनात 2 मराठा लाइट इंफेट्री बटालियन की ‘B’ कंपनी की कमान नियंत्रण कर रहे थे। उन्हें चाकबामा से फेक तक, 42 मील की दूरी और मेलुरी से 20 मील की दूरी तक संचार की लाइनें खोलने का कार्य दिया गया था।
उन्होंने अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया। वह विपुल संख्या में स्वचालित शस्त्रों और राइफलों से लैस विद्रोहियों से संघर्ष करते हुए 15 अक्टूबर 1956 को मेलुरी पहुंचे। अपने घावों से अविचलित , अति साहस के साथ वह मार्ग में जूझते रहे व विद्रोहियों को हताहत करते रहे। विद्रोहियों द्वारा उन्हें मारने की अनेक चेतावनियों के उपरांत भी उन्होंने अपने कर्तव्य से परे अनेक संकटमय और कठिन कार्यों को पूर्ण किया।
1 अप्रैल 1957 को उन्हें चिपोकाटामी में, विद्रोहियों के इकट्ठे होने की सूचना प्राप्त हुई । घने जंगलों से होकर वह उस स्थान पर पहुंच गए। विद्रोहियों को आश्चर्यचकित करते हुए उन्होंने चार विद्रोहियों को शस्त्रों के साथ पकड़ लिया। 18 जुलाई 1957 को उन्हें संचार लाइनें खोलने का कार्य सौंपा गया था। कैप्टन जेम्स टकर ने उस क्षेत्र में आक्रमण करके नागा उग्रवादियों के एक विशाल गुट को गंभीर क्षति पहुंचाई।
2 अगस्त 1957 को वह एक प्लाटून के साथ खुजामी से किविखु की ओर बढ़ रहे थे। घने जंगल में 70 माइलस्टोन के निकट उग्रवादियों ने उनपर घात लगाकर आक्रमण (AMBUSH) किया। उग्रवादियों ने उनकी गतिविधि के संबंध में अग्रिम सूचना जुटाई थी। कैप्टन जेम्स टूकर के मुख और पैरों पर आघात लगे थे, किंतु वह अंतिम गोली तक दृढ़ निश्चय से डटे रहे व उग्रवादियों से संघर्ष किया। अंत में उन्होंने उग्रवादियों पर प्रत्यक्ष आक्रमण किया। इस साहसिक एवं भयानक कार्रवाई में स्वचालित फायर लगने से वह वीरगति को प्राप्त हुए।
कैप्टन जेम्स टकर को उनके अनुकरणीय साहस, प्रचंड वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण एवं असाधारण नेतृत्व के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
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अशोक चक्र हवलदार राजेश कुमार धोचक https://shauryasaga.com/ashok-chakra-havildar-rajesh-kumar/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-havildar-rajesh-kumar/?noamp=mobile#respond Thu, 01 Aug 2024 06:27:23 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5149
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हवलदार राजेश कुमार धोचक
2890262H
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती बीता देवी
यूनिट – 11 राजपुताना राइफल्स
आतंकवाद विरोधी अभियान
हवलदार राजेश कुमार का जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले की गोहाना तहसील के लाठ गांव में, श्री रामकिशन धोचक एवं श्रीमती परमेश्वरी देवी के परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव के विद्यालय से प्राप्त की थी और मैट्रिक की शिक्षा राजकीय सीनियर सेकेंडरी विद्यालय, गोहाना से प्राप्त की थी।
23 फरवरी 1995 को, वह भारतीय सेना की राजपुताना राइफल्स रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 11 राजरिफ बटालियन में राइफलमैन के पद पर नियुक्त किया गया था। कारगिल युद्ध में, तुर्तुक के युद्ध में, विशेष प्रदर्शन के लिए उन्हें प्रशंसा पत्र दिया गया था। अपनी बटालियन में सेवाएं प्रदान करते हुए वह हवलदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे। वर्ष 2009 में उनकी बटालियन को जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद से अति प्रभावित कुपवाड़ा जिले में तैनात किया गया। वह 11 राजरिफ की ‘B’ कंपनी में घातक प्लाटून के सदस्य थे।
1 अगस्त 2009 को, गोपनीय सूत्रों से बटालियन को कुपवाड़ा जिले के घने बंगास जंगल में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों के छिपे होने की विश्वसनीय सूचना प्राप्त हुई। सूचना के आधार पर जंगल में अन्वेषण अभियान चला रही घातक प्लाटून पर आतंकवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग की। हवलदार राजेश कुमार इस घातक प्लाटून के अग्रणी सेक्शन में थे। उन्होंने प्रत्युत्तर में प्रचंड फायरिंग की और दृढ़ निश्चय से रेंगते हुए घने झाड़-झंखाड़ों में घुस कर एक आतंकवादी को मार दिया।
भीषण फायरिंग में, उनके प्लाटून कमांडर लेफ्टिनेंट अश्विन एक दिशा से हो रही प्रभावी फायरिंग में घिर गए। अपने अधिकारी के जीवन पर आसन्न गंभीर संकट को देख, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए, हवलदार राजेश कुमार आड़ से निकल कर उनकी ओर दौड़ पड़े। इस साहसिक प्रक्रिया में, उनके पेट में अनेक गोलियां लग गईं।
अपने घावों से अविचलित और असहनीय पीड़ा सहते हुए उन्होंने गोलियां चला कर द्वितीय आतंकवादी को भी मार दिया। इसके पश्चात अपनी अंतिम ऊर्जा एकत्र कर वह तृतीय आतंकवादी की एके-47 राइफल की बैरल पर झपटे। अति निकट से हुइ इस भयानक हाथापाई में पुनः गोलियां लगने से वह प्राणघातक रूप से घायल हो गए। उन्होंने तृतीय आतंकवादी को भी मार दिया और वीरगति को प्राप्त हुए।
हवलदार राजेश कुमार को उनकी विशिष्ट वीरता, असाधारण साहस, सौहार्द की भावना एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए 26 जनवरी 2010 को महामहिम राष्ट्रपति द्वारा मरणोपरांत “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया।
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अशोक चक्र सैकिंड लेफ्टिनेंट पुनीत नाथ दत्त https://shauryasaga.com/ashok-chakra-second-lt-punit-nath-datt/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-second-lt-punit-nath-datt/?noamp=mobile#respond Sat, 20 Jul 2024 11:22:47 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5041 —— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
सैकिंड लेफ्टिनेंट पुनीत नाथ दत्त
IC53987X
29-04-1973 – 20-07-1997
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 1/11 गोरखा राइफल्स
CI/IS ऑपरेशन्स
सैकिंड लेफ्टिनेंट पुनीत नाथ का जन्म 29 अप्रैल 1973 को राजस्थान के जोधपुर नगर में, मेजर प्रमोद नाथ दत्त एवं श्रीमती अनीता दत्त के परिवार में हुआ था। उनके पिता ने 1/11 गोरखा राइफल्स बटालियन में सेवाएं प्रदान की थीं। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त का शैक्षणिक कॅरियर उत्कृष्ट था। वे खेलों और शिक्षा के साथ अन्य क्रियाकलापों में भी रूचि लेते थे। उनकी शिक्षा दार्जिलिंग और जयपुर में हुई थी। वे सेंट बैथनीज स्कूल, दार्जिलिंग, सेंट जोसेफ्स एकेडमी, देहरादून, सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर और टैगोर पब्लिक स्कूल, जयपुर आदि विद्यालयों से पढ़े थे।
वह अपने मित्रों में ‘डिक्की’ नाम से जाने जाते थे। सैनिक परिवार से होने के कारण बाल्यकाल से ही वह सैन्य सेवा के अभिलाषी रहे थे। उसके लिए उन्होंने स्वयं को तैयार किया और वर्ष 1991 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में प्रवेश लिया। उन्होंने NDA में, उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 9 दिसंबर 1995 को उन्हें भारतीय सेना की 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 1st बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। डेढ़ वर्ष की अवधि में उन्होंने Young Officers Course, Commando Course और Fire Fighting Course पूर्ण कर लिए थे।
वर्ष 1997 में उनकी बटालियन को, जम्मू-कश्मीर में, आतंकवाद विरोधी अभियानों में तैनात किया गया। 19 जुलाई 1997 की रात्रि में, गोपनीय सूत्रों से बटालियन को श्रीनगर के नौशेरा क्षेत्र में एक घर में कुछ विदेशी आतंकवादियों के छिपे होने की विश्वसनीय सूचना प्राप्त हुई। 20 जुलाई 1997 की भोर मेंं 4:00 बजे गोरखाओं ने इस क्षेत्र को घेर लिया। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त को एक तीन तल्ला घर संदिग्ध प्रतीत हुआ, अतः सर्वप्रथम उन्होंने इस घर के वातायन और द्वारों पर पत्थर फेंके।
इसके पश्चात एक सैनिक को उस घर पर फायरिंग करने के लिए कहा। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त का संदेह उचित था। वे आतंकवादी, जो अब तक छिपकर निशब्द बैठे थे, फायरिंग करने से आक्रोशित हो गए व प्रत्युत्तर में फायरिंग करने लगे। दोनों ओर से तीन घंटे तक चली मुठभेड़ में इस घर पर हथगोले भी फेंके गए, किंतु उनका कोई परिणाम नहीं देखते हुए, इस घर पर 84 mm कार्ल गुस्ताफ रॉकेट दागा गया, किंतु, उस रॉकेट में विस्फोट ही नहीं हुआ।
आकस्मिक, सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त ने इस घर के प्रथम तल की बालकनी में छिपे हुए एक आतंकवादी को देखा, जो निरंतर सैनिकों पर गोलियां चला रहा था और भागने के प्रयास में था। उन्होंने, तत्क्षण अपनी AK-47 से सटीक फायर कर, वहीं उसे मार दिया।
अब इस सैन्य टुकड़ी के सामने उस घर को विस्फोटकों से उड़ा देने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहा था, किंतु वह अत्यंत संकटमय कार्य था। सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त ने स्वयं यह कार्य करने का निर्णय किया। उन्होंने अपने सैनिकों को कवर फायर के निर्देश दिए और स्वयं भीत लांघ कर उस घर में चले गए। वहां एक और आतंकवादी ने उन पर फायरिंग की, जिसे भी उन्होंने तत्क्षण AK-47 से त्वरित फायर कर मार गिराया।
इसके पश्चात उन्होंने घर में विस्फोटक लगाए और बाहर आ गए, तत्पश्चात उस घर के प्रथम तल पर हथगोले फेंके, क्योंकि वहां से भी एक आतंकवादी फायरिंग कर रहा था। इस मध्य सेकिंड लेफ्टिनेंट दत्त के मुख से रक्त आने लगा और उन्हें शीघ्र, चिकित्सालय ले जाया गया। प्रथम दृष्टया देखने में तो लगा कि यह कोई साधारण घाव है, किंतु बाद में ज्ञात हुआ कि ना जाने कब एक गोली उनके मुँह में घुसकर कान के नीचे से निकल गई थी। कुछ ही घंटों में, वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस ऑपरेशन में, सैकिंड लेफ्टिनेंट दत्त ने अत्यंत साहस प्रर्दशित करते हुए अपने जीवन को दांव पर लगाकर आतंकवादियों को समाप्त किया। उन्होंने उच्च कोटि की वीरता, असाधारण नेतृत्व क्षमता और परम राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया। 26 जनवरी 1998 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्हें मरणोपरांत शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया।
कुछ वर्ष पूर्व उनकी माता श्रीमती अनिता दत्त ने वह अशोक चक्र पदक 1/11 गोरखा राइफल्स को दे दिया, जिससे यह पदक सदैव बटालियन के सैनिकों को प्रेरणा देता रहे।

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अशोक चक्र श्री हुकुम सिंह https://shauryasaga.com/ashok-chakra-shree-hukum-singh/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-shree-hukum-singh/?noamp=mobile#respond Mon, 08 Jul 2024 03:53:16 +0000 https://shauryasaga.com/?p=4898 —–शौर्यनमन—–
श्री हुकुम सिंह ग्राम गौर, जिला छतरपुर, मध्य प्रदेश के निवासी थे। 4 जनवरी, 1966 की रात को सशस्त्र डाकुओं ने गौर गांव के निवासी महाराज सिंह के घर पर डाका डाला। ग्रामवासियों को दूर रखने के लिए वे अंधाधुंध गोलियां भी चलाते रहे। इस बीच महाराज सिंह के पुत्र गोविंद सिंह तथा उनके भाई घर से बाहर निकल आए और सहायता के लिए चिल्लाए। तब हुकुम सिंह सहित कई ग्रामवासी उनकी सहायता के लिए आए।

डाकुओं ने उन पर गोलियां चलाईं और गोविंद सिंह के भाई तथा एक अन्य ग्रामीण को घायल कर दिया। केवल लाठी और भाले लिए हुए ग्रामवासियों ने आग्नेयास्त्रों से लैस डाकुओं का सामना किया। इस भिड़ंत में महाराज सिंह, तखत सिंह और दो ग्रामवासी मारे गए तथा गोविंद सिंह और उनके भाई गंभीर रूप से घायल हो गए।

इन हत्याओं के होते हुए भी, हुकुम सिंह तथा लखनसिंह दो अन्य ग्रामवासियों को साथ लेकर लड़ते-लड़ते घर के अन्दर तक पहुंच गए तथा उन्होंने दो डाकुओं को घेर लिया। उनमें से एक, कमरे की खपरैल की छत में बने सुराख के रास्ते भागने में सफल हो गया, परन्तु उन्होंने दूसरे डाकू को घेरकर, एक कमरे में बंद कर दिया। परिणामस्वरूप बाकी डाकू हतोत्साहित हो गए और वे तुरन्त गांव छोड़कर भाग गए। इसी बीच वहां पुलिस पहुंच गई और उसने कमरे में फंसे डाकू को बंदी बना लिया।
सशस्त्र डाकुओं से लड़ने में हुकुम सिंह ने साहस तथा वीरता की शानदार मिसाल पेश की। उन्हें अशोक चक्र प्रदान किया गया।

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अशोक चक्र श्री लखन सिंह https://shauryasaga.com/ashok-chakra-shree-lakhan-singh/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-shree-lakhan-singh/?noamp=mobile#respond Sun, 07 Jul 2024 03:24:34 +0000 https://shauryasaga.com/?p=4892 ——शौर्यनमन——
श्री लखन सिंह ग्राम गौर, जिला छतरपुर, मध्यप्रदेश के निवासी थे। 4 जनवरी, 1966 की रात को सशस्त्र डाकुओं ने गौर गांव के निवासी महाराज सिंह के घर पर डाका डाला। ग्रामवासियों को दूर रखने के लिए वे अंधाधुंध गोलियां चलाते रहे। इस बीच महाराज सिंह के पुत्र गोविंद सिंह तथा उनके भाई घर से बाहर निकल आए और सहायता के लिए चिल्लाए। तब लखन सिंह सहित कई ग्रामवासी उनकी सहायता के लिए आए।

डाकू गोलियां चलाते रहे और उन्होंने गोविंद सिंह के भाई तथा एक अन्य ग्रामीण को घायल कर दिया। परन्तु ग्रामवासी हतोत्साहित नहीं हुए। उन्होंने केवल लाठी और भाले की मदद से आग्नेयास्त्रों से लैस डाकुओं का सामना किया। श्री गोविंद सिंह घर की दीवार फांद कर तीन मीटर नीचे आंगन में कूद पड़े जहां उनके पिता को बांधकर सताया जा रहा था। लखन सिंह के साथ वे डाकुओं पर टूट पड़े। डाकुओं ने उन पर गोलियां चलाई। इस भिड़ंत में महाराज सिंह, तखत सिंह तथा दो अन्य ग्रामवासी मारे गए तथा गोविंद सिंह और उनके भाई गंभीर रूप से घायल हुए। इस पर भी लखन सिंह और हुकुम सिंह लड़ते-लड़ते घर में घुस गए और उन्होंने दो डकैतों को घेर लिया। उनमें से एक तो कमरे की खपरैल की छत में बने सुराख के रास्ते भागने में सफल हो गया, परन्तु उन्होंने दूसरे डाकू को घेरकर एक कमरे में बंद कर दिया।
सशस्त्र डाकुओं से लड़ने में हुकुम सिंह ने साहस तथा वीरता की शानदार मिसाल पेश की। उन्हें अशोक चक्र प्रदान किया गया।

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अशोक चक्र कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा https://shauryasaga.com/ashok-chakra-captain-ummed-singh-mehra-2/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-captain-ummed-singh-mehra-2/?noamp=mobile#respond Sat, 06 Jul 2024 07:19:09 +0000 https://shauryasaga.com/?p=4877 —— बलिदान दिवस -शौर्यनमन—–
कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा
IC17696M
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 19 राजपुताना राइफल्स
आतंकवाद विरोधी अभियान
5 जुलाई 1971 को कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा 60 सैनिकों के एक दल के साथ नागालैंड में कठिन पहाड़ी क्षेत्र और पूर्ण भरे हुए नालों पर 12 घंटे चलने के पश्चात विद्रोहियों के शिविर की ओर बढ़े रहे थे। जब यह दल विद्रोहियों के HIDEOUT से 500 मीटर के अंतर पर था, तब कैप्टन मेहरा ने इसे विभिन्न दलों में विभाजित किया और दो दिशाओं से विद्रोही शिविर पर आक्रमण किया।
कैप्टन मेहरा जब विद्रोही शिविर के 30 मीटर घेरे में पहुंचे, उसी समय विद्रोहियों ने फायरिंग आरंभ कर दी। उन्होंने त्वरित प्रत्युतर की कार्रवाई की और अपने शस्त्र से फायर करते हुए विद्रोही शिविर पर आक्रमण किया। उन्होंने विद्रोहियों को मार दिया, किंतु वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
अत्यधिक रक्त बहते हुए भी वह अपने सैनिकों को विद्रोही शिविर पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। अपने कैप्टन की साहसी कार्रवाई से प्रेरित होकर सैनिकों ने भी वीरता से आक्रमण किया। इस साहसिक कार्रवाई से अवाक विद्रोही अपने मृत साथियों, शस्त्रों और गोला-बारूद को छोड़कर भाग गए। कैप्टन मेहरा उपचार के लिए ले जाते समय 6 जुलाई 1971 को वह वीरगति को प्राप्त हुए।
कैप्टन उम्मेद सिंह मेहरा को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व और प्रचंड वीरता प्रदर्शन के लिए मरणोपरांत “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया।
#आतंकवादविरोधीअभियान_1971

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अशोक चक्र श्री चमन लाल https://shauryasaga.com/ashok-chakra-shree-chaman-lal/ https://shauryasaga.com/ashok-chakra-shree-chaman-lal/?noamp=mobile#respond Sat, 06 Jul 2024 03:58:26 +0000 https://shauryasaga.com/?p=4874 ——शौर्यनमन——
श्री चमन लाल का जन्म ग्राम हैबित पिंडी, जिला गुरदासपुर, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गुरदास मल था।

1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान फायरमैन श्री चमन लाल उत्तरी रेलवे की एक माल गाड़ी में गुरदासपुर रेलवे स्टेशन पर सेवारत थे। 13 सितंबर, 1965 को उस माल गाड़ी पर कुछ पाकिस्तानी विमानों ने भारी गोले बरसाए, परिणामस्वरूप माल गाड़ी तथा डीजल से भरे तीन टैंकर-वैगनों में आग लग गई। एक टैंकर-वैगन का तो विस्फोट ही हो गया। आग को देखकर और भावी विनाश की आशंका से श्री चमन लाल अन्य टैंकर-वैगनों को बचाने के लिए भागे।

अपनी सुरक्षा की लेशमात्र परवाह न करते हुए फायरमैन ने आग से जलते टैंकर-वैगन को अलग कर दिया। उन्होंने इस जोखिम भरे काम को पूरा किया ही था कि वे जलते हुए टैंकर-वैगन की लपटों में घिर गए और जलकर राख हो गए। उनकी इस साहसिक कार्रवाई के फलस्वरूप गाड़ी के शेष वैगनों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा सका। श्री चमन लाल ने न केवल शेष वैगनों तथा उनमें लदे मूल्यवान सामान को बचाया अपितु रेलवे स्टेशन पर उपस्थित और लोगों की जान भी बचाई।

इस कार्रवाई के दौरान श्री चमन लाल ने अनुकरणीय साहस, दूरदर्शिता तथा आत्म बलिदान की भावना का प्रदर्शन किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया।

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