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मैं मरूंगा, देश जाग जाएगा-बाघा जतिन एक क्रांतिकारी शहीद की अमर गाथा

10 सितंबर 2025 को, हम उस महान क्रांतिकारी शहीद जतिंद्रनाथ मुखर्जी, जिन्हें दुनिया “बाघा जतिन” bagha jatin के नाम से जानती है, की पुण्यतिथि मना रहे हैं। “आम्रा मोरबो, जगोत जागबे” (मैं मरूंगा, देश जाग जाएगा) का उद्घोष करने वाले बाघा जतिन ने अपनी जान की बाजी लगाकर भारत की आजादी की लड़ाई में एक अमिट छाप छोड़ी। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी की बदौलत ही हमारा देश आजाद हुआ, और बाघा जतिन उनमें से एक चमकता सितारा थे। उनकी वीरता, साहस, और देशभक्ति की कहानी आज भी हर भारतीय को प्रेरित करती है।

बाघा जतिन का प्रारंभिक जीवन

जतिंद्रनाथ मुखर्जी का जन्म 7 दिसंबर 1879 को वर्तमान बांग्लादेश के कायाग्राम, कुस्टिया जिले में हुआ था। एक साधारण परिवार में जन्मे जतिन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने स्टेनोग्राफी सीखी और कोलकाता विश्वविद्यालय में नौकरी शुरू की। शारीरिक रूप से बलिष्ठ और साहसी जतिन की एक घटना ने उन्हें “बाघा जतिन” नाम दिलाया। एक बार जंगल से गुजरते समय उनकी भेंट एक बाघ से हुई, जिसे उन्होंने अपने हंसिए से मार गिराया। इस साहसिक कार्य के बाद वे “बाघा जतिन” के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

क्रांतिकारी गतिविधियों में योगदान

बाघा जतिन bagha jatin युगांतर पार्टी के प्रमुख नेता थे और उन्होंने ब्रिटिश शासन की “बंग-भंग” नीति का पुरजोर विरोध किया। उनकी देशभक्ति और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की भावना ने उन्हें क्रांतिकारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चेहरा बनाया। 1910 में, उन्हें “हावड़ा षडयंत्र केस” में गिरफ्तार किया गया और एक साल तक जेल में रखा गया। जेल से रिहा होने के बाद, वे अरविंदो घोष की “अनुशीलन समिति” के सक्रिय सदस्य बन गए। क्रांतिकारियों के पास धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती था, और इस दौरान “गार्डन रीच” डकैती एक प्रसिद्ध घटना मानी जाती है, जिसमें बाघा जतिन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान, बाघा जतिन ने जर्मनी से सहायता प्राप्त करके भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने की योजना बनाई। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर इस दिशा में कई गुप्त योजनाएं बनाईं, लेकिन ब्रिटिश सरकार की नजरों से बचना आसान नहीं था।

अंतिम युद्ध और शहादत

10 सितंबर 1915 को, बाघा जतिन bagha jatin अपने गुप्त अड्डे “काली पोख्स” (बालासोर, ओडिशा) में अंग्रेजों के साथ सशस्त्र मुठभेड़ में शहीद हो गए। इस युद्ध में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना का डटकर मुकाबला किया, लेकिन अंततः वे अपने प्राणों की आहुति दे बैठे। उनकी शहादत ने न केवल उनके साथी क्रांतिकारियों को, बल्कि पूरे देश को आजादी की लड़ाई के लिए और अधिक प्रेरित किया।

दार्शनिक क्रांतिकारी

बाघा जतिन bagha jatin को केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक दार्शनिक क्रांतिकारी भी कहा जाता है। उनकी सोच और विचारधारा ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। 1925 में, महात्मा गांधी ने उन्हें एक “दैवीय व्यक्तित्व” की संज्ञा दी थी, जो उनकी महानता को दर्शाता है। बाघा जतिन का जीवन और बलिदान हमें यह सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में होनी चाहिए।

एक प्रेरणास्रोत

बाघा जतिन bagha jatin की कहानी आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका साहस, उनकी निष्ठा, और उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी अनगिनत बलिदानों का परिणाम है। उनकी पुण्यतिथि पर हम न केवल उनके बलिदान को याद करते हैं, बल्कि यह संकल्प भी लेते हैं कि हम उनके सपनों के भारत को साकार करने में अपना योगदान देंगे।

नमन और श्रद्धांजलि

अमर शहीद बाघा जतिन bagha jatin को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन और श्रद्धांजलि। उनका बलिदान हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा। “आम्रा मोरबो, जगोत जागबे” का उनका संदेश आज भी हमारे दिलों में गूंजता है, जो हमें देश के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है।

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