Vinay Dixit – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Wed, 26 Feb 2025 12:49:23 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Vinay Dixit – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 श्री तेज सिंह अशोक चक्र (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/tejsingh-ashokchakra/ https://shauryasaga.com/tejsingh-ashokchakra/?noamp=mobile#respond Wed, 03 Apr 2024 08:06:59 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1128 श्री तेज सिंह

अशोक चक्र (मरणोपरांत)

श्री तेज सिंह का जन्म 1929 में ग्राम बम्हरौली, जिला मुरैना, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री इंद्रभान गुजर था। वे एक वीर तथा साहसी व्यक्ति थे। 12 सितंबर, 1964 की रात को 303 राइफलों तथा लोडिंग बंदूकों से लैस डाकुओं का एक दल, चुरहेला गांव के एक घर में जबरन घुस गया। उन्होंने गृह-स्वामिनी के पहने गहने लूट लिए और जब वह सहायता के लिए चिल्लाई तब गोली मारकर उसे घायल कर दिया। उस समय श्री तेज सिंह, श्री लज्जा राम तथा श्री पुरूषोत्तम पास की एक झोपड़ी में सो रहे थे। बंदूक चलने की आवाज तथा महिला की चीख ने उन्हें जगा दिया। उन्होंने महिला की सहायता करने का निश्चय किया और शस्त्रों से लैस डाकुओं पर लाठियों से हमला किया। श्री तेज सिंह तो एक डाकू से मजल लोडिंग बंदूक तक छीनने में सफल हो गए। तब डाकुओं ने अपनी गोलियां इन तीन ग्रामवासियों पर केन्द्रित कर दीं। परन्तु वे गोलियों की बौछार से भयभीत नहीं हुए और अंत तक अपनी लाठियों के साथ लड़ते रहे। श्री तेज सिंह को गोलियों के चार तथा तलवार का एक घाव लगा और उनकी उसी स्थान पर मृत्यु हो गई। उनके मित्र श्री लज्जाराम तथा श्री पुरूषोत्तम को गोलियों के दो-दो घाव लगे और बाद में उनकी भी अस्पताल में मृत्यु हो गई।अपने पड़ोसी की जान तथा सम्मान की रक्षा करने के प्रयास में श्री तेज सिंह ने अपने जीवन का बलिदान कर साहस तथा वीरता की शानदार मिसाल पेश की। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया।

                                                                     श्री तेज सिंह जी को मेरा सलाम।

                                                                                जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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श्री पुरुषोत्तम अशोक चक्र (मरणोपरांत) https://shauryasaga.com/ashokchakra-purshottamji/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-purshottamji/?noamp=mobile#respond Tue, 02 Apr 2024 05:52:32 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1126 श्री पुरुषोत्तम

अशोक चक्र (मरणोपरांत)

श्री पुरूषोत्तम का जन्म 1934 में ग्राम चुरहेला, जिला मुरैना, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री नौनतराम था। वे बहादुर तथा साहसी व्यक्ति थे।

12 सितंबर, 1964 की रात को 303 राइफलों तथा मजल लोडिंग बंदूकों से लैस डाकुओं का एक दल चुरहेला गांव के एक घर में जबरन घुस गया। डकैतों ने गृह स्वामिनी के पहने गहनों को लूट लिया और जब वह सहायता के लिए चिल्लाई तब गोली मारकर उसे घायल कर दिया।

उस समय श्री पुरूषोत्तम तथा उनके भाई लज्जाराम तथा उनके मित्र श्री तेज सिंह पास की एक झोंपड़ी में सो रहे थे। गोली चलने की आवाज तथा महिला की चीख से वे जाग गए। उन्होंने उस महिला की सहायता करने का निश्चय किया और हथियारों से लैस डाकुओं पर लाठियों से प्रहार किया। श्री तेज सिंह तो एक डाकू से मजल लोडिंग बंदूक तक छीनने में सफल हो गए। तब डकैतों ने इन तीन बहादुर ग्रामवासियों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया। परन्तु वे गोलियों से भयभीत नहीं हुए और अंत तक अपनी लाठियों से लड़ते रहे। श्री तेज सिंह को चार गोलियां तथा तलवार से एक घाव लगा और उनकी उसी समय मृत्यु हो गई। श्री लज्जाराम तथा पुरूषोत्तम को दो-दो गोलियां लगीं और बाद में उनकी भी अस्पताल में मृत्यु हो गई।

अपने पड़ोसी की जान तथा सम्मान की रक्षा करने के प्रयास में श्री पुरूषोत्तम ने अपने जीवन का बलिदान कर दिया। वीरता तथा पराक्रम का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया।

                                                                    श्री पुरुषोत्तम अशोक चक्र को मेरा सलाम।

                                                                                            जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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अशोक चक्र (मरणोपरांत) श्री लज्जाराम https://shauryasaga.com/ashokchakra-lajjasinghji/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-lajjasinghji/?noamp=mobile#respond Mon, 04 Mar 2024 06:59:11 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1121 श्री लज्जाराम

अशोक चक्र (मरणोपरांत)

श्री लज्जाराम का जन्म सितंबर, 1934 में ग्राम चुरहेला, जिला मुरैना, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री नौनतराम था। वे एक बहादुर तथा साहसी व्यक्ति थे।

12 सितंबर, 1964 की रात को 303 राइफलों तथा मजल लोडिंग बंदूकों से लैस डाकुओं का एक दल चुरहेला गांव के एक घर में जबरन घुस गया। डकैतों ने गृह-स्वामिनी के पहने गहनों को लूट लिया। जब वह सहायता के लिए चिल्लाई तब उन्होंने गोली मारकर उसे घायल कर दिया। उस समय श्री लज्जाराम, उनके भाई श्री पुरूषोत्तम तथा उनके मित्र श्री तेज सिंह पास की एक झोपड़ी में सो रहे थे। गोली चलने की आवाज तथा महिला की चीख से वे जाग गए। उन्होंने उस महिला की सहायता करने का निश्चय किया और हथियारों से लैस डाकुओं पर लाठियों से प्रहार किया। श्री तेज सिंह तो एक डाकू से मजल लोडिंग बंदूक तक छीनने में सफल हो गए। तब डकैतों ने इन तीन बहादुर ग्रामवासियों को अपनी गोलियों का निशाना बनाया। परन्तु वे गोलियों से भयभीत नहीं हुए और अंत तक अपनी लाठियों के साथ लड़ते रहे। श्री तेज सिंह को चार गोलियां तथा तलवार का एक घाव लगा और उनकी उसी स्थान पर मृत्यु हो गई। श्री लज्जाराम तथा श्री पुरुषोत्तम को दो-दो गोलियां लगीं और बाद में उनकी भी अस्पताल में मृत्यु हो गई। अपने एक पड़ोसी की जान तथा सम्मान की रक्षा करने के प्रयास में श्री लज्जा राम ने अपने जीवन का बलिदान कर दिया। वीरता तथा पराक्रम का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया

                          श्री लज्जाराम अशोक चक्र (मरणोपरांत) को मेरा सलाम।

                                                             जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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अशोक चक्र (मरणोपरांत) श्री चमन लाल https://shauryasaga.com/chamanlal-ashokchakra/ https://shauryasaga.com/chamanlal-ashokchakra/?noamp=mobile#respond Sat, 02 Mar 2024 08:37:25 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1116  

 श्री चमन लाल

अशोक चक्र (मरणोपरांत)

श्री चमन लाल का जन्म ग्राम हैबित पिंडी, जिला गुरदासपुर, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गुरदास मल था।1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान फायरमैन श्री चमन लाल उत्तरी रेलवे की एक माल गाड़ी में गुरदासपुर रेलवे स्टेशन पर सेवारत थे। 13 सितंबर, 1965 को उस माल गाड़ी पर कुछ पाकिस्तानी विमानों ने भारी गोले बरसाए, परिणामस्वरूप माल गाड़ी तथा डीजल से भरे तीन टैंकर वैगनों में आग लग गई। एक टैंकर-वैगन का तो विस्फोट ही हो गया। आग को देखकर और भावी विनाश की आशंका से श्री चमन लाल अन्य टैंकर-वेगनों को बचाने के लिए भागे। अपनी सुरक्षा की लेशमात्र परवाह न करते हुए फायरमैन ने आग से जलते टैंकर वैगन को अलग कर दिया। उन्होंने इस जोखिम भरे काम को पूरा किया ही था कि वे जलते हुए टैंकर वैगन की लपटों में घिर गए और जलकर राख हो गए। उनकी इस साहसिक कार्रवाई के फलस्वरूप गाड़ी के शेष वैगनों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा सका। श्री चमन लाल ने न केवल शेष वैगनों तथा उनमें लदे मूल्यवान सामान को बचाया अपितु रेलवे स्टेशन पर उपस्थित और लोगों की जान भी बचाई।  इस अनुकरणीय कार्रवाई साहस,के दौरान श्रीचमनलाल ने दूरदर्शिता  तथा आत्मबलिदान की आशा भावना का प्रदर्शन किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया

                                                        श्री चमन लाल को मेरा सलाम।

                                                                        जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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अशोक चक्र, 11 गोरखा राइफल्स कैप्टन मन बहादुर राय https://shauryasaga.com/ashokchakra-gorkha-cap-manbahaddurrai/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-gorkha-cap-manbahaddurrai/?noamp=mobile#respond Fri, 01 Mar 2024 06:41:40 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1112

कैप्टन मन बहादुर राय

अशोक चक्र, 11 गोरखा राइफल्स

कैप्टन मन बहादुर राय (आई सी-5261) का जन्म 10 जनवरी, 1914 को दार्जिलिंग, पश्चिमी बंगाल में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री राम सिंह था। वे 17 जुलाई, 1930 को 10 गोरखा राइफल्स में भर्ती हुए थे और उन्हें 27 अगस्त, 1948 को 11 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। बाद में वे मेजर के पद पर भी सेवारत रहे। 11 गोरखा राइफल्स1961 में 11 गोरखा राइफल्स ने तंग घाटियों और घने जंगलों से आच्छादित पहाड़ी प्रदेश में मोर्चाबंद नगा विद्रोहियों के खिलाफ कई कार्रवाइयों में हिस्सा लिया। अप्रैल, 1961 के अंत में आधी रात को एक प्लाटून का नेतृत्व करते हुए, कैप्टन राय दो विद्राही ठिकानों के बीच से होकर उनके गढ़ तक पहुंच गए। एक भीषण हमला किया गया और एक घमासान लड़ाई के बाद वे विद्रोहियों को उस ठिकाने से भगाने में सफल रहे। 3 मई, 1961 को कैप्टन राय ने एक प्लाटून के साथ, तंग घाटी में स्थित विद्रोहियों के सुरक्षित ठिकाने पर हमला किया। इस ठिकाने से चारों तरफ के इलाके को देखा जा सकता था और इस तक केवल सामने से ही पहुंचा जा सकता था। परन्तु सामने के हमले में अधिक लोगों के हताहत होने की संभावना को देखते हुए कैप्टन राय आधी प्लाटून को साथ लेकर आस-पास के झाड़-झंखाड़ के बीच से रेंगते हुए आगे बढ़े। फिर वे नजदीक से आती हुई गोली-बारी के बीच से होकर ठिकाने की खड़ी ढाल पर चढ़ गए। ठिकाने को देखते ही वे उस तरफ बढ़े, उस पर दो हथगोले फेंके और कुछ विद्रोहियों को मार गिराया। गोली-बारी करते हुए वे उन पर टूट पड़े और दो और को मार गिराया। उनके इस निर्भीकतापूर्ण हमले से उनके सैनिकों में जोश भर गया और विद्रोहियों को इतना हतोत्साहित कर दिया कि वे घने जंगल की तरफ भाग गए।इस कार्रवाई में 10 विद्रोही मारे गए और वे दो राइफल, एक 12 बोर गन और एक टामी गन छोड़ गए। इस हमले ने विद्रोहियों को एक जोरदार झटका दिया। बाद में कैप्टन राय ने असम राइफल्स की आठवीं बटालियन तथा नागालैंड की विलेज गार्ड ऑर्गनाइजेशन के अफसर की हैसियत से अनेक साहसिक काम किए। कैप्टन मन बहादुर राय की अदम्य संकल्प शक्ति, दिलेर नेतृत्व और व्यक्तिगत सुरक्षा के प्रति उदासीनता उनके साथियों के लिए प्रेरणा स्रोत थी। उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें मिलिट्री क्रास तथा इंडियन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस पदक से भी सम्मानित किया गया था।

                        कैप्टन मन बहादुर राय को मेरा सलाम।

                                              जय हिन्द।

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अशोक चक्र (मरणोपरांत), मराठा लाइट इंफैंट्रीकैप्टन एरिक जेम्स टुकर https://shauryasaga.com/ashokchakra-ericjamestucker/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-ericjamestucker/?noamp=mobile#respond Wed, 28 Feb 2024 09:59:01 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1108

कैप्टन एरिक जेम्स टुकर

अशोक चक्र (मरणोपरांत), मराठा लाइट इंफैंट्री

कैप्टन एरिक जेम्स टुकर (आई सी-5034) का जन्म 21 अक्तूबर, 1927 को हुआ था। उन्हें 13 जुलाई, 1947 को 2 मराठा लाइट इंफेंट्री में कमीशन मिला। उन्होंने अपने सेवाकाल में कई पदक जीते।

मराठा लाइट इफैंट्री1956 में 2 मराठा लाइट इंफेंट्री नगालैंड में तैनात थी। कैप्टन (एक्टिंग मेजर) टुकर वहां पर बीकंपनी का नेतृत्व कर रहे थे। उन्हें चकबामा और फेक के बीच 67 किलोमीटर और उसके बाद मेलुरी तक 32 किलोमीटर के बीच का संचार मार्ग खोलने का काम सौंपा गया था। तदर्थ उन्हें रास्ते के सभी विद्रोही अड्डों को नष्ट कर मेलुरी में एक चौकी स्थापित करनी थी। इस काम को 9 अक्तूबर, 1956 को पूरा कर लिया गया परन्तु उन्हें संभरण व्यवस्था के अभाव में 11 अक्तूबर को मेलुरी को छोड़कर फेक वापस आना पड़ा। खाद्य व्यवस्था ठीक हो जाने के बाद, बाधाओं से लड़ते हुए, वे 15 अक्तूबर, 1956 को फिर मेलुरी पहुंच गए।

अक्तूबर 21, 1927-अगस्त 2. 1957

कैप्टन टुकर ने कई और भी जोखिम भरे काम किए। 1 अप्रैल, 1957 को जब उन्हें चिपोकटामी में विद्रोहियों के जमाव की सूचना मिली, तो उन्होंने घने जंगलों के बीच से वहां पहुंचकर उनको चकित कर दिया। धुआंधार गोलीबारी की परवाह न करते हुए एक सेक्शन को लेकर वे विद्रोहियों के ठिकाने पर टूट पड़े और राइफलों से लैस चार विद्रोहियों को पकड़ लिया। 18 जुलाई, 1957 को कैप्टन टुकर ने विश्यपु में विद्रोहियों के बड़े दस्ते को घेरकर बड़ी संख्या में हताहत किया और कइयों को बंदी बनाया। अगस्त के प्रारंभ में कैप्टन टुकर की कंपनी लोजाफमी-खुजामी-चिजामी इलाके में गश्त पर थी। 2 अगस्त को एक प्लाटून के साथ खुजामी से किविखू जाते हुए वे घात में फंस गए। विद्रोहियों को उनके आने की खबर पहले ही लग चुकी थी अतः वे मील पत्थर 70 के पास घनी झाड़ियों में घात लगाकर बैठे थे। अग्रिम सेक्शन के घात से आगे निकलने के बाद विद्रोहियों ने नजदीक से उन पर स्वचालित हथियारों और राइफलों के साथ फादर करना शुरू कर दिया। कैप्टन को चेहरे और पैर में चोट आई पर वे मोर्चा संभाले रहे और अन्तिम गोली तक विद्रोहियों पर अपनी स्टेन गन से फायर करते रहे। अंत में उन्होंने विद्रोहियों के ठिकाने पर हथगोले के साथ धावा बोला, परंतु वहां पर स्वचालित हथियार की गोलियों की बौछार उनके सीने में लगी और वे वीरगति को प्राप्त हो गए। एरिका टुकर की पत्नी, राष्ट्रपति राजेन्द्रप्रसाद से अशोक चक्र प्राप्त नगा हिल्स में अपने सेवाकाल के दौरान कैप्टन एरिक जेम्स टुकर ने अनुकरणीय साहस, कर्तव्यनिष्ठा और असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

                               कैप्टन एरिक जेम्स टुकर को मेरा सलाम।

                                                          जय हिन्द।

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अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (Ashok Chakra Hero- Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra) https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-jagannath-chitnis/?noamp=mobile#respond Fri, 23 Feb 2024 08:15:58 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1103

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस Lieutenant Colonel Chitnis

अशोक चक्र (मरणोपरांत), 3 गोरखा राइफल्स

लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस (आई सी-3472) का जन्म 20 अगस्त, 1918 को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. रावजी गोपाल चिटनिस था। उन्हें 12 अप्रैल, 1942 को 1/3 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। अपने विशिष्ट सेवाकाल के दौरान उन्होंने कई पदक जीते।

  1. गोरखा राइफल्सजून, 1956 में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस नगा हिल्स में 1/3 गोरखा राइफल्स की कमान संभाले हुए थे। 14 जून को 8 जीपों के रक्षा दल के साथ मोकोकुचंग से जुन्हेबोटो जाते हुए, 21 माइल स्टोन के पास, उनकी प्लाटून पर करीब 100 नगा विद्रोहियों ने धावा बोल दिया। ये नगा विद्रोही लाइट मशीन गन, स्टेन गन और राइफलों से लैस थे। इस हमले में लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस और उनके चार सैनिक घायल हो गए और प्लाटून विद्रोहियों के बंकर से 150 मीटर पहले ही रूक गई। अगस्त 20, 1918 जून 14, 1956तब कमांडिंग अफसर ने विद्रोहियों के बंकर पर संगीन से हमले का आदेश दिया। उन्होंने आगे रहते हुए स्वयं हमले का नेतृत्व किया। अपनी स्टेन गन से उन्होंने एक विद्रोही को मार डाला और दूसरे को घायल कर दिया। इसी समय बाजू में स्थित एक लाइट मशीन गन ने उनकी प्लाटून पर घातक गोलीबारी की। पैर में चोट के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल चिटनिस ने लाइट मशीन गन चौकी पर सामने से धावा बोल दिया। इस बार पेट में गोलियां लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और विद्रोही चौकी से 15 मीटर पहले ही गिर पड़े। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अपने सैनिकों को विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। उनके उदाहरण से प्रोत्साहित होकर सैनिक उत्साह के साथ लड़े और उन्होंने विद्रोहियों के ठिकाने को साफ कर दिया। 20 विद्रोही मारे गए और कई घायल हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस ने न केवल अपने सैनिकों की जान बचाई अपितु शत्रु को भारी नुकसान पहुंचाया। वे अन्तिम सांस तक अपने जवानों का नेतृत्व करते रहे और इस प्रकार उन्होंने उत्कृष्ट नेतृत्व और वीरता का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

                                            लेफ्टिनेंट कर्नल जगन्नाथ रावजी चिटनिस को मेरा सलाम।

Lieutenant Colonel Chitnis Ashok Chakra” Gorkha Rifles Sacrifice

Naga Hills 1956

                                                                                  जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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अशोक चक्र (मरणोपरांत), सिख रेजिमेंट हवलदार जोगिन्दर सिंह https://shauryasaga.com/ashokchakra-hawaldar-jogindarsingh/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-hawaldar-jogindarsingh/?noamp=mobile#respond Thu, 22 Feb 2024 08:52:17 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1099

हवलदार जोगिन्दर सिंह

अशोक चक्र (मरणोपरांत), सिख रेजिमेंट

हवलदार जोगिन्दर सिंह (नं-18576) का जन्म सन् 1922 में ग्राम दातेवास, जिला भटिंडा, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री शाम सिंह था। वे 30 नवंबर, 1940 को 2 सिख रेजीमेंट में भर्ती हुए थे।

सिख रेजिमेंट अप्रैल, 1956 में 2 सिख नगा-हिल्स के खुजामी क्षेत्र में तैनात थी। इस इलाके में नागा-विद्रोही बहुत सक्रिय थे और सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करते रहते थे। निःसंदेह स्थिति बहुत ही चिन्ताजनक थी।

24 अप्रैल को तीन जीपों का दल हवलदार जोगिन्दर सिंह की सुरक्षा में, महत्वपूर्ण साजो-सामान के साथ अग्रिम चौकी फेक फेक के लिए जा रहा था। 16वें मील पर विद्रोहियों ने उन पर घात लगाकर हमला किया। जैसे ही रक्षा दल सड़क के एक मोड़ से गुजरा तो विद्रोहियों ने पास की एक पहाड़ी से अचानक मशीन गन से गोलीबारी शुरू कर दी और हवलदार जोगिन्दर सिंह के दाहिने पैर को जख्मी कर दिया। लेकिन हवलदार जोगिन्दर सिंह फौलाद के बने थे। दुश्मन की गोलियों की परवाह न करते हुए वे जीप से कूद पड़े और विद्रोहियों के ठिकाने पर हमला करने के लिए दौड़ पड़े। इस दौरान उनके दाहिने कंधे में भी गोली लगी। लेकिन यह जख्म भी उन्हें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से रोक नहीं सका। अपने दस्ते के 6 सैनिकों के साथ उन्होंने हमले को जारी रखा। जब हवलदार विद्रोहियों से केवल 25 मीटर की दूरी पर थे, तब लाइट मशीन गन की बौछार से फिर उनके पेट में चोट आई। वे जमीन पर गिर पड़े पर हिम्मत नहीं हारे। गहरे जख्मों के बावजूद वे आगे बढ़ते गए, विद्रोहियों की लाइट मशीन गन चौकी पर दो हथगोले फेंके और उसे नष्ट कर दिया। बहादुर हवलदार ने जख्मों की मरहम पट्टी करवाने से मना कर दिया। वे अपने सैनिकों को आगे बढ़ने और

लक्ष्य पर कब्जा करने के लिए प्रेरित करते रहे। अन्त में, विद्रोही साजो-सामान तथा गोला-बारूद छोड़ कर जंगल में भागने के लिए मजबूर हो गए गंभीर जख्मों के कारण हवलदार जोगिन्दर सिंह की वहीं मृत्यु हो गई, लेकिन उनके प्रेरक नेतृत्व के कारण सैनिकों को उस लाइट मशीन गन चौकी को नष्ट करने में सफलता मिली जिसने अग्रिम ठिकानों तक आवश्यक साजोसामान की आपूर्ति को रोक रखा था। हवलदार जोगिन्दर सिंह ने इस कार्रवाई में असाधारण नेतृत्व और साहस का परिचय दिया। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।                     

                                                         हवलदार जोगिन्दर सिंह को मेरा सलाम।

                                                                                  जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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अशोक चक्र (मरणोपरांत), सिख लाइट इन्फैंट्री सेकंड लेफ्टिनेंट पोलूर मुथुस्वामी रमन https://shauryasaga.com/ashokchakra-2nd-lt-pollur-mutthuswamy-raman/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-2nd-lt-pollur-mutthuswamy-raman/?noamp=mobile#respond Wed, 21 Feb 2024 07:34:10 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1093

सेकंड लेफ्टिनेंट पोलूर मुथुस्वामी रमन

अशोक चक्र (मरणोपरांत), सिख लाइट इन्फैंट्री

सेकंड लेफ्टिनेंट पी. एम. रमन (आई सी-7415) का जन्म 4 दिसंबर, 1934 को जिला उत्तरी अर्कोट, मद्रास में हुआ था। इनके पिता मेजर डॉ. पी. के. मुथुस्वामी थे। उन्हें 2 जून, 1955 को सिख लाइट इन्फेंट्री में कमीशन मिला था।

सिख लाइट इंफेंट्री1956 में 3 सिख लाइट इन्फेंट्री को नगा हिल्स में नगा विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए तैनात किया गया था। 3 जून, 1956 को इस बटालियन की कंपनी को कोहिमा में चेपोमा गांव पर प्रातः काल हमला कर विद्रोहियों के एक मजबूत ठिकाने पर कब्जा करने का आदेश मिला। जब 5:00 बजे कंपनी घेफेमा पहुंची तो गांव से उन पर अंधाधुंध गोलीबारी होने लगी। इस मौके पर सेकंड लेफ्टिनेंट रमन को, जो अपनी कंपनी की नं 2 प्लाटून को कमांड कर रहे थे, गांव से विद्रोहियों का सफाया करने का आदेश दिया गया परंतु गांव में घुसते ही उन पर लाइट मशीन गनों, स्टेनगनों और राइफलों से भीषण गोलीबारी होने लगी। कुहासे और कम दृश्यता के कारण विद्रोहियों के ठिकाने का सही अंदाजा नहीं लगा और उनकी गोलियों की बौछार के सामने आगे बढ़ना असंभव हो गया। अचानक कुहासा साफ हो गया। रमन अब झोपड़ी के आसपास विद्रोहियों की गतिविधि देख सकते थे। मौके का लाभ उठाकर वे झोपड़ी की तरफ दौड़े और स्टेन गन से गोलियों की बौछार करते हुए दो विद्रोहियों को मार गिराया। पास में छिपे हुए एक तीसरे विद्रोही ने रमन के ऊपर एक ग्रेनेड फेंका, जिससे वे बाल-बाल बचे। सेकंड लेफ्टिनेंट रमन आगे बढ़ते रहे और अपनी स्टेन गन की बौछार से उन्होंने एक और विद्रोही को मार गिराया। यहां पर एक और विद्रोही ने उनके ऊपर ग्रेनेड फेंका, जिसने उनके हेट को चीर डाला और उन्हें जख्मी कर दिया। परन्तु उन्होंने हमला जारी रखा। इससे विद्रोही पूरी तरह हतोत्साहित हो गए और भाग निकले। बहादुर अफसर ने आगे बढ़ते हुए एक और विद्रोही को मार गिराया। इस प्रकार ठिकाने से विद्रोहियों का सफाया हो गया। इसी बीच एक विद्रोही ने अपनी स्टेन गन से बहुत ही नजदीक से सेकंड लेफ्टिनेंट रमन पर गोलियां बरसाई, जो उनके पेट में लगी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और हमलावर पर एक हथगोला फेंक दिया। विद्रोही को घिसटकर पास की झाड़ी में घुसते हुए देखा गया। कुहासा अब छंटने लगा था। रमन ने अपने सैनिकों को आगे बढ़ने और बचे हुए विद्रोहियों को मार भगाने का आदेश दिया। उनसे प्रेरणा पाकर सैनिकों ने विद्रोहियों को गांव से साफ कर दिया। इस संक्रिया में 5 विद्रोही मारे गए और 3 घायल हुए। उनसे एक एस बी एम एल गन और कुछ गोला-बारूद भी बरामद हुआ। विद्रोहियों के इस मजबूत ठिकाने को साफ करने में सेकंड लेफ्टिनेंट रमन ने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। इस कार्रवाई में असाधारण कर्तव्यनिष्ठा और नेतृत्व के प्रदर्शन के लिए लेफ्टिनेंट पोलूर मुथुस्वामी रमन को मरणोपरांत अशोक चक्र प्रदान किया गया।

                                               सेकंड लेफ्टिनेंट पोलूर मुथुस्वामी रमन को मेरा सलाम।

                                                                                 जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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अशोक चक्र, जम्मू और कश्मीर लाइट इंफैंट्रीलांस नायक सुन्दर सिंह https://shauryasaga.com/ashokchakra-lancenaiksundersingh/ https://shauryasaga.com/ashokchakra-lancenaiksundersingh/?noamp=mobile#respond Wed, 14 Feb 2024 06:13:56 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1083

लांस नायक सुन्दर सिंह

अशोक चक्र, जम्मू और कश्मीर लाइट इंफैंट्री

लांस नायक सुन्दर सिंह (नं-15103) का जन्म 14 फरवरी, 1929 को ग्राम चौकी हंडन, जिला राजौरी, जम्मू और कश्मीर में हुआ था। वे 14 फरवरी, 1947 को जम्मू और कश्मीर स्टेट फोर्स में भर्ती हुए। बाद में 1 जनवरी, 1957 को वे जम्मू और कश्मीर इंफैंट्री में ले लिए गए। वे सूबेदार मेजर तथा ऑनरेरी लेफ्टिनेंट के पद पर भी सेवारत रहे।

कश्मीर लाइट –1956 में 4 जम्मू कश्मीर इंफैन्ट्री, फिरोजपुर के निकट हुसैनीवाला हेड वर्क्स पर तैनात थी। 18 मार्च की रात को पाकिस्तानियों ने उनके ठिकाने पर हमला बोल दिया। भारतीय सैनिकों ने इस हमले को नाकाम कर दिया और हमलावरों को गाइड बांध के दाहिने भाग से खदेड़ दिया। लेकिन गाइड बांध का अगला भाग और दाहिना छोर अभी भी दुश्मन के कब्जे में था।

हमलावरों की बांध के अगले भाग पर लाइट मशीन गन की एक चौकी थी और वहां से उन्होंने नदी के पार भारतीय सैनिक चौकी बेला, गाईड बांध के दाहिने तथा गाइड बांध के बाएं नौका स्थल पर धुआंधार गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। ऐसी स्थिति में भारतीय सैनिकों के लिए बांध पर कब्जा बनाए रखना, गोला-बारूद की आपूर्ति करना तथा हताहतों की निकासी के लिए नदी में नाव चलाना कठिन हो गया। गन की इस चौकी के कारण बेला स्थित भारतीय सैनिकों की सुरक्षा भी खतरे में थी। इसलिए इस चौकी से दुश्मन को खदेड़ना आवश्यक था। परन्तु दुश्मन की गन की भारी गोलाबारी ने बांध के अगले भाग की ओर बढ़ना रोक दिया था। तब मशीन गन पोस्ट को नष्ट करने के लिए वालंटियर्स का आह्वान किया गया। लांस नायक सुन्दर सिंह इस काम के लिए आगे आए। उन्होंने अपने साथ 6 हथगोले लिए, दुश्मन की गोलियों से घिरे बांध से रेंगते हुए 100 मीटर आगे बढ़े, और फिर दाहिने बांध पर पत्थरों के ढेर को पार कर 50 मीटर अंदर शत्रु के इलाके में घुस गए। जैसे ही वे गन चौकी के नजदीक पहुंचे उन्होंने उस पर कई ग्रेनेड फेंक दिए। इस प्रकार मशीन गन बेकार हो गई और उस पर तैनात तीन सैनिक मारे गए। अपने जीवन को भारी खतरे में डालते हुए तब वे मशीन गन तक गए और उसे मैग्जीन समेत अपने कब्जे में कर लिया। नायक सुन्दर सिंह की इस बहादुरी के ही कारण 4 जम्मू और कश्मीर इन्फैंट्री बांध के अगले भाग पर कब्जा करने में सफल रही। वे गन चौकी से तीनों मृतकों को लाने के लिए तीन बार वहां तक गए।

इस कार्रवाई में लांस नायक सुन्दर सिंह ने अपनी सुरक्षा की तनिक भी परवाह न करते हुए बड़ी सूझ-बूझ और उच्चकोटि के साहस का प्रदर्शन किया। इस साहसिक कार्य के लिए उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

                                                                 लांस नायक सुन्दर सिंहको मेरा सलाम।

                                                                                      जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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