Shivam Shahi – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Tue, 13 Feb 2024 06:34:32 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Shivam Shahi – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 परमवीर चक्र (मरणोपरांत), 1 गोरखा राइफल्स कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-captain-gurbachan-singh-salariya-gorkha-rifles/ https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-captain-gurbachan-singh-salariya-gorkha-rifles/?noamp=mobile#respond Tue, 13 Feb 2024 06:34:32 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1079  

कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया

परमवीर चक्र (मरणोपरांत), 1 गोरखा राइफल्स

कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया (आई सी 8497) का जन्म 29 नवंबर, 1935 को गांव जांगल, गुरदासपुर, पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री मुंशी राम था। उन्हें जून, 1957 को गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला था।

बेल्जियनों के कांगो छोड़ने के बाद वहां पर गृह युद्ध की स्थिति पैदा हो गई। स्थिति में सुधार लाने के लिए राष्ट्र संघ ने वहां पर सैनिक हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया जिसमें भारत ने राष्ट्र संघ सेना के लिए 3000 सैनिकों की एक बिग्रेड का सहयोग दिया। नवंबर 1961 में सुरक्षा परिषद ने कांगो में कटंगा के सैनिकों की गतिविधियों को रोकने का निश्चय किया। इससे कटंगा के अलगाववादी नेता शौम्बी बहुत नाराज हुए और उन्होंने राष्ट्र संघ के प्रति घृणा के प्रचार को और भी तेज कर दिया। फलस्वरूप वहां पर राष्ट्र संघ सेना के खिलाफ हिंसा भड़क उठी।

5 दिसंबर, 1961 को 3/1 गोरखा राइफल्स ने, एलिजाबेथविले हवाई अड्डे और कटंगा के बीच के सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण गोल चक्कर पर, कटांगा सैनिकों द्वारा स्थापित सड़क अवरोध पर, 3′ मोर्टारों से हमला किया। उसने शत्रु का सड़क अवरोध नष्ट कर वहां पर अपना अवरोध स्थापित किया। जब कैप्टन सलारिया एक प्लाटून को लेकर अवरोध को मजबूत करने के लिए कंपनी से संपर्क करने की कोशिश में थे तब रास्ते में पुराने हवाई अड्डे के पास उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। दुश्मन ने अपने सुरक्षित ठिकानों से प्लाटून के दाहिने भाग पर स्वचालित और छोटे अस्त्रों से भारी गोलीबारी की। शत्रु के 90 सैनिक और 2 कवचित कारें उस क्षेत्र की सुरक्षा में डटी थीं। कैप्टन सलारिया दुश्मन की अधिक संख्या और फायर शक्ति से जरा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने सीधे हमला करके लक्ष्य को प्राप्त करने का निश्चय किया।
गोरखा सैनिकों ने दुश्मन पर खुखरी, संगीन और ग्रेनेड से हमला बोला। एक रॉकेट लांचर ने हमले में उनकी मदद की। इस तीखी झड़प में कैप्टन सलारिया और उनके सैनिकों ने दुश्मन के 40 सैनिकों को मार गिराया और कवचित कारों को ध्वस्त कर दिया। इस निर्भीक कार्रवाई से दुश्मन के हौसले पस्त हो गए और बड़ी संख्या तथा सुरक्षित पोजीशन में होने के बावजूद वे भाग खड़े हुए। इस झड़प में दुश्मन के स्वचालित हथियार की मार से कैप्टन सलारिया की गर्दन में चोट आई परंतु चोट की परवाह न कर वे तब तक लड़ते रहे जब तक बहुत खून बहने के कारण वे बेहोश न हो गए। बाद में इन्हीं घावों के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस मुठभेड़ में 12 सैनिक भी जख्मी हुए। इस प्रकार कैप्टन सलारिया ने बहादुरी से गोल चक्कर पर दुश्मन को आगे बढ़ने से रोक कर एलिजाबेथविले में राष्ट्र संघ मुख्यालय को शत्रु के घेरे में फंसने से बचा लिया।

कप्तान सलारिया को उनके उत्कृष्ट नेतृत्व, साहस और कर्तव्यपरायणता के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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परम वीर चक्र (मरणोपरांत), राजपूताना राइफल्स कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-company-hewaldar-major-piru-singh-rajput-regiment/ https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-company-hewaldar-major-piru-singh-rajput-regiment/?noamp=mobile#respond Mon, 12 Feb 2024 06:24:39 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1065 कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह

परम वीर चक्र (मरणोपरांत), राजपूताना राइफल्स

कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह (नं-2831592) का जन्म 20 मई, 1918 को गांव बेरी, झुंझुनू, राजस्थान में हुआ. था। इनके पिता का नाम श्री लाल सिंह था। वे 20 मई, 1936 को 6 राजपूताना राइफल्स में भर्ती हुए थे।

वीर भोग्या वसुन्धरा राजपूताना राइफल्स जम्मू-कश्मीर संक्रिया के दौरान 18 मई, 1948 को पाकिस्तानी कबायलियों ने टिथवाल सेक्टर में एक जोरदार जवाबी हमला किया। 8 जुलाई को उन्होंने रिंग कंटूर पर धावा बोलकर उसे अपने कब्जे में कर लिया और भारतीयों को किशन गंगा नदी के उस पार की अग्रिम चौकियों को भी खाली करने पर मजबूर कर दिया। इस पराजय के बाद भारतीय सैनिकों ने टिथवाल पर्वत श्रेणी पर पोजिशन ले ली। तभी 163 ब्रिगेड को सन्निकट आक्रमण में सहायता देने के लिए 6 राजपूताना राइफल्स को उरी से टिथवाल भेजा गया।

11 जुलाई को भारत का आक्रमण शुरू हुआ। 15 जुलाई तक इसकी प्रगति ठीक रही। तभी टोह रपट ने सूचना दी कि दुश्मन एक ऊंचे ठिकाने पर जमा बैठा है और आगे बढ़ने के लिए उस ठिकाने पर कब्जा करना आवश्यक है। उससे कुछ और आगे एक दूसरे ठिकाने पर भी दुश्मन बड़ी तादाद में मौजूद था। इन दोनों ठिकानों पर कब्जा करने का दायित्व 6 राजपूताना राइफल्स को दिया गया। ‘डी’ कंपनी को पहले ठिकाने पर कब्जा करना था और उसके कार्य संपादन के बाद ‘सी’ कंपनी को दूसरे ठिकाने पर। 18 जुलाई को 13:30 बजे ‘डी’ कंपनी ने लक्ष्य की ओर कूच किया। लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता लगभग एक मीटर चौड़ा था और उसकी दोनों ओर गहरी खाइयां थीं। इस संकरे रास्ते पर दुश्मन के गुप्त बंकरों की भी नजर थी। जब कंपनी आगे बढ़ रही थी तभी उसे भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा जिसके कारण आधे घंटे में ही उसके 51 सैनिक हताहत हो गए।

इस लड़ाई के दौरान कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह कंपनी के उस अग्रिम सेक्शन के साथ थे जिसके आधे से ज्यादा सैनिक उस विनाशकारी फायर में हताहत हो चुके थे। वे अपने साथियों पर आग बरसाने वाली दुश्मन की मीडियम मशीन गन चौकी की ओर लपके। इस प्रयास में दुश्मन द्वारा फेंके गए ग्रेनेड के टुकड़ों से उनके कपड़े फट गए तथा शरीर में कई जगह जख्म हो गए। लेकिन ये घाव उन्हें रोक न सके। वे ‘राजा रामचन्द्र की जय जयघोष करते हुए आगे बढ़े तथा मीडियम मशीन गन क्रू को अपनी स्टेनगन से जख्मी कर दिया। फिर तेजी से लपककर संगीन से क्रू को मौत के घाट उतार दिया और इस प्रकार खतरनाक मशीनगन को शांत कर चौकी पर कब्ज़ा कर लिया।

अब तक उनके सभी साथी या तो मारे जा चुके थे या जख्मी हो चुके थे, अतः दुश्मन को पहाड़ी से हटाने का जिम्मा अब केवल उन्हीं पर था। यद्यपि उनके शरीर से खून बह रहा था तब भी वे दुश्मन की दूसरे मशीनगन ठिकाने पर हमला बोलने के लिए धीर-धीरे आगे बढ़े। इसी समय दुश्मन के एक ग्रेनेड से उनका चेहरा जख्मी हो गया। ललाट से निकलते लहू के कारण उन्हें दिखाई भी नहीं दे रहा था। अब तक उनकी स्टेनगन की सारी गोलियां भी समाप्त हो चुकी थीं। बहादुरी के साथ वे कब्जे में आई शत्रु की खाई से रंगकर बाहर आए और उसकी अगली चौकी पर एक ग्रेनेड फेंक दिया। इसके बाद पीरू सिंह अगली खाई में कूद पड़े और वहां बैठे दो शत्रु सैनिकों को संगीन घोंप कर मार गिराया। जब वे एक खाई से बाहर निकलकर दूसरी खाई पर कब्जा करने जा रहे थे तभी दुश्मन की एक गोली उनके सिर पर लगी, लेकिन मरने से पहले उन्होंने दुश्मन की तीसरी खाई में भी ग्रेनेड फेंक दिया।

कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह ने इस विलक्षण वीरतापूर्ण कृत्य में अपने प्राणों की आहूति दे दी और दृढ़ साहस का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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परम वीर चक्र (मरणोपरांत), राजपूत रेजिमेंट नायक जदुनाथ सिंह https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-rajput-regiment-naik-jadunath-singh-uttar-pradesh/ https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-rajput-regiment-naik-jadunath-singh-uttar-pradesh/?noamp=mobile#respond Sat, 10 Feb 2024 06:04:47 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1025

नायक जदुनाथ सिंह

परम वीर चक्र (मरणोपरांत), राजपूत रेजिमेंट

 

नायक जदुनाथ सिंह (नं-27373) का जन्म 21 नवंबर, 1916 को गांव खजूरी, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री बीरबल सिंह था। वे 21 नवंबर, 1941 को राजपूत रेजिमेंट में भर्ती हुए थे।

24 दिसंबर, 1947 को झंगर पर कब्जा करने के बाद नौशेरा सेक्टर में पाकिस्तानी कबायलियों की स्थिति मजबूत हो गई थी। मीरपुर से पुंछ तक की संचार लाइन पर पूरा अधिकार हो जाने के कारण वे अब नौशेरा पर हमले के लिए अपनी सेना को तैयार कर सकते थे। भारतीयों को इस खतरे का एहसास था। अतः जनवरी 1948 में उन्होंने नौशेरा से उत्तर-पश्चिम में स्थित कोट गांव पर कब्जा कर लिया था।

नौशेरा पर शत्रु का हमला निश्चित था अतः 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने दुश्मन के आक्रमण के सभी संभावित रास्तों पर अपनी चौकियां बनाकर इसे नाकाम करने की पूरी तैयारी कर ली थीं इनमें एक रास्ता नौशेरा के उत्तर में तैन धार से होकर जाता था।

शत्रु का संभावित हमला 6 फरवरी को सुबह 6:40 बजे धुंधलके में हुआ। दुश्मन ने तैन धार की पहाड़ी पर स्थित अपने ठिकाने से एक भारतीय पेट्रोलिंग पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके साथ ही सारा तैन धार फीचर और उसके आसपास की पहाड़ियां मशीन गन और मोर्टार की फायर से गूंज उठीं। इसी बीच अंधेरे का फायदा उठाकर दुश्मन भारतीय पिकेटों तक घुस आए। पौ फटते ही चौकी स्थित भारतीयों ने हजारों दुश्मनों को अपनी ओर बढ़ते देखा।

6 फरवरी के निर्णायक दिन नायक जदुनाथ सिंह तैन धार स्थित पिकेट नम्बर 2 की अग्रिम चौकी की कमान संभाले हुए थे। इस छोटी चौकी की रखवाली 9 सैनिक कर रहे थे। इस चौकी पर कब्जा पाने के लिए शत्रु ने एक के बाद एक कई हमले किए। पहले आक्रमण के दौरान शत्रु चौकी तक आ पहुंचा। तब इस कठिन परिस्थिति में नायक जदुनाथ सिंह ने पराक्रम और उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय देते हुए अपनी छोटी सी टुकड़ी का इस प्रकार संचालन किया कि दुश्मन घबराकर वापस लौट गया। जब उनके चार सैनिक घायल हो गए तो उन्होंने अपनी थकी-मांदी टुकड़ी को दूसरे हमले का मुकाबला करने के लिए पुनः संगठित किया।

जब वे अपने सारे सैनिकों सहित घायल हो गए तब उन्होंने घायल गनर से ब्रेनगन ले ली। दुश्मन अब सीधे चौकी की दीवार तक पहुंच गया था। अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए नायक जदुनाथ सिंह साथी सैनिकों को लड़ने के लिए उत्साहित करते रहे। उनकी गोलियों की बौछार शत्रु के लिए इतनी विनाशकारी साबित हुई कि एक निश्चित हार, जीत में बदल गई। दुश्मन मृतकों और घायलों को युद्ध भूमि में ही छोड़कर घबरा कर भाग गया। इस प्रकार चौकी को दूसरी बार भी बचा लिया गया। अब तक चौकी के सभी लोग हताहत हो चुके थे। तभी शत्रु ने चौकी पर अधिकार करने का संकल्प कर बड़ी संख्या में तीसरा और अंतिम धावा बोला। अकेले और घायल नायक जदुनाथ सिंह ने एक बार फिर शत्रु से लोहा लेने की ठानी। वे अपने खाई से बाहर आए और स्टेनगन से गोलीबारी करते हुए शत्रु पर टूट पड़े। हतोत्साहित दुश्मन भाग खड़ा हुआ। परंतु इस तीसरे और अंतिम आक्रमण में वे वीर गति को प्राप्त हुए। दो गोलियां उनके सीने और सिर को पार कर गई थीं। नौशेरा की लड़ाई के इस बहुत ही नाजुक मोड़ पर उन्होंने अपनी पिकेट को दुश्मन के हाथों में पड़ने से बचा लिया।

नायक जदुनाथ सिंह को उनके अद्भुत साहस एवं उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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परम वीर चक्र, इंजीनियर कोर सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे     https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-corps-of-engineer-core-second-lieutenant-ram-raghoba-rane-maharashtra/ https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-corps-of-engineer-core-second-lieutenant-ram-raghoba-rane-maharashtra/?noamp=mobile#respond Fri, 09 Feb 2024 06:30:03 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1020

 सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे

    परम वीर चक्र, इंजीनियर कोर

सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे (आई सी 7244) का जन्म 26 जून, 1918 को गांव चेंदिया, उत्तरी कनारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री आर. पी. राणे था। उन्हें 15 दिसंबर, 1947 को इंजीनियर कोर में कमीशन मिला और वे 1968 में मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। भारतीय सेना में 21 वर्ष की सेवा के दौरान उनके नाम का 5 बार डिस्पैचेज में उल्लेख किया गया।

18 मार्च, 1948 को भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर युद्ध के दौरान दिसंबर 1947 में शत्रुओं से हारे हुए झंगर पर फिर से कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने कबायलियों के बर्बर अत्याचारों से लोगों को बचाने के लिए नौशेरा से राजौरी की ओर बढ़ने का फैसला किया। रास्ते में चिंगास पड़ता था जो कश्मीर जाने के पुराने मुगल मार्ग पर था।

8 अप्रैल को 4 डोगरा ने राजौरी का रास्ता पकड़ा। उसने नौशेरा से 10 किलोमीटर उत्तर में बारवाली पहाड़ी पर धावा बोलकर दुश्मन को उसके मजबूत ठिकानों से खदेड़ दिया और उस पर कब्जा कर लिया। परंतु सड़क बाधाओं और सुरंगों की बहुतायत के कारण बटालियन का बारवाली से आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। यहां तक कि बख्तरबंद गाड़ियां भी इन अवरोधों को पार न कर सकीं। इस विषम परिस्थिति में सेकंड लेफ्टिनेंट राणे के नेतृत्व में 4 डोगरा के साथ सेवारत 37 एसाल्ट फील्ड कंपनी के एक सेक्शन ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया। 8 अप्रैल को जैसे ही सेक्शन ने सुरंग क्षेत्र को साफ करने का काम शुरू किया वैसे ही दुश्मन की मोर्टार फायर से दो खंदक खोदने वाले मारे गए और राणे समेत पांच अन्य घायल हो गए। फिर भी राणे और उनके साथियों ने शाम होने तक अपना काम पूरा कर लिया तथा रास्ते को टैंकों के आगे बढ़ने लायक बना दिया। लेकिन अभी शत्रु को इस क्षेत्र से साफ नहीं किया गया था अंतः सड़क पर आगे बढ़ना खतरनाक था। सेकंड लेफ्टिनेंट राणे ने टैंकों के लिए सुरक्षित रास्ता बनाने के लिए रात में भी काम किया। 9 अप्रैल को भी उनका इंजीनियर दल निरंतर 12 घंटे काम करता रहा और सुरंगों व मार्ग अवरोधों को हटाने में लगा रहा। जहां पर मार्ग पार करना संभव न था वहां पर उन्होंने दिक्परिवर्तन कर टैंकों के लिए दूसरा रास्ता बना दिया। सेकंड लेफ्टिनेंट राणे ने दुश्मन की तोप और मोर्टार की गोलीबारी के सामने भी अपना काम जारी रखा।

10 अप्रैल को वे प्रातः जल्दी उठकर उस मार्ग पर अवरोध को साफ करने में लग गए जिसे पिछली रात को साफ नहीं कर पाए थे। उन्होंने दो घंटों में ही पांच विशाल चीड़ के पेड़ों से अवरूद्ध, सुरंगों से घिरे और मशीन गन फायर से आवृत इस बड़े अवरोध को साफ कर दिया।

भारतीय सेना ने उस दिन 13 किलोमीटर की दूरी तय कर ली। तब उसे फिर एक दूसरा बड़ा मार्ग अवरोध मिला। इस मार्ग अवरोध की ओर आने वाले आस-पास की सभी पहाड़ी रास्तों पर शत्रु पिकेट बनाकर बैठा था तथा उस मार्ग अवरोध की ओर आने वालों की निगरानी कर रहा था। राणे एक टैंक पर सवार होकर अवरोध तक पहुंच गए और उसके नीचे बैठकर सुरंग लगाकर अवरोध को उड़ा दिया। इस प्रकार उन्होंने रात होने से पहले सड़क को साफ कर दिया। 11 अप्रैल को उन्होंने 17 घंटे लगातार काम करके चिंगास और उससे आगे का रास्ता भी खोल दिया और इस प्रकार भारतीय सेना के राजौरी मार्च को सुसाध्य करने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रयास के कारण दुश्मन के करीब 500 सैनिक मारे गए और बहुत सारे जख्मी हुए। चिंगास और राजौरी में बेकसूर लोगों की जान बचाने में भी उन्होंने मदद की। निस्सन्देह सेकंड लेफ्टिनेंट राणे के दृढ़ संकल्प एवं अथक प्रयास के बिना भारतीय सैनिक दस्ता चिंगास के महत्वपूर्ण ठिकानों तक नहीं पहुंच सकता था। यहीं से आगे बढ़ने का रास्ता सुगम हो जाता है।

राजौरी अभियान के दौरान साहसिक प्रयास के लिए सेकंड लेफ्टिनेंट राणे को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 

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परम वीर चक्र, सिख रेजिमेंट लांस नायक करम सिंह   https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-sikh-regiment-lance-naik-karam-singh/ https://shauryasaga.com/paramveer-chakra-sikh-regiment-lance-naik-karam-singh/?noamp=mobile#respond Thu, 08 Feb 2024 05:49:25 +0000 https://shauryasaga.com/?p=972

लांस नायक करम सिंह

परम वीर चक्र, सिख रेजिमेंट

 लांस नायक करम सिंह (नं-22356) का जन्म 15 सितंबर, 1915 को गांव सेहना, बरनाला, पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम उत्तम सिंह था। वे 15 सितंबर, 1941 को 1 सिख रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में मिलिट्री मेडल भी प्राप्त किया था।

जम्मू और कश्मीर की लड़ाई के दौरान, 1948 की आक्रामक कार्रवाई में, भारतीय सेना ने टिथवाल क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की। परिणामस्वरूप 23 मई, 1948 को टिथवाल पर भारतीय सेना का कब्जा हो गया। दुश्मन घबराकर किशन गंगा नदी के उस पार भाग खड़ा हुआ और उसने अपने हथियार और साजो-सामान नदी में फेंक दिए। लेकिन दुश्मन जल्दी ही इस सदमे से संभल गया। उसने अपनी सेना को पुनर्गठित कर खोई हुई जमीन को वापस लेने के लिए जोरदार जवाबी हमला किया। भारतीय सेना दुश्मन के दबाव को सह न सकी और वह किशन गंगा नदी की तटवर्ती पोजीशन से पीछे हट गई। अंत में दुश्मन का मुकाबला करने के लिए उसने टिथवाल की पहाड़ियों पर मोर्चा जमाया।

टिथवाल की लड़ाई कई महीनों तक चली। परंतु दुश्मन भारतीय सुरक्षा पंक्ति को भेद न सका। भारतीयों को उनके मजबूत ठिकानों से पीछे धकेलने के लिए 13 अक्तूबर को उसने एक ब्रिगेड स्तर का हमला किया। उसका उद्देश्य टिथवाल के दक्षिण में स्थित रिछमार गली पर फिर से कब्जा करना और टिथवाल के पूर्व में स्थित नस्ताचूर दरें तक पहुंच कर भारतीय सेना को घेरना था। उसके दोनों प्रयास विफल कर दिए गए। इस हमले के दौरान 13 अक्तूबर की रात को रिछमार गली में भीषण लड़ाई हुई। शत्रु ने तोपों और मोर्टारों की भारी गोलाबारी के साथ हमले की शुरूआत की। इस विध्वंसक गोलाबारी में प्लाटून के लगभग सारे ही बंकरों को भारी नुकसान पहुंचा, इस हमले को  विफल करने में 1 सिख ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

इस हमले के समय लांस नायक करम सिंह एक अग्रिम सीमा चौकी की कमान पर थे। इस चौकी पर शत्रु ने बहुत बड़ी संख्या में, जो भारतीयों से दस गुणा अधिक थी, हमला किया। चौकी पर आठ बार आक्रमण हुआ और हर बार सिखों ने शत्रु को मार भगाया। जब गोला-बारूद कम होने लगा तो लांस नायक करम सिंह यह जानते हुए कि दुश्मन की भयानक गोलाबारी के बीच उन तक कोई मदद नहीं पहुंच सकेगी, कंपनी की मुख्य पोजीशन से आ मिले। जख्मी होने के बावजूद वे अपने एक अन्य साथी की मदद से दो घायल साथियों को भी अपने साथ ले आए। दुश्मन की फायर में घिर जाने के कारण उनके लिए बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया था। सारे खतरों की परवाह न करते हुए करम सिंह रेंगते हुए एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे और अपने सैनिकों को लड़ाई जारी रखने का हौसला देते रहे। कई बार उन्होंने दुश्मनों को ग्रेनेड फेंककर मार भगाया। दो बार घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी निकासी से इन्कार कर दिया और अग्रिम खाइयों में डटे रहे।

दुश्मन का पांचवां हमला बहुत तीव्र था। शत्रु के दो सैनिक करम सिंह की पोजीशन के इतने नजदीक आ गए कि बिना अपने आदमियों को चोट पहुंचाए, उनसे लड़ा नहीं जा सकता था। तब वे अपनी खाई से बाहर कूद पड़े और देखते-देखते दोनों घुसपैठिए सैनिकों को संगीन घोंपकर मार डाला। इस साहसिक कार्य से दुश्मन का मनोबल टूट गया और उसने घेरा उठा लिया। करम सिंह और उनके साथियों ने दुश्मन के और तीन हमले भी विफल कर दिए। लांस नायक करम सिंह जहां अपने साथियों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे वहीं दुश्मन के लिए आतंक। टिथवाल की लड़ाई में उत्कृष्ट भूमिका के लिए लांस नायक करम सिंह को परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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परम वीर चक्र (मरणोपरांत), कुमाऊं रेजिमेंट मेजर सोमनाथ शर्मा https://shauryasaga.com/first-paramveer-chakra-major-somnath-sharma/ https://shauryasaga.com/first-paramveer-chakra-major-somnath-sharma/?noamp=mobile#comments Wed, 07 Feb 2024 07:30:40 +0000 https://shauryasaga.com/?p=953

मेजर सोमनाथ शर्मा (आई सी 521) का जन्म 31 जनवरी, 1923 को दध, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम मेजर जनरल ए. एन. शर्मा था। 22 फरवरी, 1942 को उन्हें कुमाऊं रेजीमेंट में कमीशन मिला। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अराकान आपरेशन में भाग लिया था। परम वीर चक्र से सम्मानित होने वाले वे पहले भारतीय थे। उनके भाई जनरल बी. एन. शर्मा 1988 से 1990 तक भारतीय सेनाध्यक्ष के पद पर आसीन रहे।

22 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तानी कबायलियों ने जम्मू और कश्मीर पर हमला किया। यह ताकत के बल पर कश्मीर घाटी को हड़पने की पाकिस्तानी चाल थी। कश्मीर 26 अक्तूबर को भारत का अभिन्न अंग बन चुका था अतः उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भारत की थी। इसलिए कश्मीर घाटी की ओर तेजी से बढ़ते हुए कबायली हमले को रोकने के लिए भारत ने श्रीनगर में अपनी फौजें उतारी। भारतीय सेना का पहला जत्था 27 अक्तूबर को सुबह ठीक समय पर श्रीनगर पहुंच गया और उसने दुश्मन को श्रीनगर के परिसर के बाहर ही रोक दिया। 4 कुमाऊं की ‘डी’ कंपनी मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्व में 31 अक्तूबर को हवाई मार्ग से श्रीनगर भेजी गई थी। जब मेजर शर्मा की कंपनी को श्रीनगर जाने का आदेश मिला था, उस समय उनके हाथ पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था। हाकी खेलते समय मैदान में चोट लग गई थी और प्लास्टर हटने तक उन्हें आराम करने की सलाह दी गई थी। लेकिन उन्होंने इस संकट के समय में अपनी कंपनी के साथ जाने का आग्रह किया जिसे स्वीकार कर लिया गया।इस बीच कबायलियों द्वारा श्रीनगर पर किए गए हमले को 1 सिख ने पाटन में ही असफल कर दिया था।
दुश्मन ने कश्मीर घाटी में घुसने के लिए अब छापामार रणनीति अपनाई, किंतु भारतीय सैनिकों के पहुंच जाने के कारण श्रीनगर और उसके आसपास के इलाके की सुरक्षा व्यवस्था अब और बेहतर हो गई थी। 3 नवंबर को उत्तर दिशा से श्रीनगर की तरफ आ रहे कबायलियों का पता लगाने के लिए 3 कम्पनियों के एक मजबूत लड़ाकू गश्ती दल को बड़गाम क्षेत्र में टोह लेने के लिए भेजा गया। 9:30 बजे तक सैनिकों ने बड़गाम में अपना मजबूत बेस स्थापित कर लिया। खोज के दौरान जब दुश्मन कहीं नहीं दिखाई पड़ा तो 14:00 बजे तक दो कंपनियां श्रीनगर वापस आ गई। मेजर शर्मा के नेतृत्व वाली ‘डी’ कंमनी को, जिसने बड़गाम के दक्षिण में मोर्चा संभाला था, 15:00 बजे तक वहां रूकने को कहा गया।14:35 बजे ‘डी’ कंपनी पर बड़गाम के कुछ मकानों से गोलीबारी होने लगी। कंपनी ने जवाबी गोलीबारी नहीं की क्योंकि उससे निर्दोष गांव वालों के मरने का खतरा था। मेजर शर्मा इस खतरे के बारे में ब्रिगेड कमांडर से बात कर ही रहे थे कि उनके मोर्चे के पश्चिम स्थित खाई की ओर से करीब 700 दुश्मन सैनिक आते हुए दिखाई पड़े। पास आते ही उन्होंने कंपनी पर छोटे हथियारों, मोर्टारों और स्वचालित शस्त्रों से हमला बोल दिया। शत्रु की इस अचूक और विनाशकारी गोलीबारी में कई भारतीय सैनिक हताहत हुए। मेजर शर्मा ने श्रीनगर शहर और वहां के हवाई अड्डे पर आने वाले खतरे को एवं स्थिति की गंभीरता को समझा। उन्होंने अपनी कंपनी को दृढ़तापूर्वक लड़ने को कहा। दुश्मन की गोलीबारी के चलते उन्होंने अपने विमानों के लक्ष्य के निर्देशन के लिए संकेत पैनल भी लगाए।विषम परिस्थितियों के बावजूद कंपनी 6 घंटे तक डटी रही। सैनिकों के बड़ी संख्या में हताहत होने के कारण जब कंपनी की गोलीबारी की क्षमता कमजोर पड़ने लगी तब मेजर शर्मा, बाएं हाथ पर प्लास्टर चढ़े होने के बावजूद, मैगजीन भरकर लाइट मशीन गन चालकों को देते रहे। जब वे दुश्मन से जूझ रहे थे तभी एक मोर्टार सेल उनके पास स्थित गोला-बारूद के ढेर पर आकर फटा। मेजर शर्मा, जिन्होंने अभी अपने जीवन के 25 वर्ष भी पूरे नहीं किए थे, इसी विस्फोट में वीर गति को प्राप्त हुए। ब्रिगेड मुख्यालय को भेजे गए अपने अंतिम संदेश में उन्होंने कहा था- ‘मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अंतिम सैनिक और अंतिम गोली तक लड़ता रहूंगा।’ बड़गाम की इस लड़ाई में ‘डी’ कंपनी के मेजर शर्मा, एक जेसीओ और अन्य 20 सैनिक मारे गए। लेकिन उनकी कुर्बानी बेकार नहीं गई। इन वीर सैनिकों ने बहुत ही नाजुक परिस्थिति में श्रीनगर और हवाई अड्डे की तरफ बढ़ते हुए दुश्मन को कई घंटों तक रोके रखा।

मेजर सोमनाथ शर्मा ने श्रेष्ठ नेतृत्व और उच्च साहस का एक आदर्श स्थापित किया। मरणोपरांत उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

जय हिन्द जय भारत

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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