Ramesh Chandra sharma (Dada) – shauryasaga.com https://shauryasaga.com shaurya saga Mon, 24 Mar 2025 11:23:26 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9 https://i0.wp.com/shauryasaga.com/wp-content/uploads/2024/02/cropped-logo1.png?fit=32%2C32&ssl=1 Ramesh Chandra sharma (Dada) – shauryasaga.com https://shauryasaga.com 32 32 230886147 भगत सिंह,राजगुरु-सुखदेव थापर https://shauryasaga.com/bhagat-singh-rajguru-sukhdev-thapar/ https://shauryasaga.com/bhagat-singh-rajguru-sukhdev-thapar/?noamp=mobile#respond Mon, 24 Mar 2025 10:18:53 +0000 https://shauryasaga.com/?p=5388

शुरुआत और प्रेरणा

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब (अब पाकिस्तान में) के बंगा गांव में एक सिख परिवार में हुआ था। उनके परिवार का स्वतंत्रता संग्राम से गहरा संबंध था; उनके चाचा, अजीत सिंह, भी एक क्रांतिकारी थे। राजगुरु, यानी शिवराम हरि राजगुरु, का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ गांव में हुआ था। वे एक मराठी ब्राह्मण परिवार से थे और छोटी उम्र से ही ब्रिटिश अत्याचार के खिलाफ गुस्सा रखते थे। सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था, और वे भी एक देशभक्त परिवार से आए थे।

तीनों के जीवन में एक साथ आने की वजह थी उनका ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ना। यह संगठन क्रांतिकारी गतिविधियों के जरिए देश को आजाद कराने के लिए प्रतिबद्ध था।

क्रांतिकारी गतिविधियां

तीनों का पहला बड़ा कदम लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेना था। 1928 में, लाला लाजपत राय एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान ब्रिटिश पुलिस की लाठीचार्ज से घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इसके जवाब में, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और उनके साथी चंद्रशेखर आजाद ने मिलकर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में राजगुरु ने सांडर्स पर गोली चलाई, और भगत सिंह ने भी इसमें हिस्सा लिया। सुखदेव ने इस योजना को बनाने और समन्वय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके बाद, भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार का ध्यान खींचने के लिए 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। यह बम जानलेवा नहीं था, बल्कि इसका मकसद था “बहरों को सुनाने” के लिए एक आवाज उठाना। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने खुद को गिरफ्तार करवाया, ताकि वे अपने विचारों को दुनिया के सामने रख सकें। इस दौरान सुखदेव और राजगुरु भूमिगत होकर संगठन के काम को आगे बढ़ाते रहे।

गिरफ्तारी और बलिदान

सांडर्स हत्याकांड और असेंबली बम कांड के बाद ब्रिटिश पुलिस ने इन क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। भगत सिंह पहले से जेल में थे, लेकिन 1929-1930 के बीच सुखदेव और राजगुरु भी गिरफ्तार हो गए। तीनों पर लाहौर षड्यंत्र मामले में मुकदमा चला। जेल में रहते हुए भी भगत सिंह ने भूख हड़ताल की, जिसमें सुखदेव ने भी साथ दिया, ताकि कैदियों के साथ बेहतर व्यवहार की मांग की जा सके।

अंततः, 7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई। 23 मार्च 1931 को, लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को एक साथ फांसी दे दी गई। उस समय भगत सिंह की उम्र 23 साल, राजगुरु की 22 साल और सुखदेव की 23 साल थी। फांसी से पहले तीनों ने हंसते हुए अपने बलिदान को स्वीकार किया और “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा बुलंद किया।

विरासत

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत ने लाखों भारतीयों को प्रेरित किया। उनकी वीरता, देशभक्ति और बलिदान की भावना आज भी युवाओं के लिए एक मिसाल है। उनकी कहानी यह सिखाती है कि आजादी की कीमत कितनी बड़ी होती है और इसे हासिल करने के लिए कितना साहस चाहिए।

तीनों की यह संयुक्त कहानी न केवल एक इतिहास है, बल्कि एक प्रेरणा भी है जो हमें अपने देश के लिए कुछ करने की शक्ति देती है।

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Terror Attack Pulwama -आतंकियों वो कायराना हमला जब हमने खोए थे अपने 40 वीर सपूत https://shauryasaga.com/terror-attack-pulwama-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%ae/ https://shauryasaga.com/terror-attack-pulwama-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%ae/?noamp=mobile#respond Wed, 14 Feb 2024 12:35:24 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1089

Terror Attack Pulwama आतंकियों वो कायराना हमला जब हमने खोए थे अपने 40 वीर सपूत
जब खुद पीएम मोदी ने देशवासियों से ये वादा किया था कि ‘सभी आंसुओं का बदला लिया जाएगा’. 12 दिन में भारत ने ये करके भी दिखाया था.
आज पुलवामा में हुए इस कायराना हमले को पांच साल बीत गए, लेकिन इसके जख्म आज तक हर भारतवासी के दिलों में ताजा हैं. ये वही हमला है जिसके बाद देशवासियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था.
जम्मू से CRPF का काफिला निकला, हंसते-गाते गुनगुनाते जवान आगे बढ़ रहे थे, किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि क्या होने वाला है? मंजिल थी श्रीनगर जो महज 30 किमी दूर था. तभी काफिले में एक तेज रफ्तार ईको कार घुसी और एक बस से जा टकराई. अगले ही पल ऐसा तेज धमाका हुआ जिसकी गूंज 10 किलोमीटर दूर तक सुनाई दी. धुएं के गुबार में सब कुछ खो गया…. न तो वो कार दिखी और न ही वो बस जिससे वो कार टकराई थी. रह गया था सिर्फ बस का मलबा और वीर सपूतों के पार्थिव शरीर.
14 फरवरी सुबह जम्मू से 78 बसों से सीआरपीएफ का काफिला श्रीनगर के लिए रवाना हुआ. इस काफिले में 2500 से ज्यादा जवान शामिल थे. आतंकियों के पास सेना के इस काफिले की पुख्ता जानकारी थी. महीनों पहले से हमले की साजिश शुरू की गई और जब 3 बजे काफिला पुलवामा में गुजरा तो आतंकी आदिल अहमद डार काफिले में कार लेकर घुसा. इस कार में 100 किलो से ज्यादा विस्फोटक था. इसमें सीआरपीएफ के 76 वें बटालियन के 40 वीर सपूत शहीद हो गए थे. कई किलोमीटर तक हवा में बारूद की गंध घुल गई थी.
जांच में सामने आया था कि हमले में अमोनियम नाइट्रेट, नाइट्रोग्लिसरीन और RDX का इस्तेमाल हुआ था, यह RDX बेहद छोटी-छोटी मात्रा में प्लानिंग के तहत इकट्ठा गया था. इसमें प्रयोग की गई जिलेटिन की छड़ें पहाड़ों और चट्टानों को तोड़ने के लिए इकट्ठा किया गया था वहां से इन्हें चुराया गया था. अमोनियम पाउडर स्थानीय बाजार से खरीदा गया था. एचडी की एक रिपोर्ट के मुताबिक हमले के लिए 500 से ज्यादा जिलेटिन की छड़े पत्थर की खदानों से चोरी की गई थीं.
फिर आई बदले की रात और हिल गया बालाकोट
14 फरवरी को हुए पुलवामा हमले से भारत ही नहीं पूरी दुनिया अचंभित थी. यह ऐसा हमला था जिसने दर्द तो दिया ही लोगों को गम और गुस्से से भी भर दिया था. 17 फरवरी को पीएम मोदी ने खुद ये ऐलान किया था कि ‘मैं भी अपने दिल में वही आग महसूस करता हूं, जो आपके अंदर भड़क रही है.’ पीएम मोदी ने कहा था कि – हर आंसू का बदला लिया जाएगा. सेनाओं को प्रतिशोध के लिए समय और जगह तय करने की छूट दे दी गई थी. 12 दिन बाद 26 फरवरी को रात में तीन बजे भारत ने देशवासियों से किया वादा पूरा किया और 12 मिराज 200 फाइटर जेट्स एलओसी को पार कर पाकिस्तान में घुस गए.
भारतीय वायुसेना के जांबाज फाइटर मिराज 2000 लेकर बालाकोट तक गए और खुफिया इनपुट के आधार पर जैश ए मोहम्मद के ठिकानों को ध्वस्त कर दिया. इस हमले में तकरीबन 300 आतंकी मारे गए थे. एयरस्ट्राइक में कई हजार किलो बम बरसाए गए थे. इस प्लान को अंजाम देने की जिम्मेदारी पीएम मोदी ने एनएसए अजित डोभाल को दी थी.

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यह लेख दूसरे लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह को पश्चिमी मोर्चे पर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध https://shauryasaga.com/bharat-pak-yuddh-1971/ https://shauryasaga.com/bharat-pak-yuddh-1971/?noamp=mobile#respond Sat, 10 Feb 2024 12:24:09 +0000 https://shauryasaga.com/?p=1054
यह लेख दूसरे लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह को पश्चिमी मोर्चे पर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए समर्पित है। दुर्भाग्य से, वह कार्रवाई में मारा गया था।
सेकेंड लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह का जन्म 24 नवंबर 1950 को जालंधर, पंजाब में हुआ था। उनका जन्म पिता मेजर हजूरा सिंह और माता करतार कौर के घर हुआ था। उनके 5 और भाई थे और उन्होंने विभिन्न सैन्य छावनियों में अपने पिता की विभिन्न पोस्टिंग के दौरान कई सैन्य स्कूलों में पढ़ाई की थी। उन्होंने इलाहाबाद के सीएवी इंटरमीडिएट कॉलेज से अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की। अपनी स्कूली शिक्षा के बाद, उन्होंने स्नातक की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिला लिया। अपने अध्ययन के तीसरे वर्ष में, उन्होंने उड़ीसा के बुर्ला में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में मैकेनिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन करने के लिए आवेदन किया था।
लेकिन मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया। इसलिए, उन्होंने मैकेनिकल छोड़ दिया और ओटीए, चेन्नई में शामिल हो गए। उन्होंने सितंबर, 1970 में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में 7 कैवेलरी रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त किया। मार्च, 1971 में, उन्हें नई बनी 71 आर्मर्ड रेजीमेंट में स्थानांतरित कर दिया गया। 71 बख़्तरबंद रेजिमेंट की स्थापना जनवरी 1971 में अहमदनगर में हुई थी और यह टी-55 भारी टैंकों से लैस थी।
3 दिसंबर, 1971 को जैसे ही पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ा, पूरी 71 बख्तरबंद रेजिमेंट (एक स्क्वाड्रन कम) 86 ब्रिगेड ग्रुप के साथ पश्चिमी मोर्चे पर सेवा कर रही थी। सेकेंड लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह टी-55 टैंकों में से एक की कमान संभाल रहे थे और टैंक ब्रिगेड के साथ पाकिस्तान में डेरा बाबा नानक क्षेत्र में गहराई से आगे बढ़ रहे थे। डेरा बाबा नानक क्षेत्र हमारे हाथों में पड़ने के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि यह रावी नदी के पूर्व में एक एन्क्लेव था और इसमें पाकिस्तान के अंदर पासुर और नारोवाल को जोड़ने वाला रेल-सड़क पुल था। इसके अलावा, दुश्मन के हाथों में डेरा बाबा नानक क्षेत्र ने इसे भारतीय शहरों गुरुदासपुर और बटाला में आक्रमण शुरू करने की शक्ति दी। इसलिए, 86 इन्फैंट्री ब्रिगेड और 71 आर्मर्ड रेजिमेंट को डेरा बाबा नानक को लेने का काम सौंपा गया था। दुश्मन पर पहला हमला 86 इन्फैंट्री ब्रिगेड से 10 डोगरा द्वारा शुरू किया गया था।
5-6 दिसंबर, 1971 की रात को 86 इन्फैंट्री ब्रिगेड के टी-55 टैंक और 1/9 गोरखा राइफल्स ने डेरा बाबा नानक के उत्तर-पूर्वी हिस्से से अपना धक्का दिया और दुश्मन को पूरी तरह से कुचल दिया। सेकंड लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह अपने टैंक से मुख्य बंदूक की आग के साथ दुश्मन की रक्षा को नष्ट करते हुए, आगे बढ़ रही पैदल सेना के लिए कवरिंग फायर प्रदान कर रहे थे। दुश्मन पर पीछे से कवच हमले हुए, और दुश्मन पूरी तरह से तैयार नहीं था। पैदल सेना के साथ टैंकों की निरंतर प्रगति दुश्मन को अधिक सैनिकों और मारक क्षमता की कीमत चुका रही थी, धीरे-धीरे उन्हें जल्दबाजी में पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। दुर्भाग्य से, पाकिस्तानी एम-24 चाफ़ी टैंक पीछे हटने वाले दुश्मन पैदल सेना की लाइन को पकड़ने के लिए लुढ़क गए।
तुरंत, सेकंड लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह का टी-55 टैंक आगे बढ़ रहे शैफियों को नीचे गिराने के लिए आगे बढ़ा, उन्हें अपने स्क्वाड्रन के साथ धातु के टुकड़ों में उड़ा दिया। दुर्भाग्य से, उनके टैंक को एक पाकिस्तानी चाफ़ी से मारा गया था जो पीछे हट रहा था!
6 दिसंबर 1971 की पहली रोशनी तक डेरा बाबा नानक पर तिरंगा फहराया गया था। लेकिन सेकेंड लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह उस जीत को देखने के लिए जीवित नहीं थे।
वह सिर्फ 21 साल के थे।
सेकंड लेफ्टिनेंट बलबीर सिंह को मेरा सलाम।
जय हिन्द।

(साभार – गूगल , पराक्रम गाथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, विजय सोहनी, पेन टुडे, #shauryanamanfoundation)

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महावीर चक्र (मरणोपरांत) लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/ https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-vedprakash-ghai-ind-pak-war-1971/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 12:11:30 +0000 https://shauryasaga.com/?p=873 लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई
22-02-1935 – 15-12-1971
महावीर चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 16 मद्रास रेजिमेंट
बसंतर का युद्ध
ऑपरेशन कैक्टस लिली
भारत-पाक युद्ध 1971
लेफ्टिनेंट कर्नल वेद प्रकाश घई का जन्म ब्रिटिश भारत में, 22 फरवरी 1935 को संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तराखंड) के देहरादून नगर में श्री देश राज घई एवं श्रीमती दयावंती देवी के परिवार में हुआ था। 4 दिसंबर 1954 को उन्हें भारतीय सेना की मद्रास रेजिमेंट की 16 वीं बटालियन में सैकिंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन प्राप्त हुआ था। अपने सेवाकाल में वह अनेक परिचालन क्षेत्रों में तैनात रहे और 1961 में संयुक्त राष्ट्र के संचालन में कांगो में भारतीय दल के भाग के रूप में भी सेवाएं दी थी। वर्ष 1971 तक वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, लेफ्टिनेंट कर्नल घई पश्चिमी मोर्चे पर शकरगढ़ सेक्टर में 16 मद्रास बटालियन की कमान संभाल रहे थे। 14/15 दिसंबर 1971 की रात्रि में बसंतर के युद्ध में, शत्रु का प्रबल प्रतिरोध होते हुए भी उनकी बटालियन बसंतर नदी और भूमिगत खदानों की बाधाओं को लांघ करके BRIDGE HEAD (पुल का छोर) पर अधिकार करने का प्रयास कर रही थी, उसी समय शत्रु ने भयंकर पलटवार किया। लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने अपने सैनिकों को एकजुट किया और शत्रु के अनवरत हो रहे आक्रमणों को विफल किया।
जैसे ही, सूर्योदय हुआ शत्रु ने टैंकों के साथ भीषण आक्रमण किया। तीव्र गोला वृष्टि में भी, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा पर रंच मात्र भी ध्यान नहीं देते हुए, वह निडरता से बटालियन की एक-एक स्थिति पर गए और अपने सैनिकों को प्रोत्साहित और निर्देशित किया। उनके व्यक्तिगत उदाहरण, साहस और नेतृत्व से प्रेरित होकर, बटालियन ने पलटवार किया और शत्रु को भारी क्षति पहुंचाई किंतु शत्रु की गोला वृष्टि में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। अंततः अपने घातक घावों से वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस कार्रवाई में लेफ्टिनेंट कर्नल घई ने विशिष्ट वीरता, उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय दिया और भारतीय सेना की उत्कृष्ट परंपराओं में अपने कर्तव्य की पालना में सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र सम्मान दिया गया। 🙏💐🙏
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महावीर चक्र ब्रिगेडियर मोहिंदर लाल  https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-mohindar-lal-ind-pak-war-1971/ https://shauryasaga.com/mahaveerchakra-mohindar-lal-ind-pak-war-1971/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 12:04:46 +0000 https://shauryasaga.com/?p=870 ब्रिगेडियर मोहिंदर लाल
महावीर चक्र
यूनिट – 121 स्वतंत्र ब्रिगेड
ऑपरेशन कैक्टस लिली
भारत-पाक युद्ध 1971
ब्रिगेडियर मोहिंदर लाल का जन्म ब्रिटिश भारत में 10 दिसंबर 1925 को पंजाब प्रांत के लुधियाना में श्री सरदारी लाल व्हिग के घर में हुआ था। वह 5 गोरखा राइफल्स (फ्रंटियर फोर्स) रेजिमेंट में सम्मिलित हुए थे। वर्ष 1971 तक वह ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत हो गए थे।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ब्रिगेडियर मोहिंदर लाल व्हिग पश्चिमी मोर्चे पर जम्मू-कश्मीर के कारगिल सेक्टर में एक पैदल सेना ब्रिगेड समूह के कमांडर थे। उनकी ब्रिगेड को कारगिल की ओर अवलोकन करने वाली शत्रु चौकियों के परिसर पर अधिकार करने और ‘ओलथिंग थांग’ तक आगे बढ़ने का कार्य सौंपा गया था।
ये पिकेट्स प्रभावी ऊंचाइयों पर स्थित थे और भलीभांति सुदृढ़ व तारबंदी की बाधाओं और खदानों से सुरक्षित थे। ब्रिगेडियर मोहिंदर लाल व्हिग ने व्यावसायिक क्षमता और कौशल के साथ ऑपरेशन की योजना निर्मित की।
12000 फीट से अधिक की ऊंचाई और शून्य से बीस डिग्री नीचे तापमान के होते हुए भी, ब्रिगेडियर व्हिग ने दृढ़ निश्चय के साथ अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और अपनी उपस्थिति और शांत साहस से अपने सैनिकों को शत्रु की गोला वृष्टि और लघु शस्त्रों की गोलीवर्षा का सामना करने और कुछ ही समय में छत्तीस शत्रु चौकियों पर अधिकार करने के लिए प्रेरित किया, दस दिनों की अवधि में उनके ब्रिगेड समूह ने शत्रु को व्यापक क्षति पहुंचाई और विपुल मात्रा में शत्रु के शस्त्र और गोला-बारूद अधिकृत कर लिया गया।
इस ऑपरेशन में ब्रिगेडियर मोहिंदर लाल व्हिग ने सेना की उच्चतम परंपराओं में विशिष्ट वीरता और उत्कृष्ट नेतृत्व प्रदर्शित किया। उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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शौर्य चक्र (मरणोपरांत) लांस हवलदार प्यारा सिंह https://shauryasaga.com/shauryachakra-pyara-singh/ https://shauryasaga.com/shauryachakra-pyara-singh/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 11:35:16 +0000 https://shauryasaga.com/?p=867 लांस हवलदार प्यारा सिंह
नं – 4435751
शौर्य चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 7 सिख लाइट इंफेंट्री
आतंकवाद विरोधी अभियान
लांस हवलदार प्यारा सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत में पजाब प्रांत में वर्तमान लुधियाना जिले में सरदार मोती सिंह एवं सरदारनी बिशन कौर के परिवार में हुआ था। वह भारतीय सेना की सिख लाइट इंफेट्री रेजिमेंट में रंगरूट के रूप में भर्ती हुए थे। प्रशिक्षण के पश्चात उन्हें 7 सिख एलआई बटालियन में सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था।
अपनी बटालियन में विभिन्न परिचालन परिस्थितियों और स्थानों पर सेवाएं देते हुए वर्ष 1966 तक वह लांस हवलदार के पद पर पदोन्नत हो गए थे और उनकी बटालियन को मणिपुर में विद्रोह विरोधी अभियानों में तैनात किया गया था। बटालियन के उत्तरदायित्व का क्षेत्र विद्रोहियों की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से अति प्रभावित था। ये विद्रोही अवसर पाते ही सुरक्षा बलों पर घात लगाते रहते थे। परिणामस्वरूप, सुरक्षा बलों को सदैव सतर्क रहना पड़ता था।
25 दिसंबर 1966 को गोपनीय सूत्रों से प्राप्त हुई विश्वसनीय सूचना के आधार पर 7 सिख एलआई बटालियन ने विद्रोहियों के एक शिविर को नष्ट करने के लिए ऑपरेशन चलाने की योजना निर्मित की। लांस हवलदार प्यारा सिंह उस प्लाटून की कमान संभाल रहे थे जिसे आतंकी शिविर पर आक्रमण कर नष्ट करने का दायित्व दिया गया था। जैसे ही, इस प्लाटून ने विद्रोही शिविर पर आक्रमण किया, प्लाटून विद्रोहियों की ओर से की जा रही लाइट मशीन गन की प्रचंड गोलीवर्षा में घिर गई।
भयानक गोलीवर्षा में, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की पूर्णतः उपेक्षा करते हुए लांस हवलदार प्यारा सिंह आगे बढ़े और विद्रोहियों पर आक्रमण किया किंतु इस वीरतापूर्ण कार्रवाई में उनकी छाती में गोली लग गई। गंभीर रूप से घायल होते हुए भी, प्रचंड रूप से गोलियां चलाते हुए लांस हवलदार प्यारा सिंह शत्रु की लाइट मशीन गन की और दौड़े पड़े। अति उच्च कोटि का साहस प्रदर्शित करते हुए, अंततः उन्होंने शत्रु को समाप्त कर दिया और वीरगति को प्राप्त हुए।
लांस हवलदार प्यारा सिंह को उनके सराहनीय साहस, कर्तव्य के प्रति समर्पण, युद्ध की अदम्य भावना एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत शौर्य चक्र सम्मान दिया गया। 💐🙏💐
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कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) सिपाही जगदीश चंद https://shauryasaga.com/keertichakra-sipahi-jagdeesh-chand/ https://shauryasaga.com/keertichakra-sipahi-jagdeesh-chand/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 11:29:48 +0000 https://shauryasaga.com/?p=861
कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
यूनिट – 546 प्लाटून DSC
डिफेंस सिक्युरिटी कॉर्प्स
आतंकवाद विरोधी अभियान
सिपाही जगदीश चंद, हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के निवासी थे। उन्होंने डोगरा रेजिमेंट में सेवाएं दी थीं और वर्ष 2009 में सेवानिवृत्त होने के पश्चात, उन्हें पुनः रक्षा सुरक्षा कोर में नियुक्त किया गया था। रक्षा सुरक्षा कोर (DSC) सैन्य प्रतिष्ठानों में सुरक्षा का कार्य करती है।
सिपाही जगदीश चंद पठानकोट में भारतीय वायुसेना की 18 विंग से जुड़ी 546 रक्षा सुरक्षा प्लाटून में तैनात थे। 01/02 जनवरी 2016 की रात्रि को 3:30 बजे, सशस्त्र आतंकवादियों के समूह ने लाइन में प्रवेश किया और वहां कार्य कर रहे सैनिकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसके परिणामस्वरूप उनके दो साथी गंभीर रूप से घायल हो गए। सिपाही जगदीश चंद उस समय मेस में थे।
अति सूझबूझ और साहस के प्रदर्शन में, अपनी सुरक्षा की घोर उपेक्षा करते हुए सिपाही जगदीश चंद एक निकटतम आतंकवादी के पीछे दौड़ पड़े, उसका पीछा किया और उस पर नियंत्रण पा लिया। उन्होंने उस आतंकवादी का शस्त्र छीन लिया और उसी से फायर कर उसे मार दिया। इस मध्य, निकट के क्षेत्र में उपस्थित दो अन्य आतंकवादियों ने सिपाही जगदीश चंद पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिससे वह वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए थे सिपाही जगदीश चंद उन आतंकवादियों से संघर्ष करने वाले प्रथम सुरक्षाकर्मी थे।
अप्रत्याशित रूप से हुए इस आक्रमण में, सिपाही जगदीश चंद ने उदात्त सूझबूझ, साहस और विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन किया व आतंकवादियों से संघर्ष करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। 26 जनवरी 2016 को, उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र सम्मान दिया गया। 💐🙏💐
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कीर्ति चक्र (मरणोपरांत) कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार नैण https://shauryasaga.com/keertichakra/ https://shauryasaga.com/keertichakra/?noamp=mobile#respond Sat, 03 Feb 2024 11:19:47 +0000 https://shauryasaga.com/?p=855
कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार नैण
नं – 155110491
04-09-1989 – 31-12-2017
कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
वीरांगना – श्रीमती प्रियंका देवी
यूनिट – 130 बटालियन CRPF
लेथपोरा शिविर आक्रमण
कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार का जन्म 4 सितंबर 1989 को राजस्थान के चूरू जिले की रतनगढ़ तहसील के गौरीसर गांव में श्री सहीराम नैण एवं श्रीमती सावित्री देवी के परिवार में चौथी संतान के रूप में हुआ था। 3 जनवरी 2013 को वह केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में भर्ती हुए थे। उन्हें 130 बटालियन में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था। वर्ष 2017 में वह जम्मू-कश्मीर में तैनात थे। कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार अपनी बटालियन की QUICK ACTION TEAM (QAT) के सदस्य थे। QAT में बटालियन के 8 से 10 तेज, साहसी व उत्कृष्ट कर्मियों को लिया जाता है।
30/31 दिसम्बर 2017 की रात्रि में, श्रीनगर के पुलवामा के निकट स्थित लेथपोरा में CRPF की 185 वीं बटालियन के आधार शिविर पर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने आत्मघाती आक्रमण कर दिया। कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार QAT के साथ चार तल्ला भवन में घुसे और 10 CRPF कार्मिकों को सुरक्षित किया। इस भीषण मुठभेड़ में कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार और कांस्टेबल प्रदीप कुमार पंडा ने दो आतंकवादियों को मार दिया। इस मध्य, तृतीय आतंकवादी की खोज में ज्योंही QAT आगे बढ़कर एक कक्ष में प्रवेश करने लगी, उसी समय उस कक्ष के भीतर छिपे हुए तृतीय आतंकवादी ने अपनी स्वचालित राइफल से अंधाधुंध गोलियां चलाई।
इन गोलियों में से एक गोली कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार के बुलेटप्रूफ शील्ड को छेदते हुए उनकी छाती के ऊपरी भाग में लगी और वह गंभीर रूप से घायल हो गए। गंभीर घायल होते हुए भी अचेत होकर गिरने तक वह गोलियां चलाते रहे। अंततः घिरा हुआ तृतीय आतंकवादी भी मारा गया। कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार को त्वरित चिकित्सा के लिए ले जाया गया, जहां वह वीरगति को प्राप्त हो गए। 36 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में जम्मू-कश्मीर पुलिस के दो पुलिसकर्मी व CRPF के कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार नैण, कांस्टेबल प्रदीप कुमार पांडा, कांस्टेबल शरीफुद्दीन गनी व कांस्टेबल तुफैल अहमद बलिदान हुए थे।
कांस्टेबल राजेन्द्र कुमार के अदम्य साहस, वीरता, कर्तव्य के प्रति समर्पण एवं सर्वोच्च बलिदान के लिए 26 जनवरी 2019 को उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र सम्मान दिया गया।
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